भाग III ⚖️ मूल अधिकार लागू · 1971 में संशोधित

अनुच्छेद 13: मूल अधिकार और न्यायिक पुनर्विलोकन

अनुच्छेद 13 भाग III के दरवाज़े का पहरेदार है। मूल अधिकार से टकराने वाला हर कानून टकराव की मात्रा तक शून्य है, और यह कहने की शक्ति अदालतों को मिलती है। भारत में न्यायिक पुनर्विलोकन की जड़ यही है।

मूल पाठअनुच्छेद 13 का आधिकारिक पाठ

हिन्दी · आधिकारिक पाठ

13. मूल अधिकारों से असंगत या उनका अल्पीकरण करने वाली विधियाँ—

(1) इस संविधान के प्रारंभ से ठीक पहले भारत के राज्यक्षेत्र में प्रवृत्त सभी विधियाँ उस मात्रा तक शून्य होंगी जिस तक वे इस भाग के उपबंधों से असंगत हैं।

(2) राज्य ऐसी कोई विधि नहीं बनाएगा जो इस भाग द्वारा प्रदत्त अधिकारों को छीनती है या न्यून करती है और इस खंड के उल्लंघन में बनाई गई प्रत्येक विधि उल्लंघन की मात्रा तक शून्य होगी।

(3) इस अनुच्छेद में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,—

(क) "विधि" के अंतर्गत भारत के राज्यक्षेत्र में विधि का बल रखने वाला कोई अध्यादेश, आदेश, उपविधि, नियम, विनियम, अधिसूचना, रूढ़ि या प्रथा है;

(ख) "प्रवृत्त विधि" के अंतर्गत भारत के राज्यक्षेत्र में किसी विधान-मंडल या अन्य सक्षम प्राधिकारी द्वारा इस संविधान के प्रारंभ से पहले पारित या बनाई गई विधि है जो पहले ही निरसित नहीं कर दी गई है, चाहे ऐसी कोई विधि या उसका कोई भाग उस समय पूर्णतया या विशिष्ट क्षेत्रों में प्रवर्तन में नहीं है।

(4) इस अनुच्छेद की कोई बात अनुच्छेद 368 के अधीन किए गए इस संविधान के किसी संशोधन को लागू नहीं होगी।

संशोधन टिप्पणी: खंड (4) संविधान (चौबीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1971 द्वारा गोलकनाथ फ़ैसले (1967) को पलटने के लिए जोड़ा गया। केशवानंद भारती (1973) में इसे मूल ढाँचे के सिद्धांत के अधीन वैध ठहराया गया।
In Simple Words / आसान शब्दों में

अनुच्छेद 13 में चार खंड हैं, और हर खंड एक काम करता है:

13(1) पुराने कानून: 26 जनवरी 1950 से पहले के कानून चलते रहते हैं, लेकिन उनका जो हिस्सा किसी मूल अधिकार से टकराता है वह शून्य हो जाता है।

13(2) नए कानून: 1950 के बाद राज्य ऐसा कोई कानून नहीं बना सकता जो मूल अधिकार छीने या घटाए। अगर बनाए, तो वह कानून उल्लंघन की मात्रा तक शून्य है।

13(3) "विधि" क्या है: केवल संसद के अधिनियम नहीं, बल्कि अध्यादेश, आदेश, उपविधि, नियम, विनियम, अधिसूचना, और विधि का बल रखने वाली रूढ़ि या प्रथा भी।

13(4) संशोधन अलग हैं: अनुच्छेद 368 के तहत संविधान संशोधन अनुच्छेद 13 के लिए "विधि" नहीं है। लेकिन 1973 से यह भी मूल ढाँचे को नष्ट नहीं कर सकता।

🏠 रोज़मर्रा की मिसाल

सूर्य ग्रहण सोचिए। सूरज वहीं है, बस चाँद ने ढक लिया है। 1950 से पहले का जो कानून किसी मूल अधिकार से टकराता है, वह उसी सूरज जैसा है: ढका हुआ, मरा नहीं। अगर बाद में मूल अधिकार में संशोधन हो और छाया हट जाए, तो कानून फिर चमकने लगता है। यही आच्छादन का सिद्धांत है। अब एक आम सोचिए जिसमें एक जगह ख़राब है: आप ख़राब हिस्सा काटकर बाकी खा लेते हैं। अदालतें कानून के साथ यही करती हैं: केवल ख़राब धारा हटाओ, बाकी रखो। यही पृथक्करणीयता का सिद्धांत है।

🇮🇳 असली भारतीय उदाहरण

2015 में श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ में सुप्रीम कोर्ट ने आईटी अधिनियम, 2000 की धारा 66A को रद्द किया, जो "आपत्तिजनक" ऑनलाइन पोस्ट पर गिरफ़्तारी की अनुमति देती थी, क्योंकि यह अनुच्छेद 19(1)(क) की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन करती थी। केवल धारा 66A ख़त्म हुई; बाकी आईटी अधिनियम आज भी लागू है। यही अनुच्छेद 13(2) और पृथक्करणीयता है।

UPSC मूल अवधारणाभारत में न्यायिक पुनर्विलोकन (UPSC): अनुच्छेद 13 कैसे काम करता है

न्यायिक पुनर्विलोकन अदालतों की वह शक्ति है जिससे वे जाँचती हैं कि कोई कानून या सरकारी कार्य संविधान के तहत वैध है या नहीं, और न हो तो उसे रद्द करती हैं। "न्यायिक पुनर्विलोकन" शब्द संविधान में नहीं है, लेकिन अनुच्छेद 13 इसे अनिवार्य बना देता है: अगर मूल अधिकार तोड़ने वाले कानून "शून्य" हैं, तो किसी को उन्हें शून्य घोषित करना होगा, और वह अदालतें हैं।

  • अनुच्छेद 13 नियम देता है: असंगत कानून शून्य हैं।
  • अनुच्छेद 32 (सुप्रीम कोर्ट) और अनुच्छेद 226 (हाई कोर्ट) उपाय देते हैं: मूल अधिकार लागू करने के लिए रिट।
  • न्यायिक पुनर्विलोकन मूल ढाँचे का हिस्सा है (मिनर्वा मिल्स, 1980; एल. चंद्र कुमार, 1997), इसलिए संशोधन से भी इसे हटाया नहीं जा सकता।
भारत बनाम अमेरिका: अमेरिका में न्यायिक पुनर्विलोकन अदालती परंपरा (मारबरी बनाम मैडिसन, 1803) और व्यापक "विधि की सम्यक प्रक्रिया" कसौटी से आया। भारत ने इसे पाठ में लिखा (अनुच्छेद 13, 32, 226) लेकिन "विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया" की संकरी कसौटी अपनाई, जो मेनका गांधी (1978) के बाद चौड़ी हुई।

दो मुख्य सिद्धांतअनुच्छेद 13 में आच्छादन और पृथक्करणीयता का सिद्धांत

1. आच्छादन का सिद्धांत (मुख्यतः अनुच्छेद 13(1))

मूल अधिकार से टकराने वाला संविधान-पूर्व कानून मिटता नहीं। वह निष्क्रिय हो जाता है: लागू नहीं हो सकता, पर कानून की किताब में बना रहता है। अगर बाद में मूल अधिकार में संशोधन से टकराव ख़त्म हो जाए, तो कानून अपने आप फिर जीवित हो जाता है।

  • केशवन माधव मेनन बनाम बंबई राज्य (1951): 1950 से पहले का कानून शुरू से शून्य नहीं; 1950 से पहले किए गए काम वैध रहते हैं।
  • भीकाजी नारायण धाकरस बनाम मध्य प्रदेश राज्य (1955): 1948 का सी.पी. और बरार मोटर परिवहन कानून अनुच्छेद 19(1)(छ) से टकराता था। पहले संशोधन (1951) ने अनुच्छेद 19(6) बदला, छाया हटी, और कानून फिर जीवित हो गया। यही प्रसिद्ध उदाहरण है।
  • 1950 के बाद के कानूनों के लिए नियम सख़्त है: सभी के अधिकार तोड़ने वाला कानून जन्म से शून्य है (दीप चंद, 1959)। लेकिन केवल नागरिकों के अधिकार (जैसे अनुच्छेद 19) तोड़ने वाला कानून ग़ैर-नागरिकों और कंपनियों पर लागू रहता है (गुजरात राज्य बनाम अंबिका मिल्स, 1974)।

2. पृथक्करणीयता का सिद्धांत (अनुच्छेद 13(1) और 13(2))

दोनों खंड कहते हैं "उस मात्रा तक" जिस तक असंगति या उल्लंघन है। इसलिए अदालतें केवल ख़राब हिस्सा काटती हैं और बाकी रखती हैं, बशर्ते अच्छा हिस्सा अपने दम पर चल सके (आर.एम.डी. चमारबागवाला बनाम भारत संघ, 1957)।

  • ए.के. गोपालन (1950): निवारक निरोध अधिनियम, 1950 की केवल धारा 14 रद्द हुई; बाकी बचा रहा।
  • श्रेया सिंघल (2015): आईटी अधिनियम की केवल धारा 66A गिरी।
  • नवतेज सिंह जौहर (2018): IPC की धारा 377 (1950 से पहले का कानून) को केवल उस हद तक पढ़कर घटाया गया जिस हद तक वह वयस्कों के सहमति वाले संबंधों को दंडित करती थी।
अनुच्छेद 13 मूल अधिकार फ्लोचार्ट: आच्छादन का सिद्धांत (1950 से पहले का कानून सोया रहता है और संशोधन के बाद फिर जीवित होता है) और पृथक्करणीयता का सिद्धांत (धारा 66A हटी, बाकी IT अधिनियम बचा)
आच्छादन और पृथक्करणीयता का सिद्धांत: ढको-और-फिर-जगाओ बनाम काटो-और-रखो।

अनुच्छेद 13(4) और मूल ढाँचाक्या संसद मूल अधिकारों में संशोधन कर सकती है? अनुच्छेद 13 और मूल ढाँचा

संसद और सुप्रीम कोर्ट के बीच बड़ी लड़ाई एक सवाल पर थी: क्या संविधान संशोधन अनुच्छेद 13 के तहत "विधि" है? अगर हाँ, तो मूल अधिकार घटाने वाला संशोधन शून्य होगा।

  • शंकरी प्रसाद (1951) और सज्जन सिंह (1965): नहीं। संशोधन "विधि" नहीं है; संसद मूल अधिकारों में संशोधन कर सकती है।
  • गोलकनाथ (1967, 11 न्यायाधीश, 6:5): हाँ। संशोधन "विधि" है, इसलिए संसद मूल अधिकार नहीं छीन सकती। कोर्ट ने भविष्यलक्षी अध्यारोहण (prospective overruling) अपनाया: फ़ैसला केवल भविष्य पर लागू हुआ, पुराने संशोधन वैध रहे।
  • 24वाँ संशोधन (1971): संसद ने अनुच्छेद 13(4) और अनुच्छेद 368(3) जोड़े: संशोधन अनुच्छेद 13 के तहत "विधि" नहीं हैं।
  • केशवानंद भारती (24 अप्रैल 1973, 13 न्यायाधीश, 7:6): 24वें संशोधन को वैध ठहराया। संसद मूल अधिकारों समेत किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है, लेकिन मूल ढाँचे को नष्ट नहीं कर सकती।
  • 42वें संशोधन (1976) ने संशोधन शक्ति को असीमित बनाने की कोशिश की (अनुच्छेद 368(4) और (5))। मिनर्वा मिल्स (1980) ने ये खंड रद्द किए: सीमित संशोधन शक्ति स्वयं मूल ढाँचे का हिस्सा है।

मूल ढाँचा क्या है?

संविधान इसकी परिभाषा नहीं देता, और केशवानंद ने भी कोई बंद सूची नहीं दी। किसी इमारत के छिपे खंभों की तरह, कोर्ट इसमें मामला-दर-मामला जोड़ता है। मान्य विशेषताओं में संविधान की सर्वोच्चता, विधि का शासन, न्यायिक पुनर्विलोकन, संसदीय लोकतंत्र, पंथनिरपेक्षता, संघवाद, शक्तियों का पृथक्करण, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव और न्यायपालिका की स्वतंत्रता शामिल हैं।

भारत में न्यायिक पुनर्विलोकन टाइमलाइन, अनुच्छेद 13 UPSC: शंकरी प्रसाद 1951, सज्जन सिंह 1965, गोलकनाथ 1967, 24वाँ संशोधन 1971 अनुच्छेद 13(4), केशवानंद भारती 1973 मूल ढाँचा, मिनर्वा मिल्स 1980
भारत में न्यायिक पुनर्विलोकन: क्या संसद मूल अधिकार बदल सकती है? (1951 से 1980)

त्वरित दोहराईयाद रखने योग्य मुख्य बातें

  • 13(1): 1950 से पहले के कानून भाग III से टकराव की मात्रा तक शून्य।
  • 13(2): राज्य मूल अधिकार छीनने या घटाने वाला कानून नहीं बना सकता।
  • 13(3): "विधि" में अध्यादेश, नियम, उपविधि, अधिसूचना, रूढ़ि और प्रथा शामिल।
  • 13(4): 24वें संशोधन, 1971 से जोड़ा गया; अनुच्छेद 368 के संशोधन "विधि" नहीं।
  • आच्छादन = निष्क्रिय, फिर जीवित हो सकता है। पृथक्करणीयता = ख़राब हिस्सा काटो, बाकी रखो।
  • अनुच्छेद 13 न्यायिक पुनर्विलोकन का पाठ्य आधार है, जो मूल ढाँचे का हिस्सा है।

संशोधन की गाथाअनुच्छेद 13 और संशोधन की शक्ति: समयरेखा

वर्षमुकदमा या संशोधन
1951शंकरी प्रसाद: संशोधन "विधि" नहीं; मूल अधिकारों में संशोधन संभव।
1965सज्जन सिंह: वही मत (3:2 बहुमत)।
1967गोलकनाथ: संशोधन "विधि" है; मूल अधिकार छीने नहीं जा सकते (भविष्यलक्षी अध्यारोहण)।
197124वाँ संशोधन: अनुच्छेद 13(4) और 368(3) जोड़े गए।
1973केशवानंद भारती (24 अप्रैल): मूल ढाँचे का सिद्धांत।
197642वाँ संशोधन: अनुच्छेद 368(4) और (5) से असीमित शक्ति का दावा।
1980मिनर्वा मिल्स: वे खंड रद्द; न्यायिक पुनर्विलोकन मूल ढाँचा है।

UPSC · राज्य PSC · न्यायपालिकाभारत में न्यायिक पुनर्विलोकन: UPSC परीक्षा कॉर्नर

  • प्रीलिम्स जाल: "मूल ढाँचा गोलकनाथ में प्रस्तुत हुआ।" ग़लत। यह केशवानंद भारती (1973) में आया; गोलकनाथ ने भविष्यलक्षी अध्यारोहण दिया।
  • प्रीलिम्स जाल: "मूल ढाँचे का अर्थ है कि मूल अधिकारों में संशोधन नहीं हो सकता।" ग़लत। संशोधन हो सकता है, पर मूल ढाँचा नष्ट करने वाला नहीं।
  • पर्सनल लॉ: बंबई राज्य बनाम नरसू अप्पा माली (1952) में बंबई हाई कोर्ट ने कहा कि असंहिताबद्ध पर्सनल लॉ अनुच्छेद 13 के तहत "विधि" नहीं है। यह मत आज भी बहस में है।
  • नौवीं अनुसूची: 24 अप्रैल 1973 के बाद इसमें डाले गए कानून मूल ढाँचे पर परखे जा सकते हैं (आई.आर. कोएल्हो, 2007)।
  • मेन्स प्रश्न (150 शब्द): "भारत के मूल अधिकार मुख्यतः अमेरिकी और आंशिक रूप से ब्रिटिश प्रतिमान से प्रभावित हैं।" अनुच्छेद 13 (लिखित न्यायिक पुनर्विलोकन, अमेरिका) और संसद की संशोधन शक्ति (ब्रिटेन) को दो स्तंभ बनाइए।

अभ्यास प्रश्नख़ुद को परखें: अनुच्छेद 13

कथनों पर विचार करें: (1) आच्छादन का सिद्धांत मुख्यतः संविधान-पूर्व कानूनों पर लागू होता है। (2) 24वें संशोधन के बाद संविधान संशोधन अनुच्छेद 13 के तहत "विधि" है। (3) मूल ढाँचे का सिद्धांत गोलकनाथ मामले में दिया गया। कौन-सा/से सही है/हैं?

शंका समाधानअक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 13 क्या है?

अनुच्छेद 13 कहता है कि मूल अधिकारों से असंगत कोई भी कानून, पुराना या नया, असंगति की मात्रा तक शून्य है। यह "विधि" की व्यापक परिभाषा देता है और 1971 से अनुच्छेद 368 के तहत संविधान संशोधनों को बाहर रखता है।

आच्छादन और पृथक्करणीयता के सिद्धांत में क्या अंतर है?

आच्छादन टकराने वाले 1950-पूर्व कानून को निष्क्रिय करता है; मूल अधिकार में बाद में संशोधन हो तो वह फिर जीवित हो सकता है। पृथक्करणीयता कानून का केवल अवैध हिस्सा हटाती है और बाकी वैध हिस्सा चलता रहता है।

क्या भारत के संविधान में न्यायिक पुनर्विलोकन का उल्लेख है?

यह शब्द नहीं है, लेकिन अनुच्छेद 13, 32 और 226 मिलकर अदालतों को न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति देते हैं, और सुप्रीम कोर्ट ने इसे मूल ढाँचे का हिस्सा बनाया है।

अनुच्छेद 13(4) किस संशोधन से जोड़ा गया?

संविधान (चौबीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1971 द्वारा, गोलकनाथ फ़ैसले के जवाब में।