DPDP कानून और प्रेस की आज़ादी: न्यूज़ पब्लिशर्स सुप्रीम कोर्ट क्यों गए
भारत का डेटा संरक्षण कानून, डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम, 2023, आपके निजी डेटा की रक्षा करता है। लेकिन इसमें पत्रकारिता के लिए कोई ख़ास छूट नहीं है। न्यूज़ पब्लिशर्स का कहना है कि इससे रिपोर्टर को उसी व्यक्ति की सहमति लेनी पड़ सकती है जिसकी वह जाँच कर रहा है। 27 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका पर केंद्र को नोटिस दिया, पर अभी कानून पर रोक लगाने से मना कर दिया। जानिए निजता और प्रेस की आज़ादी की यह टक्कर आसान शब्दों में।

27 अक्टूबर 2026 को क्या हुआ
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने डिजिटल न्यूज़ पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA), यानी बड़ी न्यूज़ मीडिया कंपनियों के संगठन, की याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। याचिका DPDP अधिनियम, 2023 और DPDP नियम, 2025 के कुछ हिस्सों को चुनौती देती है।
DNPA की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने कहा कि कानून में पत्रकारिता गतिविधि के लिए कोई छूट नहीं है, इसलिए सहमति के नियम पत्रकारों को उन्हीं लोगों पर निर्भर बना सकते हैं जिन पर वे रिपोर्ट करते हैं, गोपनीय सूत्र उजागर हो सकते हैं, और यह "पूर्व-सेंसरशिप व्यवस्था" जैसा काम कर सकता है। याचिका कानून के तहत केंद्र की सूचना माँगने की शक्ति पर भी सवाल उठाती है। पीठ ने अंतरिम रोक से इनकार किया, कहा कि दूसरे पक्ष को सुने बिना वह कभी आदेश नहीं देगी, और मामले को DPDP कानून पर लंबित दूसरी याचिकाओं के साथ 17 नवंबर 2026 की सुनवाई के लिए जोड़ दिया।
एक नज़र मेंDPDP कानून और प्रेस की आज़ादी मामला: मुख्य तथ्य
| बिंदु | तथ्य |
|---|---|
| चुनौती दिया गया कानून | डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 (2023 का अधिनियम 22) और DPDP नियम, 2025 |
| याचिकाकर्ता | डिजिटल न्यूज़ पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) |
| पीठ | CJI सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची, न्यायमूर्ति वी. मोहना |
| मुख्य शिकायत | कानून में पत्रकारिता गतिविधि के लिए कोई छूट नहीं |
| दूसरे आधार | रिपोर्टर पर सहमति का बोझ, गोपनीय सूत्रों को ख़तरा, केंद्र की सूचना माँगने की शक्ति |
| 27 अक्टूबर 2026 का आदेश | केंद्र को नोटिस; कोई अंतरिम रोक नहीं |
| अगली सुनवाई | 17 नवंबर 2026, DPDP पर लंबित दूसरी याचिकाओं के साथ |
| कानून में जुर्माना | हर उल्लंघन पर 250 करोड़ रुपये तक, भारतीय डेटा संरक्षण बोर्ड लगाता है |
DPDP कानून के तहत जो भी किसी व्यक्ति का डिजिटल डेटा इस्तेमाल करता है, उसे डेटा फ़िड्यूशियरी कहते हैं। उसे आम तौर पर उस व्यक्ति की सहमति चाहिए, डेटा सिर्फ़ बताए गए मक़सद के लिए इस्तेमाल करना होता है और मक़सद पूरा होने पर मिटाना होता है। न्यूज़ संस्था भी डेटा फ़िड्यूशियरी है। तो अगर कोई रिपोर्टर किसी भ्रष्ट अफ़सर के फ़ोन रिकॉर्ड, संपत्ति के काग़ज़ या ईमेल जुटाता है, तो कानून साफ़ नहीं कहता कि रिपोर्टर इन ज़िम्मेदारियों से मुक्त है।
🏠 रोज़मर्रा की मिसाल
मान लीजिए कोई टीचर नियम बनाए: "कोई भी किसी सहपाठी के बारे में उसकी इजाज़त के बिना नहीं लिखेगा।" यह नियम शर्मीले बच्चों को बचाता है, लेकिन स्कूल के अख़बार को यह लिखने से भी रोक देता है कि क्लास मॉनिटर ने पिकनिक फ़ंड से पैसे लिए।
🇮🇳 असली भारतीय उदाहरण
फ़र्ज़ी डिग्री रैकेट या बैंक घोटाले की खोजी ख़बर में अक्सर शामिल लोगों के नाम, दस्तावेज़ और मैसेज होते हैं। पब्लिशर्स को डर है कि ऐसे लोग DPDP कानून के सहारे डेटा मिटाने की माँग कर सकते हैं या डेटा संरक्षण बोर्ड में शिकायत कर सकते हैं।
ग़ायब छूटपत्रकारिता की छूट कैसे ग़ायब हुई
| वर्ष | मसौदा या कानून | पत्रकारिता छूट? |
|---|---|---|
| 2018 | न्यायमूर्ति बी.एन. श्रीकृष्ण समिति का मसौदा विधेयक | हाँ, पत्रकारिता के उद्देश्य से, शर्तों के साथ |
| 2019 | व्यक्तिगत डेटा संरक्षण विधेयक, 2019 | हाँ, पत्रकारिता के उद्देश्य से |
| 2022 | DPDP विधेयक का मसौदा, 2022 | नहीं |
| 11 अगस्त 2023 | DPDP अधिनियम, 2023 को राष्ट्रपति की मंज़ूरी | नहीं; धारा 17 में दूसरी छूटें |
| नवंबर 2025 | DPDP नियम, 2025 अधिसूचित, चरणबद्ध लागू | नहीं |
| 27 अक्टूबर 2026 | DNPA याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का नोटिस | सवाल अब कोर्ट के सामने |
- कानून की धारा 17 क़ानूनी अधिकार लागू करने, अदालतों और न्यायाधिकरणों, अपराध रोकने और जाँच, तथा शोध, संग्रह या सांख्यिकी जैसे कामों के लिए छूट देती है, लेकिन ख़बर लिखने के लिए नहीं।
- धारा 36 केंद्र सरकार को डेटा संरक्षण बोर्ड या किसी भी डेटा फ़िड्यूशियरी से सूचना माँगने देती है; पब्लिशर्स को डर है कि इसका इस्तेमाल न्यूज़रूम के ख़िलाफ़ हो सकता है।
- धारा 44(3) ने व्यक्तिगत सूचना पर RTI अधिनियम की धारा 8(1)(j) बदली; उस बदलाव को भी अलग याचिकाओं में चुनौती दी गई है।
मूल पाठअनुच्छेद 19(1)(क), अनुच्छेद 19(2) और अनुच्छेद 21
भारत का संविधान, अनुच्छेद 19(1)(क) और 19(2). वाक्-स्वातंत्र्य आदि विषयक कुछ अधिकारों का संरक्षण।
(1) सभी नागरिकों को—
(क) वाक्-स्वातंत्र्य और अभिव्यक्ति-स्वातंत्र्य का,
अधिकार होगा।
(2) खंड (1) के उपखंड (क) की कोई बात उक्त उपखंड द्वारा दिए गए अधिकार के प्रयोग पर भारत की प्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार या सदाचार के हितों में अथवा न्यायालय-अवमान, मानहानि या अपराध-उद्दीपन के संबंध में युक्तियुक्त निर्बंधन जहाँ तक कोई विद्यमान विधि अधिरोपित करती है वहाँ तक उसके प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी या वैसे निर्बंधन अधिरोपित करने वाली कोई विधि बनाने से राज्य को निवारित नहीं करेगी।
अनुच्छेद 21. प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण।
किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं।
- प्रेस की आज़ादी अलग से नहीं लिखी गई; सुप्रीम कोर्ट रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य (1950) और इंडियन एक्सप्रेस न्यूज़पेपर्स बनाम भारत संघ (1985) से इसे अनुच्छेद 19(1)(क) का हिस्सा मानता आया है।
- निजता अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार है, यह नौ जजों की पीठ ने के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ (2017) में कहा। DPDP कानून इसी अधिकार को लागू करने के लिए है।
- अनुच्छेद 19(2) सिर्फ़ तय आधारों पर युक्तियुक्त निर्बंधन की अनुमति देता है। कोर्ट देखेगा कि पत्रकारों पर लागू होने पर DPDP के नियम उचित और आनुपातिक हैं या नहीं।
क्यों ज़रूरीनिजता बनाम प्रेस की आज़ादी: दोनों पक्ष
मौजूदा कानून के पक्ष में
- निजता मौलिक अधिकार है (पुट्टास्वामी)
- मीडिया को पूरी छूट का कोई भी ख़ुद को पत्रकार कहकर दुरुपयोग कर सकता है
- डॉक्सिंग और निजी डेटा लीक से आम लोग परेशान होते हैं
- असली जनहित वाली रिपोर्टिंग को अदालतें फिर भी बचा सकती हैं
पत्रकारिता छूट के पक्ष में
- खोजी ख़बरों को बिना सहमति के डेटा चाहिए
- गोपनीय सूत्र उजागर हो सकते हैं
- 250 करोड़ के जुर्माने का डर रिपोर्टिंग रोक सकता है
- यूरोप के GDPR समेत ज़्यादातर डेटा कानून पत्रकारिता को छूट देते हैं
संभावित बीच का रास्ता एक संतुलन परीक्षण है: असली जनहित वाली रिपोर्टिंग को बचाना, और गपशप या उत्पीड़न के लिए लोगों के निजी डेटा के दुरुपयोग को रोकना। पहले के मसौदों ने शर्तों के साथ यही कोशिश की थी; अब कोर्ट तय कर सकता है कि क्या संविधान ऐसा माँगता है।
UPSC कॉर्नरDPDP कानून और प्रेस की आज़ादी: UPSC प्रीलिम्स और मेन्स के लिए
- प्रीलिम्स: DPDP अधिनियम, 2023: डेटा प्रिंसिपल (व्यक्ति), डेटा फ़िड्यूशियरी (डेटा इस्तेमाल करने वाला), सहमति प्रबंधक, भारतीय डेटा संरक्षण बोर्ड, 250 करोड़ रुपये तक जुर्माना।
- प्रीलिम्स: प्रेस की आज़ादी अनुच्छेद 19(1)(क) से; पाबंदी सिर्फ़ अनुच्छेद 19(2) में। निजता अनुच्छेद 21 में (पुट्टास्वामी, 2017)।
- प्रीलिम्स: 2019 के विधेयक में पत्रकारिता छूट थी; 2023 के अधिनियम में नहीं।
- मेन्स (GS II): "डेटा संरक्षण सेंसरशिप का औज़ार नहीं बनना चाहिए।" DPDP अधिनियम, 2023 में पत्रकारिता छूट न होने का परीक्षण करें।
अभ्यास MCQख़ुद को परखें: DPDP कानून बनाम प्रेस की आज़ादी: केंद्र को SC का नोटिस
डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 के संदर्भ में इन कथनों पर विचार करें: (1) इसमें पत्रकारिता के उद्देश्य से व्यक्तिगत डेटा के इस्तेमाल के लिए ख़ास छूट है। (2) कानून के तहत जुर्माना भारतीय डेटा संरक्षण बोर्ड लगाता है। (3) यह कानून अनुच्छेद 21 में मान्य निजता के अधिकार को लागू करता है। ऊपर दिए गए कौन-से कथन सही हैं?
शंका समाधानअक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
DPDP कानून के ख़िलाफ़ DNPA का मामला क्या है?
डिजिटल न्यूज़ पब्लिशर्स एसोसिएशन का कहना है कि DPDP अधिनियम, 2023 और उसके नियमों में पत्रकारिता के लिए कोई छूट नहीं है, इसलिए सहमति और दूसरी ज़िम्मेदारियाँ खोजी रिपोर्टिंग रोक सकती हैं और सूत्र उजागर कर सकती हैं। वह चाहता है कि कोर्ट ऐसी छूट माने या ज़रूरी करे।
क्या सुप्रीम कोर्ट ने DPDP कानून पर रोक लगाई?
नहीं। 27 अक्टूबर 2026 को कोर्ट ने सिर्फ़ केंद्र को नोटिस दिया और अंतरिम रोक से इनकार किया। मामला DPDP की दूसरी याचिकाओं के साथ 17 नवंबर 2026 को सुना जाएगा।
क्या DPDP कानून पत्रकारों पर लागू होता है?
कानून हर उस पर लागू है जो डिजिटल व्यक्तिगत डेटा इस्तेमाल करता है, और धारा 17 में पत्रकारिता की छूट नहीं है। इसलिए पाठ के हिसाब से न्यूज़ संस्थाएँ भी बाक़ियों की तरह डेटा फ़िड्यूशियरी हैं। अब कोर्ट देखेगा कि यह संवैधानिक है या नहीं।
क्या भारत में प्रेस की आज़ादी मौलिक अधिकार है?
हाँ। यह अलग से नहीं लिखी गई, लेकिन सुप्रीम कोर्ट 1950 से मानता है कि प्रेस की आज़ादी अनुच्छेद 19(1)(क) की बोलने और अभिव्यक्ति की आज़ादी का हिस्सा है, अनुच्छेद 19(2) के युक्तियुक्त निर्बंधनों के अधीन।
DPDP कानून में अधिकतम जुर्माना कितना है?
व्यक्तिगत डेटा उल्लंघन रोकने के लिए उचित सुरक्षा उपाय न करने पर 250 करोड़ रुपये तक, जो भारतीय डेटा संरक्षण बोर्ड जाँच के बाद लगाता है।
स्रोत और आगे की पढ़ाईहमने जिन स्रोतों की जाँच की
तथ्य 29 अक्टूबर 2026 को नीचे दी गई रिपोर्टों से जाँचे गए। हमारी जाँच तक केंद्र का जवाब दाख़िल नहीं हुआ था; मामला लंबित है और यह पेज अपडेट किया जाएगा।
- Tribune (PTI): Supreme Court notice to Centre on news publishers' plea challenging data protection law (27 Oct 2026)
- Telangana Today: SC notice to Centre on news publishers' plea challenging data protection law (27 Oct 2026)
- ETV Bharat: SC notice to Centre on news publishers' plea challenging data protection law (27 Oct 2026)
- The News Mill: Supreme Court seeks Centre's reply on media plea challenging DPDP Act (Oct 2026)
- StartupTalky: SC issues notice to Centre on DNPA's DPDP Act plea
- India Code: Digital Personal Data Protection Act, 2023