बच्चों का इंटरनेट अधिकार: सुप्रीम कोर्ट बोला, पूर्ण प्रतिबंध नहीं, बच्चों की हिफ़ाज़त कीजिए
क्या बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए उन्हें इंटरनेट से दूर ही कर देना चाहिए? सुप्रीम कोर्ट ने कहा, नहीं। 15 अक्टूबर 2026 को कोर्ट ने माना कि इंटरनेट तक पहुँच हर व्यक्ति का, बच्चों का भी, मौलिक अधिकार है, और सरकार से कहा कि वह नुक़सानदेह सामग्री और उसके पीछे के लोगों पर कार्रवाई करे। कोर्ट ने बाल यौन शोषण सामग्री हटाने के लिए राष्ट्रीय डेटाबेस और प्राथमिक कक्षाओं से ही गुड टच-बैड टच सिखाने का आदेश भी दिया।

15 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने क्या तय किया
जस्ट राइट्स फ़ॉर चिल्ड्रन एलायंस बनाम एस. हरीश (2026 INSC 1149) में न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और के.वी. चंद्रन की पीठ ने 15 अक्टूबर 2026 को कहा कि इंटरनेट तक पहुँचने और उसका इस्तेमाल करने का अधिकार अनुच्छेद 21 सहपठित अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत मौलिक अधिकार है, और यह बच्चों को भी, उम्र चाहे जो हो, प्राप्त है। कोर्ट ने कहा कि ऑनलाइन ख़तरों से बचाव पूर्ण प्रतिबंध का बहाना नहीं हो सकता; राज्य को नुक़सानदेह सामग्री और अपराधियों को निशाना बनाना होगा।
कोर्ट ने केंद्र को पुष्ट बाल यौन शोषण और दुर्व्यवहार सामग्री (CSEAM) का राष्ट्रीय हैश और URL डेटाबेस बनाने को कहा, जिसकी हर प्रविष्टि कम से कम तीन प्रशिक्षित विशेषज्ञ जाँचेंगे, और प्लेटफ़ॉर्मों से ऐसी सामग्री पहचानने और हटाने के दिशानिर्देश बनाने को कहा। स्कूलों को प्राथमिक स्तर से गुड टच-बैड टच और सहमति सिखानी होगी और चाइल्ड हेल्पलाइन 1098 व साइबर क्राइम हेल्पलाइन 1930 लगानी होगी। केंद्र को 10 दिसंबर 2026 की अगली सुनवाई से पहले अनुपालन हलफ़नामा देना है।
फ़ैसलाइंटरनेट का अधिकार मौलिक अधिकार: सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के लिए क्या कहा
- अधिकार, कोई रियायत नहीं: इंटरनेट तक पहुँच जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19(1)(क)) का हिस्सा है। आज बच्चा इंटरनेट से पढ़ता है, जानकारी पाता है और अपनी बात कहता है।
- बच्चे भी अधिकारधारी हैं: यह अधिकार 18 साल पर शुरू नहीं होता। उम्र-आधारित पूर्ण प्रतिबंध कुछ अपराधियों की करतूत की सज़ा हर बच्चे को देगा।
- ख़तरे पर निशाना: राज्य अब भी बच्चों के लिए स्वभाव से हानिकारक सामग्री, जैसे वयस्क वेबसाइटें, रोक सकता है और अनुपातिक सुरक्षा उपाय अपना सकता है।
- डिज़ाइन से सुरक्षा: कोर्ट ने सुझाया कि बच्चों के अकाउंट डिफ़ॉल्ट रूप से निजी हों, अनजान वयस्कों के संदेश सीमित हों, और बच्चों को दिखने वाले विज्ञापन व सामग्री की निगरानी हो, साथ में माता-पिता की सहमति जाँचने के उचित तरीक़े हों।
- 2024 के फ़ैसले की अगली कड़ी: 23 सितंबर 2024 को इसी मामले में कोर्ट ने कहा था कि बाल यौन शोषण सामग्री देखना या रखना पॉक्सो एक्ट की धारा 15 के तहत अपराध हो सकता है, और "चाइल्ड पोर्नोग्राफ़ी" की जगह CSEAM शब्द इस्तेमाल करने को कहा था।
एक व्यस्त सड़क सोचिए। हादसों का इलाज यह नहीं कि बच्चे कभी घर से बाहर ही न निकलें; इलाज है ज़ेबरा क्रॉसिंग, गति सीमा, ट्रैफ़िक पुलिस और सड़क सुरक्षा की पढ़ाई। सुप्रीम कोर्ट ने इंटरनेट के बारे में यही कहा: सड़क सुरक्षित बनाइए और लापरवाह ड्राइवरों को पकड़िए, पर बच्चे को घर में बंद मत कीजिए।
🏠 रोज़मर्रा की मिसाल
स्कूल एक अनुचित किताब की वजह से पूरी लाइब्रेरी बंद नहीं करता। वह उस किताब को हटाता है और बच्चों को अच्छी किताब चुनना सिखाता है।
🇮🇳 असली भारतीय उदाहरण
झारखंड के एक गाँव का आठवीं का छात्र छात्रवृत्ति परीक्षा के लिए मुफ़्त ऑनलाइन पाठ देखता है। 16 साल से कम उम्र पर पूर्ण प्रतिबंध यह दरवाज़ा बंद कर देता; कोर्ट का तरीक़ा इसे खुला रखता है और अपराधियों को रोकता है।
मूल पाठअनुच्छेद 21, अनुच्छेद 19(1)(क) और अनुच्छेद 21क: इंटरनेट के अधिकार का संवैधानिक आधार
भारत का संविधान, अनुच्छेद 19(1)(क). वाक्-स्वातंत्र्य आदि विषयक कुछ अधिकारों का संरक्षण।
(1) सभी नागरिकों को—
(क) वाक्-स्वातंत्र्य और अभिव्यक्ति-स्वातंत्र्य का,
अधिकार होगा।
अनुच्छेद 21. प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण।
किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं।
अनुच्छेद 21क. शिक्षा का अधिकार।
राज्य, छह वर्ष से चौदह वर्ष तक की आयु वाले सभी बालकों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने का ऐसी रीति में, जो राज्य विधि द्वारा, अवधारित करे, उपबंध करेगा।
इनमें से किसी अनुच्छेद में "इंटरनेट" शब्द नहीं है। सुप्रीम कोर्ट इन्हें जीवंत शब्द मानता है: अगर आज बोलना फ़ोन पर होता है, तो बोलने की आज़ादी फ़ोन तक भी पहुँचेगी। अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ (2020) में कोर्ट ने कहा कि इंटरनेट से अभिव्यक्ति और व्यापार अनुच्छेद 19 से सुरक्षित है। फ़हीमा शिरीन बनाम केरल राज्य (2019) में केरल हाई कोर्ट ने इंटरनेट को शिक्षा और निजता के अधिकार से जोड़ा। 2026 का फ़ैसला एक क़दम आगे जाकर पहुँच को ही मौलिक अधिकार कहता है।
ध्यान दें: अनुच्छेद 19 के अधिकार नागरिकों के हैं; अनुच्छेद 21 हर व्यक्ति की रक्षा करता है। दूसरे अधिकारों की तरह इस पर भी उचित क़ानून से युक्तियुक्त प्रतिबंध लग सकते हैं।
किसे क्या करना हैCSEAM डेटाबेस, पॉक्सो एक्ट और प्लेटफ़ॉर्म की ज़िम्मेदारी: केंद्र, प्लेटफ़ॉर्म और स्कूलों को निर्देश
| कौन | कोर्ट ने क्या कहा | पीछे का क़ानून |
|---|---|---|
| केंद्र (MeitY, विधि मंत्रालय) | पुष्ट CSEAM का राष्ट्रीय हैश और URL डेटाबेस (सहयोग पोर्टल के भीतर या अलग) बनाना, जिसका इस्तेमाल सिर्फ़ ऐसी सामग्री पहचानने और हटाने में हो; दिशानिर्देश और SOP बनाना; ज़रूरत हो तो IT एक्ट या नियमों में संशोधन; अनुपालन हलफ़नामा देना | IT एक्ट धारा 79 (सेफ़ हार्बर) और IT नियम, 2021, नियम 3(1)(ख) |
| सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म | परसेप्चुअल हैश-मैचिंग और URL सूची जैसे टूल से CSEAM ढूँढकर हटाना और पुलिस को सूचना देना | पॉक्सो एक्ट धारा 15 और 19-20; पॉक्सो नियम का नियम 11; IT एक्ट धारा 67ख |
| स्कूल और शिक्षक | प्राथमिक स्तर से शरीर की सुरक्षा, गुड टच-बैड टच और सहमति सिखाना; शिक्षकों को ग्रूमिंग और ऑनलाइन उत्पीड़न पहचानने का प्रशिक्षण; कक्षा, छात्रावास, लाइब्रेरी, कंप्यूटर लैब और स्कूल वेबसाइट पर 1098, 1930 और साइबर क्राइम पोर्टल दिखाना | अनुच्छेद 21क, पॉक्सो एक्ट धारा 19 (सूचना देने का कर्तव्य) |
| NCERT और SCERT | बाल मनोवैज्ञानिकों और शिक्षाविदों के साथ डिजिटल सुरक्षा और उम्र के अनुरूप यौन शिक्षा को मुख्य पाठ्यक्रम में जोड़ना | राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (जीवन कौशल) |
मुख्य शब्द: CSEAM = बाल यौन शोषण और दुर्व्यवहार सामग्री। हैश किसी फ़ोटो या वीडियो का डिजिटल फ़िंगरप्रिंट है; प्लेटफ़ॉर्म बिना सामग्री दोबारा देखे फ़िंगरप्रिंट मिला सकते हैं।
यह डेटाबेस फ़िंगरप्रिंट की "मोस्ट वांटेड" सूची की तरह है। एक बार विशेषज्ञ टीम पुष्टि कर दे कि कोई वीडियो शोषण सामग्री है, उसका फ़िंगरप्रिंट सूची में जाता है और हर प्लेटफ़ॉर्म उसकी कॉपी अपने-आप रोक सकता है, ताकि हर बार दोबारा अपलोड होने पर पीड़ित बच्चे को फिर चोट न पहुँचे।
दो नज़रिएबच्चों के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंध बनाम डिज़ाइन से सुरक्षा: भारत का रास्ता
कुछ लोग उम्र-आधारित प्रतिबंध क्यों चाहते हैं
- ऑस्ट्रेलिया का क़ानून 16 से कम उम्र वालों को बड़े सोशल मीडिया से दूर रखता है (10 दिसंबर 2025 से लागू)
- ग्रूमिंग, सेक्सटॉर्शन और लत बढ़ रही है
- माता-पिता के लिए फ़ोन पर नज़र रखना मुश्किल है
कोर्ट ने डिज़ाइन से सुरक्षा क्यों चुनी
- प्रतिबंध सभी बच्चों की पढ़ाई, जानकारी और अभिव्यक्ति काट देता है
- बच्चे अक्सर नक़ली उम्र डालकर प्रतिबंध से बच निकलते हैं
- नुक़सानदेह सामग्री हटाइए और अपराधियों को सज़ा दीजिए
- DPDP एक्ट, 2023 (धारा 9): किसी बच्चे (18 से कम) का व्यक्तिगत डेटा प्रोसेस करने से पहले प्लेटफ़ॉर्म को माता-पिता की सत्यापन योग्य सहमति चाहिए, और वह बच्चों को ट्रैक नहीं कर सकता या उन पर लक्षित विज्ञापन नहीं दिखा सकता।
- माता-पिता अभी क्या करें: बच्चों के अकाउंट निजी रखें, गुड टच-बैड टच पर बात करें, और शोषण सामग्री की शिकायत cybercrime.gov.in या 1930 पर करें। चाइल्ड हेल्पलाइन 1098 है।
आसान शब्दों में: भारत ने "कार ही नहीं" मॉडल की जगह "सीट बेल्ट" मॉडल चुना है। बच्चे ऑनलाइन सफ़र कर सकते हैं, पर गाड़ी में सुरक्षा फ़ीचर हों और ख़तरनाक ड्राइवर पकड़े जाएँ।
UPSC कॉर्नरUPSC प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा के लिए इंटरनेट का अधिकार और बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा
- प्रारंभिक तथ्य: सुप्रीम कोर्ट (15 अक्टूबर 2026, पारदीवाला और चंद्रन न्यायमूर्ति) ने इंटरनेट तक पहुँच को अनुच्छेद 21 सहपठित 19(1)(क) के तहत मौलिक अधिकार माना, जो बच्चों को भी प्राप्त है।
- प्रारंभिक तथ्य: अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ (10 जनवरी 2020) ने इंटरनेट से अभिव्यक्ति और व्यापार को अनुच्छेद 19(1)(क) और 19(1)(छ) में सुरक्षित माना।
- प्रारंभिक तथ्य: पॉक्सो एक्ट, 2012 में 18 से कम उम्र का हर व्यक्ति बच्चा है; धारा 15 बाल यौन शोषण सामग्री को बाँटने या व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए रखने पर सज़ा देती है; CSEAM शब्द सुप्रीम कोर्ट ने 23 सितंबर 2024 को सुझाया।
- प्रारंभिक तथ्य: अनुच्छेद 21क (86वाँ संशोधन, 2002) 6 से 14 साल के बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देता है।
- प्रारंभिक तथ्य: चाइल्ड हेल्पलाइन 1098; राष्ट्रीय साइबर क्राइम हेल्पलाइन 1930।
- मुख्य परीक्षा (250 शब्द): "बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा का अर्थ उन्हें बाहर करना नहीं होना चाहिए।" इंटरनेट के अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट के अक्टूबर 2026 के फ़ैसले के आलोक में परीक्षण कीजिए।
- नैतिकता पहलू: बच्चे की स्वायत्तता और सूचना के अधिकार तथा माता-पिता, स्कूल और प्लेटफ़ॉर्म की देखभाल की ज़िम्मेदारी में संतुलन।
अभ्यास MCQख़ुद को परखें: बच्चों का इंटरनेट अधिकार
जस्ट राइट्स फ़ॉर चिल्ड्रन एलायंस बनाम एस. हरीश में सुप्रीम कोर्ट के अक्टूबर 2026 के फ़ैसले के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: (1) इसने कहा कि इंटरनेट तक पहुँच अनुच्छेद 21 सहपठित अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत मौलिक अधिकार है। (2) इसने 16 साल से कम उम्र के सभी बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध को सही ठहराया। (3) इसने केंद्र को पुष्ट बाल यौन शोषण सामग्री हटाने के लिए राष्ट्रीय डेटाबेस बनाने का निर्देश दिया। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
शंका समाधानअक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या भारत में इंटरनेट का अधिकार मौलिक अधिकार है?
हाँ। 15 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इंटरनेट तक पहुँचने और उसका इस्तेमाल करने का अधिकार अनुच्छेद 21 सहपठित अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत मौलिक अधिकार है और यह बच्चों पर भी, उम्र चाहे जो हो, लागू है। दूसरे अधिकारों की तरह वैध क़ानून से इस पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लग सकते हैं।
क्या सरकार बच्चों के लिए सोशल मीडिया बंद कर सकती है?
कोर्ट ने उम्र-आधारित पूर्ण प्रतिबंध ठुकरा दिया। सरकार अब भी बच्चों के लिए स्वभाव से हानिकारक सामग्री, जैसे वयस्क वेबसाइटें, रोक सकती है और डिफ़ॉल्ट निजी अकाउंट व माता-पिता की सहमति जाँच जैसे अनुपातिक सुरक्षा उपाय माँग सकती है।
CSEAM क्या है?
बाल यौन शोषण और दुर्व्यवहार सामग्री (Child Sexual Exploitation and Abuse Material)। 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने "चाइल्ड पोर्नोग्राफ़ी" की जगह यह शब्द इस्तेमाल करने को कहा, क्योंकि यह सामग्री किसी बच्चे के शोषण का रिकॉर्ड है। इसे रखना या बाँटना पॉक्सो एक्ट की धारा 15 और IT एक्ट की धारा 67ख के तहत अपराध है।
अब स्कूलों को क्या करना होगा?
प्राथमिक स्तर से उम्र के अनुरूप बच्चों को उनके शरीर, गुड टच-बैड टच और सहमति के बारे में सिखाना; शिक्षकों को ग्रूमिंग और ऑनलाइन उत्पीड़न पहचानने का प्रशिक्षण देना; और कक्षा, छात्रावास, लाइब्रेरी, कंप्यूटर लैब व स्कूल वेबसाइट पर चाइल्ड हेल्पलाइन 1098, साइबर क्राइम हेल्पलाइन 1930 और साइबर क्राइम पोर्टल दिखाना।
ऑनलाइन बाल शोषण सामग्री की शिकायत कहाँ करें?
राष्ट्रीय साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल (cybercrime.gov.in) या हेल्पलाइन 1930 पर, या स्थानीय पुलिस अथवा विशेष किशोर पुलिस इकाई को। ख़तरे में पड़े बच्चे के लिए 1098 पर कॉल करें।
स्रोत और आगे की पढ़ाईहमने जिन स्रोतों की जाँच की
इस पेज के समाचार तथ्य 19 अक्टूबर 2026 को नीचे दी गई रिपोर्टों से जाँचे गए। मामला 10 दिसंबर 2026 को फिर सूचीबद्ध है; सटीक निर्देशों के लिए पूरा फ़ैसला पढ़ें। संवैधानिक पाठ भारत के संविधान के हिंदी पाठ से लिया गया है।
- Bar & Bench: Children too have fundamental right to access internet; can't deny it citing online harm: Supreme Court
- LiveLaw: Supreme Court directs Union to create national database on CSEAM for removal across platforms
- LiveLaw: Children must be taught about safe and unsafe touch, train teachers to identify grooming and abuse
- Business Today, 17 Oct 2026: Internet access a fundamental right, Supreme Court rejects age-based ban
- Verdictum: Just Rights for Children Alliance v S. Harish, 2026 INSC 1149, digital safety and sex education
- ThePrint: Children have fundamental right to access internet, can't impose blanket ban on its use: SC
- India Code: The Protection of Children from Sexual Offences Act, 2012