पॉक्सो एक्ट विशेष लोक अभियोजक: केरल हाई कोर्ट ने पॉक्सो मामलों के लिए अलग अभियोजक का आदेश दिया
जब यौन शोषण का शिकार कोई बच्चा अदालत जाता है, तो क़ानून उसे विशेष अदालत, अलग अभियोजक और एक साल में सुनवाई का वादा करता है। 14 अक्टूबर 2026 को केरल हाई कोर्ट ने कहा कि राज्य पॉक्सो अभियोजकों से दूसरे मामले भी करवाकर इस वादे को कमज़ोर नहीं कर सकता। जानिए पॉक्सो एक्ट क्या कहता है, कोर्ट ने क्या आदेश दिया, और कोई भी नागरिक बाल शोषण की शिकायत कैसे कर सकता है।

14 अक्टूबर 2026 को केरल हाई कोर्ट ने क्या आदेश दिया
14 अक्टूबर 2026 को केरल हाई कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश सौमेन सेन और न्यायमूर्ति श्याम कुमार वी.एम. की खंडपीठ ने राज्य सरकार का वह आदेश रद्द कर दिया जिसमें पॉक्सो विशेष लोक अभियोजकों को किशोर न्याय (JJ) अधिनियम के ग़ैर-पॉक्सो मामले भी चलाने की अनुमति थी। कोर्ट ने राज्य को छह हफ़्ते के भीतर केवल पॉक्सो मामलों के लिए विशेष लोक अभियोजक नियुक्त करने का निर्देश दिया।
राज्य से यह भी कहा गया कि वह बाक़ी 13 स्थायी, विशेष पॉक्सो अदालतें (एर्नाकुलम को छोड़ हर ज़िले में एक) बनाने पर विचार करे और फ़ैसला मिलने के चार हफ़्ते के भीतर कोर्ट को अपना निर्णय बताए। यह जनहित याचिका ज़िला न्यायालय बार एसोसिएशन, थोडुपुझा-मुट्टम और उसके सचिव ने दायर की थी। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के स्वतः संज्ञान मामले इन रे: बाल बलात्कार की बढ़ती घटनाएँ के निर्देशों पर भरोसा किया, जिनमें सभी राज्यों से केवल पॉक्सो मामलों के लिए बनी अदालतों में अलग अभियोजक नियुक्त करने को कहा गया था। पहले की सुनवाई में हाई कोर्ट ने यह भी पाया था कि केरल की ज़्यादातर पॉक्सो अदालतों में दिशानिर्देशों के अनुसार बाल-अनुकूल सुविधाएँ नहीं हैं।
बुनियादी बातेंपॉक्सो एक्ट 2012 आसान शब्दों में: किसकी रक्षा, किस अपराध पर सज़ा
- पूरा नाम: लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012। 14 नवंबर 2012 से लागू।
- बच्चा कौन: 18 साल से कम उम्र का कोई भी व्यक्ति। क़ानून लिंग-तटस्थ है: लड़के और लड़कियाँ दोनों सुरक्षित।
- अपराध: प्रवेशन लैंगिक हमला, गुरुतर प्रवेशन लैंगिक हमला, लैंगिक हमला, लैंगिक उत्पीड़न और बच्चे का अश्लील सामग्री के लिए इस्तेमाल।
- 2019 संशोधन: सज़ाएँ बढ़ीं; गुरुतर प्रवेशन लैंगिक हमले पर अब कम से कम 20 साल और अधिकतम आजीवन कारावास या मृत्युदंड।
- बताना ज़रूरी: ऐसे अपराध की जानकारी रखने वाले हर व्यक्ति को पुलिस या विशेष किशोर पुलिस इकाई को सूचना देनी होगी (धारा 19)। सूचना न देना ख़ुद अपराध है (धारा 21)।
- बाल-अनुकूल प्रक्रिया: बयान बच्चे के घर या पसंद की जगह पर, यथासंभव महिला अधिकारी द्वारा; मीडिया बच्चे की पहचान कभी उजागर नहीं कर सकता (धारा 23); मुख्य अपराधों में आरोपी के ख़िलाफ़ दोष की उपधारणा (धारा 29)।
पॉक्सो बच्चों के लिए एक विशेष ढाल है। सामान्य आपराधिक अदालतें डरावनी और धीमी हो सकती हैं, इसलिए क़ानून अलग अदालत, अलग अभियोजक और सख़्त समय-सीमा बनाता है ताकि बच्चे को सालों तक उस दर्द को दोबारा न जीना पड़े।
मूल पाठपॉक्सो एक्ट की धारा 28, धारा 32 और धारा 35: विशेष अदालत और अभियोजक
लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम, 2012: धारा 28. विशेष न्यायालयों का अभिहित किया जाना।
(1) शीघ्र विचारण के प्रयोजनों के लिए, राज्य सरकार, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति के परामर्श से, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, प्रत्येक ज़िले के लिए एक सेशन न्यायालय को इस अधिनियम के अधीन अपराधों का विचारण करने के लिए विशेष न्यायालय के रूप में अभिहित करेगी:
परंतु यदि कोई सेशन न्यायालय बालक अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 के अधीन बालक न्यायालय के रूप में, या किसी अन्य प्रवृत्त विधि के अधीन इसी तरह के प्रयोजनों के लिए विशेष न्यायालय के रूप में अधिसूचित है, तो ऐसा न्यायालय इस धारा के अधीन विशेष न्यायालय समझा जाएगा।
धारा 32. विशेष लोक अभियोजक।
(1) राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, प्रत्येक विशेष न्यायालय के लिए केवल इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन मामलों के संचालन के लिए एक विशेष लोक अभियोजक नियुक्त करेगी।
(2) कोई व्यक्ति उपधारा (1) के अधीन विशेष लोक अभियोजक नियुक्त होने का पात्र तभी होगा जब उसने कम से कम सात वर्ष तक अधिवक्ता के रूप में विधि व्यवसाय किया हो।
(3) इस धारा के अधीन नियुक्त प्रत्येक विशेष लोक अभियोजक दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 2 के खंड (u) के अर्थ में लोक अभियोजक समझा जाएगा और उस संहिता के उपबंध तदनुसार प्रभावी होंगे।
धारा 35. बालक का साक्ष्य अभिलिखित करने और मामले के निपटारे की अवधि।
(1) विशेष न्यायालय द्वारा अपराध का संज्ञान लिए जाने के तीस दिन के भीतर बालक का साक्ष्य अभिलिखित किया जाएगा और विलंब के कारण, यदि कोई हों, विशेष न्यायालय द्वारा अभिलिखित किए जाएँगे।
(2) विशेष न्यायालय, यथासंभव, अपराध का संज्ञान लेने की तारीख़ से एक वर्ष की अवधि के भीतर विचारण पूरा करेगा।
ध्यान दें: धारा 32(3) में लिखी दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की जगह अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (1 जुलाई 2024 से) लागू है; पुरानी संहिता के संदर्भ अब BNSS के संदर्भ माने जाते हैं।
धारा 32(1) को ध्यान से पढ़िए: विशेष लोक अभियोजक "केवल इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन मामलों के संचालन के लिए" नियुक्त होता है। यह एक शब्द, केवल, केरल मामले की जड़ है। अगर वही अभियोजक किशोर न्याय के मामले भी चला रहा है, तो पॉक्सो सुनवाई टलती है, बच्चे को बार-बार बुलाया जाता है, और धारा 35 की एक साल की समय-सीमा असंभव हो जाती है।
🏠 रोज़मर्रा की मिसाल
एक अस्पताल बच्चों के लिए अलग इमरजेंसी वार्ड और उसका अपना डॉक्टर रखता है ताकि बीमार बच्चों को तुरंत देखा जाए। अगर वही डॉक्टर सामान्य OPD में भी भेज दिया जाए, तो इमरजेंसी आने पर बच्चों के वार्ड में कोई डॉक्टर नहीं होगा।
🇮🇳 असली भारतीय उदाहरण
केरल के किसी ज़िले में 12 साल की एक बच्ची पॉक्सो अदालत में बयान देती है। सुनवाई तीन बार टलती है क्योंकि अभियोजक दूसरे मामलों में व्यस्त है। अलग अभियोजक हो तो अदालत उसके मामले के हिसाब से तारीख़ें तय करके साल भर में सुनवाई पूरी कर सकती है।
फ़ैसलाकेरल हाई कोर्ट पॉक्सो फ़ैसला: क्या आदेश दिया और क्यों
| मुद्दा | केरल हाई कोर्ट का निर्देश (14 अक्टूबर 2026) |
|---|---|
| पॉक्सो अभियोजकों से ग़ैर-पॉक्सो (JJ एक्ट) मामले करवाने वाला सरकारी आदेश | रद्द |
| पॉक्सो अदालतों के लिए विशेष लोक अभियोजक | छह हफ़्ते में केवल पॉक्सो मामलों के लिए नियुक्ति |
| स्थायी विशेष पॉक्सो अदालतें | राज्य बाक़ी 13 (एर्नाकुलम को छोड़ हर ज़िले में एक) पर विचार करे और चार हफ़्ते में कोर्ट को बताए |
| क़ानूनी आधार | पॉक्सो एक्ट की धारा 32 और सुप्रीम कोर्ट के इन रे: बाल बलात्कार की बढ़ती घटनाएँ मामले के निर्देश |
राज्य ने साझा करने की अनुमति क्यों दी
- कुछ अदालतों में मामले कम, इसलिए अभियोजकों के पास समय था
- अतिरिक्त नियुक्तियों का ख़र्च बचाना
- किशोर न्याय के मामलों में भी बच्चे ही होते हैं
कोर्ट ने मना क्यों किया
- धारा 32(1) में "केवल" पॉक्सो मामले लिखा है
- सुप्रीम कोर्ट के निर्देश विशेष पॉक्सो अदालतों में अलग अभियोजक माँगते हैं
- देरी और बार-बार पेशी पीड़ित बच्चों को नुक़सान पहुँचाती है (अनुच्छेद 21: त्वरित सुनवाई और गरिमा का अधिकार)
बड़ी तस्वीरभारत में पॉक्सो विशेष अदालतें और फ़ास्ट ट्रैक विशेष अदालतें
विशेष अदालतें उतनी ही अच्छी होती हैं जितने उनके कर्मचारी और सुविधाएँ। 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने बाल बलात्कार के बढ़ते मामलों पर स्वतः संज्ञान लेकर कहा कि जिन ज़िलों में बहुत सारे पॉक्सो मामले लंबित हैं, वहाँ अलग पॉक्सो अदालत हो। इसके बाद केंद्र सरकार ने अक्टूबर 2019 में बलात्कार और पॉक्सो मामलों के लिए फ़ास्ट ट्रैक विशेष अदालतों (FTSC) की केंद्र प्रायोजित योजना शुरू की, जिसका लक्ष्य 1,023 FTSC था, जिनमें 389 केवल पॉक्सो अदालतें हैं।
- 1नामित अदालत
हर ज़िले में एक सेशन न्यायालय पॉक्सो विशेष अदालत के रूप में नामित होना चाहिए (धारा 28)।
- 2अलग अभियोजक
हर विशेष अदालत का अपना विशेष लोक अभियोजक, कम से कम 7 साल के अनुभव वाला (धारा 32)।
- 3बाल-अनुकूल कमरा
अलग प्रतीक्षा कक्ष, बच्चे और आरोपी के बीच पर्दा, सहायक व्यक्ति, ज़रूरत हो तो वीडियो से बयान (धारा 33 से 37)।
- 4समय-सीमा
संज्ञान के 30 दिन में बच्चे का साक्ष्य; यथासंभव एक साल में सुनवाई पूरी (धारा 35)।
- 5मुआवज़ा
विशेष अदालत बच्चे की राहत और पुनर्वास के लिए अंतरिम और अंतिम मुआवज़े का आदेश दे सकती है।
नागरिकों के लिएपॉक्सो एक्ट के तहत बाल यौन शोषण की शिकायत कैसे करें
- 1मदद के लिए कॉल करें
1098 (चाइल्डलाइन, मुफ़्त, 24x7) या 112 (आपातकाल) डायल करें। ख़तरा हो तो पहले बच्चे को सुरक्षित जगह ले जाएँ।
- 2पुलिस के पास जाएँ
नज़दीकी थाने या विशेष किशोर पुलिस इकाई में सूचना दें। FIR दर्ज होनी ही चाहिए; किसी भी थाने में ज़ीरो FIR दर्ज हो सकती है।
- 3ऑनलाइन शिकायत
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) की वेबसाइट पर पॉक्सो ई-बॉक्स का इस्तेमाल करें।
- 4इलाज
बच्चे की मेडिकल जाँच और इलाज किसी भी अस्पताल में, सरकारी हो या निजी, मुफ़्त होना चाहिए।
- 5पहचान छिपाएँ
सोशल मीडिया पर बच्चे का नाम, फ़ोटो, स्कूल या गाँव मत डालिए। धारा 23 के तहत यह अपराध है।
- 6कर्तव्य याद रखें
शिक्षक, डॉक्टर, हॉस्टल कर्मचारी और पड़ोसी, जिन्हें शोषण की जानकारी हो, उन्हें सूचना देनी ही होगी। छिपाना धारा 21 के तहत दंडनीय है।
आसान शब्दों में: अगर आप जानते हैं, तो बताना ज़रूरी है। क़ानून सद्भावना से सूचना देने वाले की रक्षा करता है, और बच्चे को विशेष अदालत और विशेष अभियोजक देता है। केरल का मामला यह पक्का करने के बारे में है कि वह अभियोजक सचमुच बच्चे के लिए मौजूद रहे।
UPSC कॉर्नरUPSC प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा के लिए पॉक्सो एक्ट और विशेष अदालतें
- प्रारंभिक तथ्य: पॉक्सो एक्ट, 2012 में 18 साल से कम उम्र का हर व्यक्ति बच्चा है; क़ानून लिंग-तटस्थ है।
- प्रारंभिक तथ्य: धारा 28 की विशेष अदालतें राज्य सरकार हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से नामित करती है।
- प्रारंभिक तथ्य: धारा 32 के विशेष लोक अभियोजक के लिए अधिवक्ता के रूप में कम से कम 7 साल का अनुभव ज़रूरी।
- प्रारंभिक तथ्य: धारा 35: बच्चे का साक्ष्य 30 दिन में; सुनवाई यथासंभव एक साल में।
- प्रारंभिक तथ्य: NCPCR और राज्य आयोग पॉक्सो एक्ट के क्रियान्वयन की निगरानी करते हैं (धारा 44); NCPCR बालक अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 के तहत बना।
- मुख्य परीक्षा (250 शब्द): "विशेष ढाँचे के बिना विशेष क़ानून विफल हो जाते हैं।" अलग अभियोजकों और अदालतों पर केरल हाई कोर्ट के अक्टूबर 2026 के निर्देशों के संदर्भ में पॉक्सो एक्ट के क्रियान्वयन की समीक्षा करें।
- नीतिशास्त्र दृष्टि: अनिवार्य सूचना बनाम पारिवारिक दबाव: जब कोई छात्र किसी रिश्तेदार द्वारा शोषण की बात बताए, तो शिक्षक को क्या करना चाहिए?
अभ्यास MCQख़ुद को परखें: पॉक्सो विशेष लोक अभियोजक
लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम, 2012 के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: (1) यह अधिनियम केवल 18 साल से कम उम्र की लड़कियों की रक्षा करता है। (2) इस अधिनियम के तहत विशेष लोक अभियोजक को अधिवक्ता के रूप में कम से कम सात साल का अनुभव होना चाहिए। (3) विशेष अदालत को यथासंभव संज्ञान लेने के एक साल के भीतर सुनवाई पूरी करनी चाहिए। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
शंका समाधानअक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
केरल हाई कोर्ट ने पॉक्सो अभियोजकों पर क्या आदेश दिया?
14 अक्टूबर 2026 को मुख्य न्यायाधीश सौमेन सेन और न्यायमूर्ति श्याम कुमार वी.एम. की पीठ ने वह सरकारी आदेश रद्द किया जिसमें पॉक्सो विशेष लोक अभियोजकों को किशोर न्याय अधिनियम के मामले भी चलाने की अनुमति थी, और राज्य को छह हफ़्ते में केवल पॉक्सो के लिए अभियोजक नियुक्त करने का निर्देश दिया। राज्य से 13 और स्थायी पॉक्सो अदालतों पर विचार करने को भी कहा।
पॉक्सो एक्ट में विशेष लोक अभियोजक कौन होता है?
धारा 32 के तहत राज्य सरकार हर पॉक्सो विशेष अदालत के लिए एक विशेष लोक अभियोजक नियुक्त करती है, जो केवल पॉक्सो एक्ट के मामले चलाता है। उसे अधिवक्ता के रूप में कम से कम सात साल का अनुभव होना चाहिए।
पॉक्सो मामले की सुनवाई की समय-सीमा क्या है?
धारा 35 कहती है कि विशेष अदालत के संज्ञान लेने के 30 दिन में बच्चे का साक्ष्य दर्ज हो, और सुनवाई यथासंभव एक साल में पूरी हो।
बाल यौन शोषण की शिकायत कैसे करें?
चाइल्डलाइन 1098 या 112 पर कॉल करें, नज़दीकी थाने या विशेष किशोर पुलिस इकाई में सूचना दें, या NCPCR की वेबसाइट पर पॉक्सो ई-बॉक्स का इस्तेमाल करें। धारा 19 के तहत ऐसे शोषण की जानकारी रखने वाला हर व्यक्ति सूचना देने के लिए क़ानूनन बाध्य है।
क्या पॉक्सो एक्ट केवल लड़कियों के लिए है?
नहीं। पॉक्सो एक्ट लिंग-तटस्थ है। यह 18 साल से कम उम्र के हर बच्चे, लड़का हो या लड़की, की रक्षा करता है।
स्रोत और आगे की पढ़ाईहमने जिन स्रोतों की जाँच की
इस पेज के समाचार तथ्य 17 अक्टूबर 2026 को नीचे दी गई रिपोर्टों से जाँचे गए। यह पेज लिखते समय केरल हाई कोर्ट के फ़ैसले का पूरा पाठ हमें उपलब्ध नहीं था।
- LiveLaw, Oct 2026: Kerala High Court directs State to appoint Special Public Prosecutors exclusively for POCSO cases within six weeks
- Bar & Bench: Kerala High Court quashes GO permitting POCSO prosecutors to conduct non-POCSO cases
- LawChakra: Kerala High Court quashes order letting POCSO Special Prosecutors handle non-POCSO cases
- The News Minute: Kerala HC finds most POCSO courts lack mandated facilities
- India Code: The Protection of Children from Sexual Offences Act, 2012