चुनाव आयुक्तों की कानूनी छूट: धारा 16 CEC अधिनियम 2023, अनुच्छेद 324 और सुप्रीम कोर्ट में चुनौती
क्या मुख्य चुनाव आयुक्त पर अपने आधिकारिक कामों के लिए कभी मुक़दमा नहीं चल सकता, रिटायरमेंट के बाद भी? 13 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इस सवाल की जाँच करने का फ़ैसला किया। जानिए धारा 16 क्या कहती है, यह जजों और राष्ट्रपति के संरक्षण से कैसे अलग है, और इसे अनुच्छेद 14 और 21 के तहत चुनौती क्यों दी गई है।

13 अक्टूबर 2026 को क्या हुआ
CJI सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की सुप्रीम कोर्ट पीठ ने एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ॉर्म्स (ADR) की याचिका पर भारत संघ और निर्वाचन आयोग को नोटिस जारी किया। याचिका की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने बहस की। याचिका मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 की धारा 16 को चुनौती देती है, जो अदालतों को किसी मौजूदा या पूर्व CEC या चुनाव आयुक्त के विरुद्ध आधिकारिक कर्तव्य में किए गए कामों के लिए कोई सिविल या आपराधिक मामला सुनने से रोकती है।
इस याचिका को इसी मुद्दे पर NGO लोक प्रहरी की लंबित याचिका के साथ जोड़ (टैग कर) दिया गया। ADR का कहना है कि यह छूट पूर्ण और आजीवन है, सद्भावना (good faith) की शर्त से बँधी नहीं है और इसमें अनुमति (sanction) की कोई व्यवस्था नहीं है, इसलिए यह अनुच्छेद 14 और 21 तथा मूल ढाँचे का उल्लंघन करती है। याचिका माँग करती है कि धारा 16 लागू होने से जो कार्यवाहियाँ ख़त्म हो गईं, उन्हें फिर से शुरू किया जाए। LiveLaw ने पहले बताया था कि कोर्ट ने टिप्पणी की कि CEC और चुनाव आयुक्तों को जजों से भी ज़्यादा कानूनी छूट मिली है। अगली सुनवाई की तारीख़ की कोई जानकारी नहीं है। मामला लंबित है और धारा 16 अभी लागू है।
पृष्ठभूमिधारा 16 CEC अधिनियम 2023: छूट वाला प्रावधान कैसे जुड़ा
| तारीख़ | क्या हुआ |
|---|---|
| 1950 | अनुच्छेद 324 से निर्वाचन आयोग बना; नियुक्ति और सेवा शर्तों पर संसद क़ानून बना सकती है। |
| 1991 | निर्वाचन आयोग (निर्वाचन आयुक्तों की सेवा की शर्तें और कार्य संचालन) अधिनियम, 1991 सेवा शर्तें तय करता है। इसमें कोई छूट का प्रावधान नहीं था। |
| 1995 | टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ: सुप्रीम कोर्ट ने बहु-सदस्यीय निर्वाचन आयोग को सही ठहराया। |
| 2 मार्च 2023 | अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (संविधान पीठ): जब तक संसद क़ानून न बनाए, CEC और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष (या सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता) और CJI की समिति की सलाह पर हो। |
| अगस्त 2023 | CEC विधेयक पेश हुआ। न मूल विधेयक में और न उसके उद्देश्यों और कारणों के कथन में कोई छूट वाला प्रावधान था। |
| 11 दिसंबर 2023 | नया खंड 15A (छूट वाला खंड) जोड़ने वाला सरकारी संशोधन वितरित हुआ। |
| 12 दिसंबर 2023 | राज्यसभा ने उसी दिन खंड 15A सहित विधेयक पारित किया; इस खंड पर कोई बहस नहीं हुई और प्रवर समिति को भेजने के प्रस्ताव अस्वीकार हुए। |
| 21 दिसंबर 2023 | लोकसभा ने बिना संशोधन विधेयक पारित किया, जब कई विपक्षी सांसद निलंबित थे। खंड 15A अधिनियम की धारा 16 बना। |
| 13 अक्टूबर 2026 | सुप्रीम कोर्ट ने ADR की याचिका पर नोटिस जारी किया और उसे लोक प्रहरी की लंबित याचिका से जोड़ा। लंबित। |
ध्यान दें: 2023 अधिनियम के नियुक्ति वाले प्रावधानों (CJI के बिना चयन समिति) की चुनौती अलग मामला है, जो सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। यह पेज छूट वाले प्रावधान के बारे में है।
धारा का पाठधारा 16 CEC अधिनियम 2023: मुख्य चुनाव आयुक्त की आजीवन छूट
धारा 16. मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों का संरक्षण।
तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, कोई न्यायालय किसी ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध, जो मुख्य निर्वाचन आयुक्त या निर्वाचन आयुक्त है या रहा है, किसी ऐसे कार्य, बात या शब्द के लिए, जो उसने अपने पदीय कर्तव्य या कृत्य के निर्वहन में कार्य करते हुए या कार्य करने का तात्पर्य रखते हुए किया हो या बोला हो, कोई सिविल या आपराधिक कार्यवाही न तो ग्रहण करेगा और न जारी रखेगा।
धारा 16 भारत की हर अदालत से कहती है: जो व्यक्ति CEC या चुनाव आयुक्त है या रहा है, उसके विरुद्ध कोई सिविल मुक़दमा या आपराधिक मामला न सुनें, अगर शिकायत उस काम या बात को लेकर है जो उसने अपना आधिकारिक कर्तव्य निभाते हुए (या निभाने का दावा करते हुए) किया या कहा। चार बातें इसे असामान्य बनाती हैं:
- आजीवन: "है या रहा है" शब्दों का मतलब है कि रिटायरमेंट के बाद भी कवच बना रहता है।
- पूर्ण: सिविल और आपराधिक दोनों मामले शामिल।
- सद्भावना की शर्त नहीं: काम ईमानदारी से किया गया हो, यह ज़रूरी नहीं; "कार्य करने का तात्पर्य रखते हुए" में वे काम भी आ सकते हैं जिन्हें केवल आधिकारिक बताया गया हो।
- न अनुमति का रास्ता, न बचाव खंड: किसी को, सरकार या हाई कोर्ट को भी, मामला आगे बढ़ाने की अनुमति देने की शक्ति नहीं दी गई।
🏠 रोज़मर्रा की मिसाल
मान लीजिए स्कूल अपने परीक्षा नियंत्रक को एक बैज दे जिस पर लिखा हो: "नियंत्रक रहते हुए मैंने जो भी किया, उसके लिए मेरे ख़िलाफ़ कभी कोई शिकायत नहीं हो सकती, स्कूल छोड़ने के बाद भी।" अंक ग़लत तरीक़े से बदले गए हों, तब भी अभिभावकों के पास शिकायत की कोई जगह नहीं होगी।
🇮🇳 असली भारतीय उदाहरण
अगर किसी मतदाता का कहना है कि एक आधिकारिक फ़ैसले से उसका नाम मतदाता सूची से ग़लत हटाया गया, तो धारा 16 CEC या चुनाव आयुक्त के विरुद्ध व्यक्तिगत रूप से हर्जाने के मुक़दमे को रोक देगी। वह रिट याचिका से फ़ैसले को चुनौती दे सकती है, पर अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से ज़िम्मेदार नहीं ठहरा सकती।
धारा 16 किसे नहीं रोकती: यह व्यक्ति के विरुद्ध सिविल और आपराधिक कार्यवाही पर रोक लगाती है। निर्वाचन आयोग के फ़ैसलों की समीक्षा के लिए हाई कोर्ट (अनुच्छेद 226) और सुप्रीम कोर्ट (अनुच्छेद 32) के रिट क्षेत्राधिकार को, और अनुच्छेद 324(5) के तहत CEC को हटाने की प्रक्रिया को यह नहीं छूती।
संवैधानिक आधारअनुच्छेद 324: चुनाव आयुक्तों को स्वतंत्रता क्यों चाहिए
324. निर्वाचनों के अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण का निर्वाचन आयोग में निहित होना।
(1) इस संविधान के अधीन संसद और प्रत्येक राज्य के विधान-मंडल के लिए कराए जाने वाले सभी निर्वाचनों के लिए तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के निर्वाचनों के लिए निर्वाचक-नामावली तैयार कराने का और उन सभी निर्वाचनों के संचालन का अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण एक आयोग में निहित होगा (जिसे इस संविधान में निर्वाचन आयोग कहा गया है)।
(2) निर्वाचन आयोग मुख्य निर्वाचन आयुक्त और उतने अन्य निर्वाचन आयुक्तों से, यदि कोई हों, जितने राष्ट्रपति समय-समय पर नियत करे, मिलकर बनेगा तथा मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति, संसद द्वारा इस निमित्त बनाई गई विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए, राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी।
(5) संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए, निर्वाचन आयुक्तों और प्रादेशिक आयुक्तों की सेवा की शर्तें और पदावधि ऐसी होंगी जो राष्ट्रपति नियम द्वारा अवधारित करे:
परंतु मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसके पद से उसी रीति से और उन्हीं आधारों पर ही हटाया जाएगा, जिस रीति से और जिन आधारों पर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है, अन्यथा नहीं और मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति के पश्चात् उसकी सेवा की शर्तों में उसके लिए अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जाएगा:
परंतु यह और कि किसी अन्य निर्वाचन आयुक्त या प्रादेशिक आयुक्त को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफ़ारिश पर ही पद से हटाया जाएगा, अन्यथा नहीं।
अनुच्छेद 324 पूरी चुनाव व्यवस्था (मतदाता सूची बनाना और संसद, राज्य विधानमंडलों तथा राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति के पदों के चुनाव कराना) निर्वाचन आयोग को सौंपता है। संविधान CEC की स्वतंत्रता दो तरह से बचाता है: उसे केवल सुप्रीम कोर्ट के जज की तरह (साबित कदाचार या अक्षमता पर महाभियोग जैसी प्रक्रिया से) हटाया जा सकता है, और नियुक्ति के बाद उसकी सेवा शर्तें उसके नुकसान में नहीं बदली जा सकतीं। अन्य चुनाव आयुक्तों को केवल CEC की सिफ़ारिश पर हटाया जा सकता है। ध्यान दें कि संविधान अदालतों से कोई छूट नहीं देता। धारा 16 यह छूट एक साधारण क़ानून से जोड़ती है।
🏠 रोज़मर्रा की मिसाल
क्रिकेट अंपायर को निडर होना चाहिए, इसलिए बोर्ड कहता है कि किसी अलोकप्रिय फ़ैसले के लिए उसे बीच मैच में नहीं हटाया जाएगा। यह नौकरी की सुरक्षा है। धारा 16 इससे आगे जाती है: यह कहने जैसा है कि अंपायर को कभी किसी मंच पर नहीं ले जाया जा सकता, फ़ैसले की आड़ में रिश्वत लेने पर भी नहीं।
🇮🇳 असली भारतीय उदाहरण
2023 अधिनियम एक चयन समिति बनाता है जिसमें प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री हैं (अनूप बरनवाल में सुझाए गए CJI की जगह), और विधि मंत्री की अध्यक्षता में एक खोज समिति है। इससे पहले दिनेश गोस्वामी समिति (1990) और विधि आयोग की 255वीं रिपोर्ट (2015) ने CJI सहित व्यापक, कॉलेजियम जैसी चयन संस्था की सिफ़ारिश की थी।
तुलनात्मक विभाजनचुनाव आयुक्तों की कानूनी छूट बनाम जज, राष्ट्रपति और विधायक
कोर्ट ने यह क्यों कहा कि चुनाव आयुक्तों को अब जजों से ज़्यादा संरक्षण है? धारा 16 की तुलना भारतीय क़ानून के अन्य संरक्षणों से कीजिए:
| पद | संरक्षण | सीमाएँ |
|---|---|---|
| राष्ट्रपति, राज्यपाल (अनु. 361) | पदावधि में कोई आपराधिक मामला नहीं; सिविल मामला केवल दो महीने के लिखित नोटिस के बाद। | केवल पदावधि के दौरान; उसके बाद सामान्य क़ानून लागू। |
| सांसद, विधायक (अनु. 105, 194) | सदन में कही गई बात या दिए गए मत के लिए कोई अदालती कार्यवाही नहीं। | केवल सदन में भाषण और मत के लिए, सभी आधिकारिक कामों के लिए नहीं। |
| जज (न्यायाधीश (संरक्षण) अधिनियम, 1985) | धारा 3(1): आधिकारिक या न्यायिक कामों के लिए अदालतें सिविल या आपराधिक कार्यवाही ग्रहण नहीं करेंगी। | धारा 3(2) सरकार, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की सिविल, आपराधिक या विभागीय कार्रवाई की शक्ति बचाती है। |
| लोक सेवक (BNSS धारा 218, पहले CrPC धारा 197; PC अधिनियम धारा 17A) | आधिकारिक कामों के लिए अभियोजन या जाँच से पहले अनुमति ज़रूरी। | यह छन्नी है, छूट नहीं: अनुमति मिलने पर मामला चलता है। |
| CAG, लोक सेवा आयोग सदस्य, लोकपाल, लोकायुक्त, सूचना आयुक्त | ऐसी कोई पूर्ण वैधानिक छूट नहीं। | सामान्य क़ानून, जहाँ लागू हो वहाँ अनुमति के नियम। |
| CEC और चुनाव आयुक्त (धारा 16, CEC अधिनियम 2023) | किसी भी आधिकारिक काम, शब्द या बात के लिए कोई सिविल या आपराधिक कार्यवाही नहीं। | आजीवन, सद्भावना की शर्त नहीं, अनुमति का रास्ता नहीं, बचाव खंड नहीं। |
🧑⚖️ न्यायाधीश (संरक्षण) अधिनियम, 1985
- धारा 3(1) में मिलते-जुलते शब्द: "जो जज है या रहा है"।
- धारा 3(1) स्पष्ट रूप से उपधारा (2) के अधीन है।
- धारा 3(2) सरकार, सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट द्वारा सिविल, आपराधिक या विभागीय कार्रवाई का रास्ता खुला रखती है।
- यानी उचित प्राधिकारी के ज़रिए जज के विरुद्ध कार्रवाई हो सकती है।
🗳️ धारा 16, CEC अधिनियम 2023
- वही "है या रहा है" शब्द, पूर्व पदधारी भी शामिल।
- शुरुआत "किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी" से।
- कोई बचाव खंड नहीं और कार्यवाही की अनुमति देने वाला कोई प्राधिकारी नहीं।
- नतीजा: जजों से भी चौड़ा कवच, इसीलिए आलोचक इसे आजीवन छूट कहते हैं।
361. राष्ट्रपति और राज्यपालों और राजप्रमुखों का संरक्षण।
(2) राष्ट्रपति या किसी राज्य के राज्यपाल के विरुद्ध उसकी पदावधि के दौरान किसी न्यायालय में किसी भी प्रकार की दांडिक कार्यवाही संस्थित नहीं की जाएगी या चालू नहीं रखी जाएगी।
(3) राष्ट्रपति या किसी राज्य के राज्यपाल की पदावधि के दौरान उसकी गिरफ़्तारी या कारावास के लिए किसी न्यायालय से कोई आदेशिका निकाली नहीं जाएगी।
गणतंत्र के सर्वोच्च पद, राष्ट्रपति, को भी आपराधिक मामलों से केवल पद पर रहते हुए संरक्षण मिलता है। विधायकों का संरक्षण सदन के भीतर कही बात या दिए गए मत तक सीमित है। धारा 16 CEC और चुनाव आयुक्तों को ऐसा संरक्षण देती है जो समय में राष्ट्रपति से ज़्यादा (आजीवन) और दायरे में जज से ज़्यादा (बचाव खंड नहीं) है।
🏠 रोज़मर्रा की मिसाल
स्कूल के प्रिंसिपल को सुबह की प्रार्थना सभा के बीच थाने नहीं बुलाया जा सकता, पर कार्यकाल ख़त्म होने के बाद वह बाक़ी सबकी तरह जवाबदेह है। धारा 16 मानो परीक्षा नियंत्रक को कभी न ख़त्म होने वाला पास दे देती है।
🇮🇳 असली भारतीय उदाहरण
सरकारी अस्पताल में लापरवाही के आरोपी डॉक्टर पर सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के बाद मुक़दमा चल सकता है। धारा 16 के तहत पूर्व चुनाव आयुक्त पर आधिकारिक कामों के लिए मुक़दमा चल ही नहीं सकता, क्योंकि अनुमति देने वाला कोई प्राधिकारी ही नहीं है।
चुनौती के आधारक्या धारा 16 वैध है? अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 21 और मूल ढाँचा
14. विधि के समक्ष समता।
राज्य, भारत के राज्यक्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता से या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा।
21. प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण।
किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं।
- 1युक्तियुक्त वर्गीकरण (अनुच्छेद 14)
क़ानून किसी समूह से अलग व्यवहार तभी कर सकता है जब बोधगम्य अंतर (intelligible differentia) हो और क़ानून के उद्देश्य से उसका तर्कसंगत संबंध (rational nexus) हो (पश्चिम बंगाल राज्य बनाम अनवर अली सरकार, 1952)। ADR का तर्क है कि CEC होना किसी को सभी अदालतों से बाहर रखने का वैध आधार नहीं, और आजीवन छूट का पद पर रहते हुए स्वतंत्रता से कोई संबंध नहीं।
- 2दर्जे पर आधारित संरक्षण पहले भी रद्द
सुब्रमण्यम स्वामी बनाम निदेशक, CBI (2014) में संविधान पीठ ने DSPE अधिनियम की धारा 6A रद्द की, जो संयुक्त सचिव और ऊपर के अधिकारियों की जाँच से पहले सरकार की मंज़ूरी माँगती थी। पद या दर्जे के आधार पर जाँच से संरक्षण को अनुच्छेद 14 का उल्लंघन माना गया। ADR इसी पर भरोसा करता है।
- 3स्पष्ट मनमानी (अनुच्छेद 14)
जो क़ानून मनमाना, तर्कहीन या पर्याप्त सिद्धांत के बिना हो, उसे रद्द किया जा सकता है (शायरा बानो बनाम भारत संघ, 2017)। याचिका कहती है कि सद्भावना की शर्त और अनुमति के रास्ते के बिना पूर्ण कवच स्पष्ट रूप से मनमाना है।
- 4न्याय तक पहुँच (अनुच्छेद 21)
ग़लत कामों के पीड़ितों को उपचार का अधिकार है। सिविल और आपराधिक, हर अदालती दरवाज़ा बंद कर देने से अवैध आधिकारिक काम से पीड़ित व्यक्ति के पास ग़लती करने वाले के विरुद्ध कोई उपाय नहीं बचता।
- 5विधि का शासन और मूल ढाँचा
विधि के समक्ष समता (ए.वी. डायसी का विचार कि कोई क़ानून से ऊपर नहीं) और न्यायिक समीक्षा मूल ढाँचे का हिस्सा हैं (केशवानंद भारती, 1973)। इंदिरा गांधी बनाम राज नारायण (1975) ने स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव को मूल ढाँचे का हिस्सा माना। ADR का तर्क है कि जवाबदेही से मुक्त चुनाव अधिकारी दोनों को कमज़ोर करते हैं।
कोर्ट दो सीधे सवाल पूछेगा। पहला, क्या CEC और चुनाव आयुक्तों को बाक़ी सभी लोक सेवकों से अलग रखने का कोई ठोस कारण है? दूसरा, क्या आजीवन, बिना शर्त कवच सचमुच उसी कारण की पूर्ति करता है, या उससे बहुत आगे निकल जाता है? अगर दूसरे का जवाब "बहुत आगे" है, तो प्रावधान रद्द किया जा सकता है या सीमित अर्थ में पढ़ा जा सकता है (जैसे सद्भावना की शर्त जोड़कर)।
🏠 रोज़मर्रा की मिसाल
दुकान अपने कैशियर को नाराज़ ग्राहकों की झूठी शिकायतों से बचाने का बीमा देती है। यह उचित है। पर यह नियम कि कैशियर से कभी सवाल नहीं होगा, गल्ले से चोरी करने पर भी नहीं, ग़लत चीज़ की रक्षा करता है।
🇮🇳 असली भारतीय उदाहरण
याचिका बताती है कि धारा 16 लागू होने के समय लंबित कार्यवाहियाँ इसी वजह से ख़त्म हो गईं, और कोर्ट से उन्हें फिर शुरू करने की माँग करती है। कोर्ट ऐसा करेगा या नहीं, अभी पता नहीं।
तर्कमुख्य चुनाव आयुक्त की आजीवन छूट: पक्ष और विपक्ष के तर्क
✅ छूट के पक्ष में
- चुनाव आयुक्त गरम चुनावी माहौल में कड़े फ़ैसले लेते हैं (आचार संहिता पर कार्रवाई, चुनाव कार्यक्रम, मतदाता सूची संशोधन) और उन पर कई राजनीतिक शिकायतें होती हैं।
- परेशान करने वाले, दुर्भावनापूर्ण मुक़दमों से संरक्षण उन्हें निजी मुक़दमेबाज़ी के डर के बिना फ़ैसले लेने में मदद करता है।
- अनुच्छेद 324 का उद्देश्य स्वतंत्र आयोग है; व्यक्तिगत छूट को उस स्वतंत्रता का सहारा माना जा सकता है।
- उनके फ़ैसले फिर भी रिट याचिका और चुनाव याचिका से चुनौती योग्य रहते हैं।
- जजों को भी न्यायाधीश (संरक्षण) अधिनियम, 1985 के तहत मिलता-जुलता वैधानिक संरक्षण है।
❌ छूट के विरोध में
- आजीवन: रिटायरमेंट के बाद संरक्षण का पद पर रहते हुए स्वतंत्रता से कोई संबंध नहीं।
- सद्भावना की शर्त नहीं: दुर्भावना या भ्रष्टाचार से किए काम भी शामिल, अगर उन्हें आधिकारिक बताया जाए।
- BNSS धारा 218 या न्यायाधीश (संरक्षण) अधिनियम की धारा 3(2) के विपरीत न अनुमति की व्यवस्था, न बचाव खंड।
- अनुच्छेद 361 में राष्ट्रपति के संरक्षण से और अनुच्छेद 105 व 194 में विधायकों के संरक्षण से भी ज़्यादा चौड़ा।
- सरकारी संशोधन से देर से जोड़ा गया, इस खंड पर बहस नहीं हुई, और विधेयक के उद्देश्यों और कारणों के कथन में इसका ज़िक्र नहीं।
- स्वतंत्रता और जवाबदेही साथ चलती हैं; चुनावों पर भरोसा इस पर निर्भर है कि रेफ़री भी जवाबदेह हो।
दोनों पक्ष मानते हैं कि CEC को उत्पीड़न से आज़ादी चाहिए। मतभेद इस पर है कि कितना संरक्षण काफ़ी है। छन्नी (जैसे अनुमति) फ़ालतू मामलों को रोकती है और असली मामलों को जाने देती है। दीवार (जैसे धारा 16) सब कुछ रोक देती है।
🏠 रोज़मर्रा की मिसाल
मच्छरदानी मच्छरों को रोकती है पर हवा आने देती है। बंद कमरा भी मच्छर रोकता है, पर उसमें साँस नहीं ली जा सकती। बहस यह है कि धारा 16 मच्छरदानी है या बंद कमरा।
🇮🇳 असली भारतीय उदाहरण
ऐसे संरक्षण के पक्ष में आम तर्क यह दिया जाता है कि पदधारियों को चुनाव के समय के फ़ैसलों से उठने वाले मुक़दमों से बचाया जाए। याचिकाकर्ता ADR और लोक प्रहरी का कहना है कि सीमित संरक्षण से भी यही लक्ष्य हासिल हो सकता है।
सुधारआगे की राह: चुनाव आयुक्तों की स्वतंत्रता और जवाबदेही में संतुलन
- 1सद्भावना की शर्त
संरक्षण केवल आधिकारिक कर्तव्य में सद्भावना से किए गए कामों तक सीमित हो, जो भारतीय क़ानूनों में आम तरीक़ा है।
- 2रोक की जगह अनुमति की छन्नी
BNSS धारा 218 (पहले CrPC धारा 197) की तर्ज़ पर किसी नामित प्राधिकारी की पूर्व अनुमति से अभियोजन की व्यवस्था हो, ताकि फ़ालतू मामले छँट जाएँ।
- 3पदावधि तक सीमित
अनुच्छेद 361 की तरह कोई विशेष कवच केवल पद पर रहने तक हो।
- 4बचाव खंड
न्यायाधीश (संरक्षण) अधिनियम, 1985 की धारा 3(2) जैसा खंड जोड़ा जाए, जो सरकार, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की कार्रवाई की शक्ति बचाए।
- 5नियुक्ति प्रक्रिया सुधारें
स्वतंत्रता मुख्य रूप से इस पर निर्भर है कि चुनाव आयुक्त कैसे चुने जाते हैं। दिनेश गोस्वामी समिति (1990), विधि आयोग की 255वीं रिपोर्ट (2015) और अनूप बरनवाल (2023) सभी ने CJI सहित व्यापक चयन संस्था की ओर इशारा किया। वह चुनौती लंबित है।
- 6पारदर्शी क़ानून निर्माण
छूट जैसे बड़े बदलावों के लिए देर से लाए सरकारी संशोधनों की बजाय समिति की जाँच और बहस बेहतर है।
लक्ष्य एक संतुलित कवच है: उत्पीड़न रोकने के लिए काफ़ी मज़बूत, पर इतना चौड़ा नहीं कि कोई क़ानून से ऊपर हो जाए। सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला यह भी तय करेगा कि भविष्य में अन्य संवैधानिक और वैधानिक संस्थाएँ कितने संरक्षण का दावा कर सकती हैं।
🏠 रोज़मर्रा की मिसाल
हेलमेट सवार को गंभीर चोट से बचाता है, पर उसे ट्रैफ़िक नियमों से छूट नहीं देता। संरक्षण और ज़िम्मेदारी साथ रह सकते हैं।
🇮🇳 असली भारतीय उदाहरण
देश भर के लोक सेवक, ज़िला कलेक्टर से पुलिस अधिकारी तक, पूर्ण छूट नहीं बल्कि अनुमति के संरक्षण के साथ काम करते हैं, और फिर भी रोज़ कठिन फ़ैसले लेते हैं।
UPSC कॉर्नरUPSC प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा के लिए चुनाव आयुक्तों की कानूनी छूट
- प्रारंभिक तथ्य: अनुच्छेद 324(5): CEC को केवल सुप्रीम कोर्ट के जज की तरह और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है; अन्य चुनाव आयुक्तों को केवल CEC की सिफ़ारिश पर।
- प्रारंभिक तथ्य: CEC अधिनियम, 2023 की धारा 16 दिसंबर 2023 में सरकारी संशोधन से खंड 15A के रूप में जोड़ी गई; यह मूल विधेयक में नहीं थी।
- प्रारंभिक तथ्य: अनुच्छेद 361 राष्ट्रपति और राज्यपालों को आपराधिक कार्यवाही से केवल पदावधि के दौरान संरक्षण देता है।
- प्रारंभिक तथ्य: 2023 अधिनियम की चयन समिति: प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री।
- प्रारंभिक तथ्य: सुब्रमण्यम स्वामी बनाम निदेशक, CBI (2014) ने अनुच्छेद 14 के तहत DSPE अधिनियम की धारा 6A रद्द की।
- मुख्य परीक्षा (250 शब्द): "निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता के लिए संरक्षण चाहिए, दंड से मुक्ति नहीं।" अनुच्छेद 14, 21 और 324 के आलोक में मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 16 का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
- निबंध कोण: रखवालों की रखवाली कौन करे? लोकतंत्र में संवैधानिक रेफ़री की जवाबदेही।
- नैतिकता कोण: सार्वजनिक पद पर जवाबदेही बनाम उत्पीड़न का डर; ईमानदारी केवल कानूनी छूट पर निर्भर नहीं हो सकती।
चुनाव आयोग सीरीज़और पढ़ें: भारत निर्वाचन आयोग सीरीज़
यह पेज धारा 16 की छूट के बारे में है। आयोग, उसके इतिहास और हर मुख्य चुनाव आयुक्त की पूरी जानकारी के लिए नीचे की सीरीज़ पढ़ें।
अभ्यास MCQख़ुद को परखें: चुनाव आयुक्तों की कानूनी छूट
मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: (1) अधिनियम की धारा 16 केवल वर्तमान, न कि पूर्व, निर्वाचन आयुक्तों को सिविल और आपराधिक कार्यवाही से संरक्षण देती है। (2) छूट वाला प्रावधान मूल रूप से पेश किए गए विधेयक का हिस्सा नहीं था। (3) अनुच्छेद 324(5) के तहत CEC के अलावा किसी निर्वाचन आयुक्त को केवल मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफ़ारिश पर ही हटाया जा सकता है। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
शंका समाधानअक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
CEC अधिनियम 2023 की धारा 16 क्या है?
मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 की धारा 16 हर अदालत को किसी मौजूदा या पूर्व CEC या चुनाव आयुक्त के विरुद्ध आधिकारिक कर्तव्य के दौरान किए गए या कहे गए किसी काम, बात या शब्द के लिए कोई सिविल या आपराधिक कार्यवाही ग्रहण करने या जारी रखने से रोकती है।
चुनाव आयुक्तों की कानूनी छूट को चुनौती क्यों दी गई है?
एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ॉर्म्स का कहना है कि यह छूट पूर्ण और आजीवन है, सद्भावना से किए कामों तक सीमित नहीं है, इसमें अनुमति की व्यवस्था या बचाव खंड नहीं है, इसलिए यह अनुच्छेद 14 और 21 तथा मूल ढाँचे का उल्लंघन करती है। सुप्रीम कोर्ट ने 13 अक्टूबर 2026 को नोटिस जारी किया; मामला लंबित है।
क्या जजों को भी चुनाव आयुक्तों जैसी छूट है?
नहीं। न्यायाधीश (संरक्षण) अधिनियम, 1985 की धारा 3(1) के शब्द मिलते-जुलते हैं, पर धारा 3(2) सरकार, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की किसी जज के विरुद्ध सिविल, आपराधिक या विभागीय कार्रवाई की शक्ति बचाती है। CEC अधिनियम की धारा 16 में ऐसा कोई बचाव खंड नहीं, इसलिए यह ज़्यादा चौड़ी है।
मुख्य चुनाव आयुक्त को कैसे हटाया जा सकता है?
अनुच्छेद 324(5) के तहत CEC को केवल उसी रीति से और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जैसे सुप्रीम कोर्ट के जज को, यानी साबित कदाचार या अक्षमता पर संसद की प्रक्रिया से। अन्य चुनाव आयुक्तों को केवल CEC की सिफ़ारिश पर हटाया जा सकता है।
क्या निर्वाचन आयोग के फ़ैसलों को अब भी अदालत में चुनौती दी जा सकती है?
हाँ। धारा 16 CEC और चुनाव आयुक्तों के विरुद्ध व्यक्तिगत सिविल और आपराधिक कार्यवाही पर रोक लगाती है। निर्वाचन आयोग के फ़ैसलों को अनुच्छेद 32 और 226 के तहत रिट याचिका से अब भी चुनौती दी जा सकती है, चल रही चुनाव प्रक्रिया में दख़ल की सीमाओं के अधीन।
स्रोत और आगे की पढ़ाईहमने जिन स्रोतों की जाँच की
इस पेज के समाचार तथ्य 16 अक्टूबर 2026 को नीचे दी गई रिपोर्टों से जाँचे गए। मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है और स्थिति बदल सकती है।
- LiveLaw, 13 Oct 2026: Supreme Court issues notice on ADR's plea challenging lifelong immunity to CEC, Election Commissioners
- Legacy IAS: The Hindu News Analysis, 16 October 2026 (The debate over immunity to CEC, ECs)
- LawChakra: Supreme Court issues notice on plea challenging lifelong immunity for CEC and ECs
- Legislative Department, Government of India: The Constitution of India