शांति बंधपत्र धारा 126 BNSS: पुलिस प्रदर्शनकारियों से बॉन्ड क्यों माँगती है, और इसकी सीमाएँ
शांति बंधपत्र एक लिखित वादा है, जिसके पीछे पैसे की गारंटी और कभी-कभी ज़मानतदार होता है, कि आप तय समय तक सार्वजनिक शांति भंग नहीं करेंगे। यह न सज़ा है, न FIR। इस हफ़्ते दिल्ली की एक छात्र नेता ने ऐसे नोटिस को हाई कोर्ट में चुनौती दी। जानिए कानून, सुरक्षा-नियम, और नोटिस मिले तो क्या करें।

दिल्ली में क्या हुआ
17 अक्टूबर 2026 को दिल्ली में स्पेशल एग्ज़िक्यूटिव मजिस्ट्रेट के रूप में काम कर रहे एक पुलिस अधिकारी ने छात्र संगठन AISA की अध्यक्ष नेहा बोरा को BNSS की धारा 126 और 130 में नोटिस दिया और ₹10,000 का निजी बंधपत्र और एक ज़मानतदार देने को कहा। आधार बताए गए: 16 अक्टूबर को मंडी हाउस पर कथित नारेबाज़ी, धारा 163 BNSS के निषेधाज्ञा आदेशों के बावजूद जंतर मंतर के पास बार-बार प्रदर्शन, और कनॉट प्लेस के प्रदर्शन में शामिल होने का आह्वान। ये प्रदर्शन "वोट चोरी" के आरोपों पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की माँग को लेकर हैं।
उन्होंने दिल्ली हाई कोर्ट में कहा कि उन्हें नोटिस के पीछे का आदेश और सामग्री नहीं दी गई, और यह अनुच्छेद 19(1)(क) और 19(1)(ख) के उनके अधिकारों को दबाता है। दिल्ली पुलिस ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के ज़रिए याचिका की ग्राह्यता पर सवाल उठाया। कोर्ट ने 22 अक्टूबर को फ़ैसला सुरक्षित रखा।
अपडेट, 23 अक्टूबर 2026: दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने याचिका ख़ारिज कर दी, यानी नोटिस बना रहेगा और मजिस्ट्रेट की जाँच चल सकती है। लेकिन कोर्ट ने स्पेशल एग्ज़िक्यूटिव मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया कि जाँच से पहले नोटिस की पूरी सामग्री उन्हें दी जाए, ताकि वे जवाब दे सकें। रिपोर्टों के अनुसार जज ने कहा कि पर्याप्त सुरक्षा-उपाय और निर्देश मौजूद हैं। जाँच के समय लिखित आदेश सार्वजनिक नहीं था, इसलिए पूरे कारण बाद में और साफ़ होंगे।
बुनियादी बातेंशांति बंधपत्र (पीस बॉन्ड) धारा 126 BNSS क्या है?
| सवाल | BNSS के अनुसार जवाब |
|---|---|
| कौन जारी करता है? | कार्यपालक मजिस्ट्रेट (जैसे SDM, या स्पेशल एग्ज़िक्यूटिव मजिस्ट्रेट बनाया गया पुलिस अधिकारी), आपराधिक अदालत का जज नहीं |
| क्यों? | ऐसी सूचना कि कोई व्यक्ति शांति भंग कर सकता है या लोक प्रशांति बिगाड़ सकता है |
| क्या यह सज़ा है? | नहीं। यह निवारक है: यह आगे की बात देखता है, साबित हो चुके अपराध को नहीं |
| कितने समय के लिए? | एक साल तक (धारा 126) |
| आप क्या साइन करते हैं? | एक तय रक़म का बंधपत्र, ज़मानतदार के साथ या बिना (ज़मानतदार यानी आपकी गारंटी लेने वाला व्यक्ति) |
| तोड़ने पर क्या? | बंधपत्र की रक़म ज़ब्त हो सकती है, और जाँच के बाद आदेश होने पर बॉन्ड न देने पर उसे देने तक हिरासत हो सकती है |
| पुराना कानून | धारा 107 CrPC (अब 126 BNSS); लिखित आदेश धारा 111 CrPC (अब 130 BNSS) |
शांति बंधपत्र सरकार को दिया गया वादे का काग़ज़ है: "अगले कुछ महीने मैं कोई झगड़ा नहीं करूँगा, और करूँ तो यह पैसा जाएगा।" मजिस्ट्रेट यह तय नहीं करता कि आपने अपराध किया या नहीं। वह सिर्फ़ देखता है कि क्या कोई ठोस और साफ़ सूचना है कि आप जल्द शांति भंग कर सकते हैं।
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सोचिए, स्कूल कल झगड़ने वाले दो बच्चों से माता-पिता के साइन के साथ लिखवा ले कि इस सत्र में फिर नहीं लड़ेंगे। किसी को निकाला नहीं गया, बस वादा काग़ज़ पर आ गया।
🇮🇳 असली भारतीय उदाहरण
चुनाव से पहले देशभर के ज़िला प्रशासन इसी धारा में जाने-माने झगड़ालू लोगों से बॉन्ड भरवाते हैं ताकि मतदान शांति से हो। अब यही शक्ति दिल्ली में छात्र प्रदर्शनकारियों पर इस्तेमाल हो रही है।
मूल पाठधारा 126 और 130 BNSS तथा अनुच्छेद 19(1)
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 · धारा 126(1). अन्य मामलों में शांति बनाए रखने के लिए प्रतिभूति।
जब किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट को यह सूचना मिलती है कि कोई व्यक्ति परिशांति भंग करने वाला है या लोक प्रशांति में विघ्न डालने वाला है, या कोई ऐसा अनुचित कार्य करने वाला है जिससे संभवतः परिशांति भंग या लोक प्रशांति में विघ्न होगा, और उसकी राय है कि कार्यवाही के लिए पर्याप्त आधार है, तो वह आगे बताई गई रीति से उस व्यक्ति से कारण बताने की अपेक्षा कर सकता है कि उसे ऐसी अवधि के लिए, जो एक वर्ष से अधिक न हो, शांति बनाए रखने के लिए बंधपत्र या ज़मानत बंधपत्र निष्पादित करने का आदेश क्यों न दिया जाए।
धारा 130. आदेश का दिया जाना।
जब धारा 125, 126, 127, 128 या 129 के अधीन कार्य करने वाला मजिस्ट्रेट किसी व्यक्ति से कारण बताने की अपेक्षा करना आवश्यक समझता है, तो वह लिखित आदेश देगा, जिसमें प्राप्त सूचना का सार, निष्पादित किए जाने वाले बंधपत्र की राशि, उसके लागू रहने की अवधि और अपेक्षित प्रतिभुओं (ज़मानतदारों) की संख्या, यदि कोई हो, लिखी होगी।
भारत का संविधान, अनुच्छेद 19(1). सभी नागरिकों को (क) वाक्-स्वातंत्र्य और अभिव्यक्ति-स्वातंत्र्य का; (ख) शांतिपूर्वक और निरायुध सम्मेलन का … अधिकार होगा।
सुरक्षा-नियमशांति बंधपत्र नोटिस की सीमाएँ: अदालतों ने क्या कहा
- कारण सहित लिखित आदेश: धारा 130 BNSS (पुरानी 111 CrPC) अनिवार्य है। आदेश में सूचना का सार, रक़म, अवधि और ज़मानतदार लिखे होने चाहिए। मधु लिमये बनाम SDM मुंगेर (1970) में सुप्रीम कोर्ट ने यह शक्ति वैध मानी, पर कहा कि यह लिखित आदेश अहम सुरक्षा है; गोलमोल नोटिस कानून में ग़लत है।
- अंतिम आदेश से पहले जाँच: व्यक्ति कारण बता सकता है, और बॉन्ड का आदेश देने से पहले मजिस्ट्रेट को जाँच करके सबूत दर्ज करने होते हैं (धारा 136 BNSS, पुरानी 116 CrPC)।
- रक़म उचित हो: व्यक्ति की हैसियत के हिसाब से बॉन्ड ज़्यादा नहीं होना चाहिए (धारा 140 BNSS, पुरानी 121 CrPC)।
- विरोध करना शांति भंग नहीं: शांतिपूर्ण विरोध अनुच्छेद 19(1)(क) और (ख) से सुरक्षित है। इस पर सिर्फ़ लोक व्यवस्था के हित में युक्तियुक्त निर्बंधन लग सकते हैं (अनुच्छेद 19(2) और 19(3)), सिर्फ़ इसलिए नहीं कि सरकार को मुद्दा पसंद नहीं।
- उपाय: नोटिस को सेशन कोर्ट में रिवीज़न या हाई कोर्ट में उसकी अंतर्निहित शक्तियों (धारा 528 BNSS, पुरानी 482 CrPC) और अनुच्छेद 226 के तहत चुनौती दी जा सकती है।
पुलिस इसे क्यों इस्तेमाल करती है
- हिंसा होने से पहले रोकती है
- जल्दी होता है, FIR या मुक़दमा नहीं चाहिए
- चुनाव, त्योहार और बड़ी रैलियों से पहले काम का
आलोचकों की चिंता
- शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को डराने में इस्तेमाल हो सकता है
- फ़ैसला जज नहीं, कार्यपालिका के अधिकारी करते हैं
- गोलमोल नोटिस असली सामग्री छिपा लेता है
नोटिस मिले तोधारा 126 BNSS का नोटिस मिला? क्या करें
- 1नोटिस पढ़ें और आदेश माँगें
देखें कि उसमें धारा 130 का ज़िक्र है और सूचना का सार, रक़म और अवधि लिखी है। आदेश और उस पर आधारित सामग्री की कॉपी लिखित में माँगें।
- 2तय तारीख़ पर पेश हों
कारण बताओ नोटिस गिरफ़्तारी नहीं है। ख़ुद या वकील के ज़रिए मजिस्ट्रेट के सामने जाएँ और सूचना ग़लत हो तो कहें।
- 3लिखित जवाब दें
बताएँ कि आपकी गतिविधि शांतिपूर्ण है और अनुच्छेद 19 से सुरक्षित है। बॉन्ड के आदेश से पहले सबूत के साथ जाँच की माँग करें।
- 4ज़रूरत हो तो मुफ़्त क़ानूनी मदद लें
छात्र और कम आय वाले लोग ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण से मुफ़्त वकील पा सकते हैं (हेल्पलाइन 15100)।
- 5ग़लत आदेश को चुनौती दें
सेशन कोर्ट में रिवीज़न या हाई कोर्ट में याचिका दायर करें, जैसा नेहा बोरा ने किया।
UPSC कॉर्नरUPSC प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा के लिए शांति बंधपत्र (धारा 126 BNSS)
- प्रारंभिक: BNSS का अध्याय IX (धारा 125 से 143) शांति बनाए रखने और सदाचार के लिए प्रतिभूति से जुड़ा है; धारा 125 दोषसिद्धि पर, धारा 126 बिना दोषसिद्धि के, धारा 127 राजद्रोही बातें फैलाने पर, धारा 128 संदिग्ध व्यक्तियों पर और धारा 129 आदतन अपराधियों पर लागू है।
- धारा 126 में अधिकतम अवधि: एक साल। कौन: कार्यपालक मजिस्ट्रेट।
- मुख्य परीक्षा (GS II): "कार्यपालिका की निवारक शक्तियाँ और विरोध का अधिकार": मधु लिमये (1970), शांतिपूर्ण विरोध पर अनीता ठाकुर (2016), विरोध और लोक व्यवस्था के संतुलन पर मज़दूर किसान शक्ति संगठन (2018) की चर्चा करें।
- नीतिशास्त्र (GS IV): अधिकारियों का कर्तव्य कि निवारक शक्तियों का प्रयोग सद्भाव से करें, असहमति दबाने के लिए नहीं।
अभ्यास MCQख़ुद को परखें: शांति बंधपत्र (पीस बॉन्ड) धारा 126 BNSS
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 126 के तहत शांति बनाए रखने के बंधपत्र के संदर्भ में इन कथनों पर विचार करें: (1) यह केवल किसी अपराध में दोषसिद्धि के बाद ही माँगा जा सकता है। (2) कार्यपालक मजिस्ट्रेट इसे एक वर्ष से अनधिक अवधि के लिए माँग सकता है। (3) कारण बताने का आदेश में प्राप्त सूचना का सार लिखा होना चाहिए। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
शंका समाधानअक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
शांति बंधपत्र (पीस बॉन्ड) क्या है?
यह एक लिखित वचन है, जिसके साथ पैसे की गारंटी और कभी-कभी ज़मानतदार होते हैं, कि व्यक्ति एक साल तक की तय अवधि में शांति बनाए रखेगा। इसे कार्यपालक मजिस्ट्रेट धारा 126 BNSS में माँगता है।
क्या धारा 126 BNSS का नोटिस FIR या गिरफ़्तारी है?
नहीं। यह निवारक कार्यवाही है। किसी अपराध का मुक़दमा नहीं चल रहा। आपसे बस कारण पूछा जाता है कि आपसे बॉन्ड क्यों न भरवाया जाए।
शांति बंधपत्र की पुरानी धारा कौन-सी थी?
दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 107। लिखित आदेश धारा 111 CrPC में था, जो अब धारा 130 BNSS है।
क्या शांति बंधपत्र नोटिस को चुनौती दी जा सकती है?
हाँ। आप मजिस्ट्रेट को जवाब दे सकते हैं, जाँच माँग सकते हैं, और ग़लत आदेश को सेशन कोर्ट या हाई कोर्ट में चुनौती दे सकते हैं।
नेहा बोरा का मामला ख़बरों में क्यों है?
दिल्ली के एक स्पेशल एग्ज़िक्यूटिव मजिस्ट्रेट ने CEC-विरोधी प्रदर्शनों के दौरान AISA अध्यक्ष से ₹10,000 का बॉन्ड माँगा। 23 अक्टूबर 2026 को दिल्ली हाई कोर्ट ने उनकी चुनौती ख़ारिज कर दी, पर मजिस्ट्रेट को आदेश दिया कि जाँच से पहले नोटिस की पूरी सामग्री उन्हें दी जाए।
स्रोत और आगे की पढ़ाईहमने जिन स्रोतों की जाँच की
इस पेज के समाचार तथ्य 24 अक्टूबर 2026 को, दिल्ली हाई कोर्ट के 23 अक्टूबर के फ़ैसले के बाद, नीचे दी गई रिपोर्टों से जाँचे गए (लिखित आदेश तब सार्वजनिक नहीं था)। धाराओं का पाठ BNSS, 2023 से है।
- ThePrint: Delhi HC rejects Neha Bora's plea, directs magistrate to share material behind peace bond notice (23 Oct 2026)
- LiveLaw: Delhi High Court's judgment on Neha Bora's plea against peace bond notice, live updates (23 Oct 2026)
- LiveLaw: Delhi High Court reserves verdict on Neha Bora's plea against peace bond notice amid anti-CEC protests (22 Oct 2026)
- LiveLaw: Neha Bora moves Delhi High Court, challenges notice for peace bond
- Deccan Herald: Anti-CEC protests, AISA president Neha Bora moves Delhi High Court against police notice
- Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023 (India Code)
- Constitution of India (Legislative Department)