कोर्ट फ़ीस बनाम टैक्स: सुप्रीम कोर्ट केरल की बिना सीमा वाली कोर्ट फ़ीस की जाँच क्यों कर रहा है
सिविल कोर्ट में पैसे की वसूली का मुक़दमा करने से पहले कोर्ट फ़ीस देनी पड़ती है, आमतौर पर दावे की रक़म का एक प्रतिशत। केरल ने 2025 में कोर्ट फ़ीस बहुत बढ़ा दी और कई फ़ीस को बिना किसी ऊपरी सीमा के प्रतिशत में ही रखा। अक्टूबर 2026 में सुप्रीम कोर्ट एक तीखे सवाल की जाँच पर सहमत हुआ: जब फ़ीस की कोई सीमा न हो, तो क्या वह फ़ीस न रहकर टैक्स बन जाती है? जानिए केस, क़ानून और यह हर मुक़दमेबाज़ के लिए क्यों अहम है।

अक्टूबर 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने क्या किया
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने केरल हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन (KHCAA) की विशेष अनुमति याचिका पर नोटिस जारी किया, जिसकी ख़बर 16 अक्टूबर 2026 को आई। याचिका केरल हाईकोर्ट के 31 अक्टूबर 2025 के फ़ैसले को चुनौती देती है, जिसने केरल वित्त अधिनियम, 2025 से की गई कोर्ट फ़ीस की भारी बढ़ोतरी को सही ठहराया था। यह बढ़ोतरी केरल न्यायालय फ़ीस और वाद मूल्यांकन अधिनियम, 1959 में संशोधन से हुई।
कोर्ट ने नोटिस एक सवाल तक सीमित रखा: क्या बिना किसी ऊपरी सीमा वाली मूल्यानुसार (ad valorem) कोर्ट फ़ीस वैध है, या वह टैक्स का रूप ले लेती है? वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वर ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के अपने नियम मूल्यानुसार फ़ीस की सीमा तय करते हैं। याचिका धारा 73A पर भी सवाल उठाती है, जो राज्य सरकार को कोर्ट फ़ीस से छूट देती है। ख़बरों के मुताबिक़ मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि कोर्ट सभी राज्यों को निर्देश देने पर विचार कर सकता है। मामला लंबित है; अंतिम फ़ैसला नहीं आया है।
केसकेरल कोर्ट फ़ीस बढ़ोतरी: हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक
- 12025 की शुरुआत
केरल वित्त अधिनियम, 2025 ने 1959 के अधिनियम के तहत कोर्ट फ़ीस बदली; राज्य का कहना है कि तय फ़ीस बीस साल से ज़्यादा से नहीं बदली थी।
- 2चुनौती
KHCAA ने बढ़ोतरी को मनमाना बताया; उसके मुताबिक़ बढ़त 400 से 9,900 प्रतिशत तक है और कई फ़ीस की कोई सीमा नहीं।
- 331 अक्टूबर 2025
केरल हाईकोर्ट ने महँगाई और अदालत चलाने की बढ़ती लागत का हवाला देकर बढ़ोतरी सही ठहराई।
- 4अक्टूबर 2026
सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया, केवल इस सवाल पर कि बिना सीमा वाली मूल्यानुसार फ़ीस वैध है या नहीं।
- 5आगे
राज्य जवाब देगा; कोर्ट केरल के लिए या सभी राज्यों के लिए नियम तय कर सकता है।
कोर्ट फ़ीस दो तरह की होती है। तय फ़ीस एक निश्चित रक़म है, जैसे किसी अर्ज़ी के ₹50। मूल्यानुसार फ़ीस आपके दावे की क़ीमत का प्रतिशत होती है। अगर प्रतिशत की कोई सीमा न हो, तो ₹10 करोड़ का दावा करने वाला ₹10 लाख का दावा करने वाले से सौ गुना ज़्यादा देता है, जबकि जज, कोर्टरूम और स्टाफ़ वही हैं। सवाल यह है कि क्या ऐसा शुल्क अब भी किसी सेवा की क़ीमत है या सिर्फ़ कमाई का ज़रिया।
🏠 रोज़मर्रा की मिसाल
पार्किंग फ़ीस पार्किंग की क़ीमत है। अगर मॉल आपकी कार की क़ीमत का 2 प्रतिशत बिना सीमा के लेने लगे, तो महँगी कार वाला उसी जगह के लिए लाखों देगा। एक हद के बाद यह पार्किंग फ़ीस नहीं, महँगी कार रखने पर टैक्स बन जाता है।
🇮🇳 असली भारतीय उदाहरण
कोच्चि का एक व्यापारी ₹5 करोड़ के बकाया बिल वसूलना चाहता है, तो केस दर्ज होने से पहले ही उसे ₹5 करोड़ पर पूरी प्रतिशत फ़ीस देनी होगी। फ़ीस बहुत ज़्यादा हो तो वह दावा छोड़ ही सकता है।
मूल पाठअनुच्छेद 39क, अनुच्छेद 265 और राज्य सूची की प्रविष्टि 3
भारत का संविधान, अनुच्छेद 39क. समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता।
राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि विधिक तंत्र इस प्रकार काम करे कि समान अवसर के आधार पर न्याय सुलभ हो और वह, विशिष्टतया, यह सुनिश्चित करने के लिए कि आर्थिक या किसी अन्य निर्योग्यता के कारण कोई नागरिक न्याय प्राप्त करने के अवसर से वंचित न रह जाए, उपयुक्त विधान या स्कीम द्वारा या किसी अन्य रीति से निःशुल्क विधिक सहायता की व्यवस्था करेगा।
अनुच्छेद 265. विधि के प्राधिकार के बिना करों का अधिरोपण न किया जाना।
विधि के प्राधिकार से ही कोई कर अधिरोपित या संगृहीत किया जाएगा, अन्यथा नहीं।
सातवीं अनुसूची, सूची II (राज्य सूची), प्रविष्टि 3 (सरल हिंदी अनुवाद)।
उच्च न्यायालय के अधिकारी और सेवक; किराया और राजस्व न्यायालयों में प्रक्रिया; उच्चतम न्यायालय को छोड़कर सभी न्यायालयों में ली जाने वाली फ़ीस।
राज्य सूची की प्रविष्टि 3 हर राज्य को अपनी अदालतों में ली जाने वाली फ़ीस तय करने देती है (सुप्रीम कोर्ट की फ़ीस संघ सूची में है)। अनुच्छेद 265 कहता है कि टैक्स के लिए क़ानून का अधिकार चाहिए, और टैक्स और फ़ीस अलग माने जाते हैं: फ़ीस का किसी सेवा से संबंध होना चाहिए। 42वें संशोधन (1976) से जोड़ा गया नीति निदेशक तत्व अनुच्छेद 39क राज्य से कहता है कि ग़रीबी की वजह से किसी को न्याय से वंचित न किया जाए।
फ़ीस बनाम टैक्सकोर्ट फ़ीस बनाम टैक्स: भारतीय अदालतें दोनों में फ़र्क़ कैसे करती हैं
फ़ीस
- किसी ख़ास सेवा के बदले
- उस सेवा की लागत से मोटा संबंध
- पैसा उसी सेवा पर
- उदाहरण: कोर्ट फ़ीस, लाइसेंस फ़ीस
टैक्स
- सरकारी आमदनी के लिए अनिवार्य भुगतान
- देने वाले को किसी सेवा से संबंध नहीं
- पैसा सरकारी ख़ज़ाने में
- उदाहरण: आयकर, GST
| केस | सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा |
|---|---|
| शिरूर मठ (1954) | फ़र्क़ समझाया: फ़ीस किसी ख़ास सेवा का शुल्क है; टैक्स सामान्य सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए। |
| ज़ेनिथ लैंप (1973) | संविधान पीठ ने कहा कि कोर्ट फ़ीस फ़ीस है, टैक्स नहीं; कुल फ़ीस का दीवानी न्याय प्रशासन की लागत से संबंध होना चाहिए। |
| पी.एम. अश्वत्थनारायण सेट्टी (1988) | कर्नाटक और राजस्थान में बिना सीमा वाली मूल्यानुसार कोर्ट फ़ीस सही ठहराई; लागत से संबंध मोटा होना काफ़ी, सटीक नहीं। |
| अनीता कुशवाहा (2016) | न्याय तक पहुँच अनुच्छेद 14 और 21 के तहत मौलिक अधिकार है। |
मुक़दमेबाज़ों के लिएकोर्ट फ़ीस बढ़ने का आम लोगों पर क्या असर
- 1पहले फ़ीस जानें
कोर्ट फ़ीस आपके राज्य के न्यायालय फ़ीस और वाद मूल्यांकन अधिनियम के तहत मुक़दमे के मूल्यांकन पर निर्भर है।
- 2निःशुल्क विधिक सहायता
विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत महिलाएँ, बच्चे, SC/ST, मज़दूर, आपदा पीड़ित और आय सीमा से नीचे के लोग मुफ़्त वकील पाते हैं।
- 3निर्धन व्यक्ति का वाद
सिविल प्रक्रिया संहिता का आदेश XXXIII कोर्ट फ़ीस न दे सकने वाले को "निर्धन व्यक्ति" के रूप में मुक़दमा करने देता है।
- 4लोक अदालत में वापसी
लंबित केस लोक अदालत में सुलझ जाए तो दी गई कोर्ट फ़ीस वापस मिलती है।
- 5DLSA से पूछें
हर ज़िला न्यायालय परिसर में ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण इन क़दमों में मदद करता है।
UPSC कॉर्नरUPSC के लिए कोर्ट फ़ीस, अनुच्छेद 39क और न्याय तक पहुँच
- प्रारंभिक तथ्य: सुप्रीम कोर्ट को छोड़कर सभी अदालतों की फ़ीस सूची II (राज्य सूची) की प्रविष्टि 3 में है; सुप्रीम कोर्ट की फ़ीस सूची I की प्रविष्टि 77 में।
- प्रारंभिक तथ्य: अनुच्छेद 39क (समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता) 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 से जोड़ा गया।
- प्रारंभिक तथ्य: अनुच्छेद 265 कहता है कि विधि के प्राधिकार के बिना कोई कर अधिरोपित या संगृहीत नहीं होगा।
- प्रारंभिक तथ्य: NALSA विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत बना; भारत के मुख्य न्यायाधीश इसके मुख्य संरक्षक हैं।
- प्रारंभिक तथ्य: 1987 के अधिनियम की धारा 21 के तहत लोक अदालत का अवार्ड अंतिम है और उसके ख़िलाफ़ अपील नहीं होती।
- मुख्य परीक्षा (150 शब्द): "कोर्ट फ़ीस एक सार्वजनिक सेवा की क़ीमत है, कमाई का ज़रिया नहीं।" मूल्यानुसार कोर्ट फ़ीस और अनुच्छेद 39क के संदर्भ में चर्चा कीजिए।
अभ्यास MCQख़ुद को परखें: कोर्ट फ़ीस बनाम टैक्स: केरल केस सुप्रीम कोर्ट में
भारत में कोर्ट फ़ीस के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: (1) सुप्रीम कोर्ट को छोड़कर सभी अदालतों में ली जाने वाली फ़ीस राज्य सूची का विषय है। (2) समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता वाला अनुच्छेद 39क 1950 के मूल संविधान का हिस्सा था। (3) ज़ेनिथ लैंप केस (1973) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोर्ट फ़ीस फ़ीस की प्रकृति की है, टैक्स की नहीं। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
शंका समाधानअक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
सुप्रीम कोर्ट केरल की कोर्ट फ़ीस की जाँच क्यों कर रहा है?
केरल हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर 2026 में एक सीमित सवाल पर नोटिस जारी किया: क्या बिना ऊपरी सीमा वाली मूल्यानुसार कोर्ट फ़ीस वैध है, या वह टैक्स बन जाती है। याचिका 2025 की बढ़ोतरी को सही ठहराने वाले केरल हाईकोर्ट के 31 अक्टूबर 2025 के फ़ैसले को चुनौती देती है।
मूल्यानुसार (ad valorem) कोर्ट फ़ीस क्या है?
यह तय रक़म के बजाय मुक़दमे में दावे या संपत्ति की क़ीमत के प्रतिशत के रूप में ली जाने वाली कोर्ट फ़ीस है। जैसे पैसे की वसूली के मुक़दमे में फ़ीस दावे की रक़म के साथ बढ़ती है।
फ़ीस और टैक्स में क्या फ़र्क़ है?
फ़ीस किसी ख़ास सेवा के बदले दी जाती है और उसका उस सेवा की लागत से मोटा संबंध होना चाहिए। टैक्स सामान्य सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए अनिवार्य भुगतान है, जिसके बदले कोई सीधी सेवा नहीं मिलती। अदालतों ने कोर्ट फ़ीस को फ़ीस माना है, टैक्स नहीं।
क्या ग़रीब व्यक्ति बिना कोर्ट फ़ीस दिए केस कर सकता है?
हाँ। सिविल प्रक्रिया संहिता का आदेश XXXIII निर्धन व्यक्ति को पहले कोर्ट फ़ीस दिए बिना मुक़दमा करने देता है, और विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत NALSA, राज्य और ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण पात्र लोगों को मुफ़्त क़ानूनी मदद देते हैं।
क्या सुप्रीम कोर्ट ने केरल की कोर्ट फ़ीस बढ़ोतरी रद्द कर दी है?
नहीं। 21 अक्टूबर 2026 तक कोर्ट ने केवल नोटिस जारी किया है। सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले तक बढ़ोतरी को सही ठहराने वाला केरल हाईकोर्ट का फ़ैसला लागू है।
स्रोत और आगे की पढ़ाईहमने जिन स्रोतों की जाँच की
इस पेज के समाचार तथ्य 21 अक्टूबर 2026 को नीचे दी गई रिपोर्टों से जाँचे गए। मामला लंबित है और बदल सकता है। अनुच्छेद 39क और 265 का पाठ भारत के संविधान के हिंदी पाठ से; प्रविष्टि 3 का पाठ सरल हिंदी अनुवाद है।
- LiveLaw: 'Is ad valorem court fee without cap valid?': Supreme Court to examine Kerala court fee hike on KHCAA plea
- Bar & Bench: Is uncapped ad valorem court fee a form of tax? Supreme Court to examine
- Business Standard: Supreme Court to examine if court fees without upper limit amount to tax
- Bar & Bench: Kerala High Court rejects plea challenging hike in court fees (31 October 2025)
- P.M. Ashwathanarayana Setty v. State of Karnataka (1988), Indian Kanoon
- Constitution of India (Legislative Department)