चुनाव प्रचार में बच्चे: चुनाव आयोग के नियम और मद्रास हाई कोर्ट क्या कहते हैं
क्या कोई राजनीतिक दल पाँच साल के बच्चे को प्रचार रील में दिखा सकता है, या रैली में बच्चे के हाथ में झंडा दे सकता है? चुनाव आयोग कहता है नहीं, मद्रास हाई कोर्ट ने इसे अशोभनीय बताया है, फिर भी आज के कानून में इस आधार पर चुनाव रद्द नहीं होता। जानिए यह कमी आसान भाषा में।

यह ख़बरों में क्यों है
अक्टूबर 2026 के मध्य में मद्रास हाई कोर्ट के जस्टिस डी. भरत चक्रवर्ती ने एक DMK उम्मीदवार की चुनाव याचिका ख़ारिज कर दी, जो 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में सेलम नॉर्थ से जीते TVK उम्मीदवार के ख़िलाफ़ थी। याचिका में कहा गया था कि TVK ने बच्चों की रील्स और TVK प्रमुख विजय की बच्चों से अपील का इस्तेमाल किया, ताकि बच्चे माता-पिता पर TVK को वोट देने का दबाव डालें। जज ने ऐसी रील्स को "अशोभनीय और राजनीति से प्रेरित" बताया, पर कहा कि याचिका में वाद का कारण नहीं है: बच्चे ख़ुद रील नहीं बनाते, घर के बड़ों ने बनाईं, इसलिए यह मतदाताओं की स्वतंत्र इच्छा को दबाने वाला असम्यक् असर नहीं है। ऐसे काम को चुनाव रद्द करने का आधार बनाना है या नहीं, यह संसद तय करे।
एक अलग जनहित याचिका में भारत निर्वाचन आयोग ने उसी हाई कोर्ट को बताया कि वह समीक्षा कर रहा है कि क्या और दिशानिर्देश चाहिए, ख़ासकर उन सोशल मीडिया अभियानों के लिए जो बच्चों के ज़रिए माता-पिता तक पहुँचते हैं। 23 अक्टूबर 2026 को द हिंदू ने इस पर संपादकीय छापा। जाँच के समय आयोग ने कोई नया नियम जारी नहीं किया था।
आयोग के नियमचुनाव प्रचार में बच्चों का इस्तेमाल: चुनाव आयोग की एडवाइज़री क्या कहती है
| चुनाव आयोग की 5 फ़रवरी 2024 की एडवाइज़री | इसका मतलब |
|---|---|
| ज़ीरो टॉलरेंस | दल और उम्मीदवार किसी भी रूप में प्रचार में बच्चों का इस्तेमाल नहीं करेंगे |
| पर्चे, पोस्टर, रैली नहीं | बच्चे पर्चे नहीं बाँटेंगे, पोस्टर नहीं लगाएँगे, नारे नहीं लगाएँगे, रैली में शामिल नहीं होंगे |
| बच्चों को गोद में नहीं | नेता प्रचार के दौरान बच्चों को गोद में लेकर या गाड़ी में बिठाकर नहीं घूमेंगे |
| कविता, गाना, चुनाव चिह्न | बच्चों से कविता, गाना या पार्टी का चिह्न दिखवाना मना है |
| छूट | माता-पिता या अभिभावक के साथ बस मौजूद बच्चा, जो किसी प्रचार गतिविधि में नहीं है, उल्लंघन नहीं |
| कानूनी आधार | बाल श्रम (प्रतिषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986 (2016 में संशोधित) और बॉम्बे हाई कोर्ट का 2014 का आदेश |
चुनाव आयोग का संदेश सीधा है: बच्चे प्रचार का औज़ार नहीं हैं। वे वोट नहीं दे सकते, घोषणापत्र नहीं परख सकते, और उनके ज़रिए माता-पिता की भावनाओं से खेलना ठीक नहीं। पर एडवाइज़री एक दिशानिर्देश है। इसे तोड़ने पर आयोग नोटिस या चेतावनी दे सकता है, चुनाव अपने-आप रद्द नहीं होता।
🏠 रोज़मर्रा की मिसाल
यह स्कूल के उस नियम जैसा है कि "क्लास में मोबाइल नहीं"। टीचर फ़ोन ले सकते हैं और चेतावनी दे सकते हैं, पर इस वजह से आप परीक्षा में फ़ेल नहीं होते। यह तो बोर्ड का परीक्षा कानून ही तय कर सकता है।
🇮🇳 असली भारतीय उदाहरण
एक पार्टी के वीडियो में स्कूल ड्रेस में एक बच्ची पार्टी के चिह्न के साथ गाना गा रही है और इंस्टाग्राम पर 2 लाख बार शेयर हुआ। 2024 की एडवाइज़री के हिसाब से यह साफ़ उल्लंघन है। शिकायत ज़िला निर्वाचन अधिकारी को या cVIGIL ऐप पर की जा सकती है।
मूल पाठअनुच्छेद 39(च) और धारा 123(2) RPA: बच्चों और असम्यक् असर पर कानून
भारत का संविधान, अनुच्छेद 39. राज्य द्वारा अनुसरणीय कुछ नीति तत्व।
राज्य अपनी नीति का, विशिष्टतया, इस प्रकार संचालन करेगा कि सुनिश्चित रूप से ... (ङ) पुरुष और स्त्री कर्मकारों के स्वास्थ्य और शक्ति का तथा बालकों की सुकुमार अवस्था का दुरुपयोग न हो और आर्थिक आवश्यकता से विवश होकर नागरिकों को ऐसे रोज़गारों में न जाना पड़े जो उनकी आयु या शक्ति के अनुकूल न हों; (च) बालकों को स्वतंत्र और गरिमामय वातावरण में स्वस्थ विकास के अवसर और सुविधाएँ दी जाएँ और बालकों और अल्पवय व्यक्तियों की शोषण से तथा नैतिक और आर्थिक परित्याग से रक्षा की जाए।
लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 · धारा 123(2). भ्रष्ट आचरण: असम्यक् असर (हिंदी रूपांतर)।
असम्यक् असर, अर्थात् अभ्यर्थी या उसके अभिकर्ता द्वारा, या अभ्यर्थी या उसके निर्वाचन अभिकर्ता की सहमति से किसी अन्य व्यक्ति द्वारा, किसी निर्वाचन अधिकार के स्वतंत्र प्रयोग में कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप या हस्तक्षेप का प्रयत्न।
- अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को चुनावों का अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण देता है; उसकी एडवाइज़री और आदर्श आचार संहिता यहीं से आती हैं।
- धारा 100(1)(ख) RPA: अगर जीतने वाले ने या उसके अभिकर्ता की सहमति से भ्रष्ट आचरण हुआ हो, तो हाई कोर्ट चुनाव शून्य घोषित कर सकता है।
- अनुच्छेद 39(च) नीति निदेशक तत्व है। यह कानून बनाने में दिशा देता है, पर सीधे अदालत में लागू नहीं होता।
फ़ैसलाTVK प्रचार रील्स में बच्चों पर मद्रास हाई कोर्ट: क्या तय हुआ
कोर्ट ने किसकी आलोचना की
- बच्चों वाली रील्स अशोभनीय और राजनीति से प्रेरित हैं
- दल और उम्मीदवार किसी चुनावी गतिविधि में बच्चों को न लगाएँ
- बच्चों के ज़रिए माता-पिता को प्रभावित करना ग़लत है
चुनाव क्यों बना रहा
- रील्स बच्चों ने नहीं, बड़ों ने बनाईं
- मतदाताओं की स्वतंत्र इच्छा दबने का सबूत नहीं (धारा 123(2))
- इसे चुनाव रद्द करने का आधार बनाना संसद का काम है
जज ने ग़लत और चुनाव रद्द करने लायक़ ग़ैरकानूनी के बीच रेखा खींची। जनता का फ़ैसला पलटना बहुत बड़ा कदम है, इसलिए कानून साफ़ भ्रष्ट आचरण माँगता है। बच्चों का इस्तेमाल ग़लत था, पर मौजूदा कानून में इसे "असम्यक् असर" साबित नहीं किया गया।
बहसक्या प्रचार में बच्चों का इस्तेमाल भ्रष्ट आचरण होना चाहिए?
सख़्त कानून के पक्ष में
- बच्चे अपनी तस्वीर के इस्तेमाल की सहमति नहीं दे सकते
- माता-पिता पर भावनात्मक दबाव स्वतंत्र चुनाव को बिगाड़ता है
- सोशल मीडिया रील्स आयोग की पहुँच से बहुत आगे फैलती हैं
- अनुच्छेद 39(च) और बाल अधिकारों से मेल
विरोध में
- परिभाषा मुश्किल: क्या परिवार के साथ रैली में आया बच्चा प्रचार कर रहा है?
- छोटे आधारों पर चुनाव याचिकाओं की बाढ़ का ख़तरा
- आयोग की सज़ा और प्लेटफ़ॉर्म से हटवाना बेहतर रास्ता
UPSC कॉर्नरचुनाव प्रचार में बच्चे: UPSC प्रीलिम्स और मेन्स के लिए
- प्रीलिम्स: भ्रष्ट आचरण लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 123 में हैं; असम्यक् असर धारा 123(2) है।
- प्रीलिम्स: चुनाव याचिका हाई कोर्ट सुनता है (धारा 80क RPA), अपील सुप्रीम कोर्ट में जाती है।
- मेन्स (GS II): "बिना दाँत की एडवाइज़री।" सोशल मीडिया के दौर में प्रचार नियंत्रित करने की चुनाव आयोग की शक्ति की जाँच करें।
- नीतिशास्त्र (GS IV): राजनीतिक फ़ायदे के लिए बच्चों का इस्तेमाल, गरिमा और सहमति का सवाल।
अभ्यास MCQख़ुद को परखें: चुनाव प्रचार में बच्चे: नियम और कमियाँ
इन कथनों पर विचार करें: (1) असम्यक् असर लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 123 में भ्रष्ट आचरण है। (2) भारत में चुनाव याचिका सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट में सुनी जाती है। (3) अनुच्छेद 39(च) बचपन और युवावस्था को शोषण से बचाता है। ऊपर दिए गए कौन-से कथन सही हैं?
शंका समाधानअक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या भारत में चुनाव प्रचार में बच्चों का इस्तेमाल कानूनी है?
चुनाव आयोग की 5 फ़रवरी 2024 की एडवाइज़री किसी भी रूप में प्रचार में बच्चों के इस्तेमाल पर रोक लगाती है, सिवाय माता-पिता के साथ बस मौजूद बच्चे के। इसे तोड़ने पर आयोग कार्रवाई कर सकता है, पर सिर्फ़ इस आधार पर चुनाव रद्द नहीं होता।
TVK की रील्स पर मद्रास हाई कोर्ट ने क्या कहा?
अक्टूबर 2026 में कोर्ट ने बच्चों वाली रील्स को अशोभनीय और राजनीति से प्रेरित कहा, पर चुनाव याचिका ख़ारिज की क्योंकि रील्स बड़ों ने बनाईं और असम्यक् असर साबित नहीं हुआ।
क्या चुनाव आयोग नए नियम बना रहा है?
आयोग ने मद्रास हाई कोर्ट को बताया कि वह समीक्षा कर रहा है कि क्या और दिशानिर्देश चाहिए, ख़ासकर सोशल मीडिया के लिए। 24 अक्टूबर 2026 को जाँच तक कोई नया नियम नहीं आया था।
चुनाव में असम्यक् असर क्या है?
धारा 123(2) RPA के अनुसार उम्मीदवार द्वारा या उसकी सहमति से किसी निर्वाचन अधिकार के स्वतंत्र प्रयोग में कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप।
प्रचार में बच्चों की शिकायत कहाँ करें?
रिटर्निंग ऑफ़िसर या ज़िला निर्वाचन अधिकारी को, या आदर्श आचार संहिता के दौरान चुनाव आयोग के cVIGIL ऐप पर।
स्रोत और आगे की पढ़ाईहमने जिन स्रोतों की जाँच की
तथ्य 24 अक्टूबर 2026 को नीचे दी गई रिपोर्टों से जाँचे गए। मद्रास हाई कोर्ट के कारण आदेश की समाचार रिपोर्टों से लिए गए हैं; चुनाव आयोग की समीक्षा जारी थी।
- LawChakra: Madras High Court says children's campaign videos in bad taste but not ground to void election (Oct 2026)
- Free Press Journal: Using children in election campaigns reflects poor parenting, is a 'cheap act', says Madras High Court
- Indian Masterminds: ECI to review use of children in election campaigns, tells Madras High Court
- Bar and Bench: Mooting guidelines to bar use of children in election campaigns, ECI to Madras High Court
- Election Commission of India: advisory to political parties on use of children in election campaigns (5 Feb 2024)
- Representation of the People Act, 1951 (India Code)