न्यायालय की अवमानना: अनुच्छेद 129, आपराधिक अवमानना और वागले-राउत नोटिस
16 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकार निखिल वागले और सांसद संजय राउत से पूछा कि मुख्य न्यायाधीश और न्यायपालिका पर की गई टिप्पणियों के लिए उनके ख़िलाफ़ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए। उचित आलोचना कहाँ ख़त्म होती है और अदालत को कलंकित करना कहाँ शुरू होता है? आसान भाषा में पूरा क़ानून समझिए।
न्यायालय की अवमानना: फ़ैसले की उचित आलोचना और संस्था को कलंकित करने के बीच की रेखा।
📅 अंतिम अपडेट:
लाइव अपडेट
16 अक्टूबर 2026 को क्या हुआ
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन बनाम निखिल वागले और अन्य मामले में CJI सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026 को पत्रकार निखिल वागले और शिवसेना (UBT) के राज्यसभा सांसद संजय राउत को कारण बताओ नोटिस जारी कर पूछा कि उनके ख़िलाफ़ अवमानना की कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए। कोर्ट ने SCBA की उन्हें तलब करने की माँग नहीं मानी और फ़िलहाल व्यक्तिगत पेशी से छूट दी। पीठ ने कहा कि अभी कारण बताओ नोटिस दिया जा रहा है, व्यक्तिगत पेशी से छूट दी जा रही है, "देखते हैं"। CJI ने कहा कि संस्था पर ऐसे हमले बेहद दुर्भाग्यपूर्ण हैं, क्योंकि अदालतों ने हमेशा व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मूल अधिकारों की रक्षा की है।
याचिका में आरोप: वागले पर आरोप है कि उन्होंने X पर CJI को निशाना बनाकर एक अभद्र संदेश पोस्ट किया। यह द हिंदू की उस ख़बर की प्रतिक्रिया में था जिसमें CJI द्वारा चुनाव आयोग के मुद्दे पर विपक्षी प्रतिनिधिमंडल से मिलने से इनकार की बात थी; बाद में उन्होंने पोस्ट हटा दी और माफ़ी माँगी। राउत पर आरोप है कि उन्होंने दावा किया कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के 80 जज लंदन में राजनीतिक नेताओं के साथ बैडमिंटन खेलते देखे गए, और जज BJP के कार्यक्रमों में जाते हैं तथा BJP के मुख्यमंत्री उनके लिए डिनर देते हैं। ये आरोप हैं; कोई निष्कर्ष नहीं निकाला गया है।
प्रक्रिया: SCBA ने याचिका न्यायालय अवमान अधिनियम, 1971 की धारा 15(1)(ख) के तहत दायर की, जिसके लिए अटॉर्नी जनरल की लिखित सहमति ज़रूरी है। अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने 15 अक्टूबर 2026 को, उसी दिन जब SCBA ने उन्हें पत्र लिखा, सहमति दी और पोस्ट को "प्रथम दृष्टया कलंकित करने वाली" तथा सुप्रीम कोर्ट, विशेषकर CJI, की प्रतिष्ठा घटाने के इरादे वाली बताया। अगली तारीख़ की कोई सूचना नहीं है। मामला लंबित है।
✔ तथ्य-जाँचा · 16 अक्टूबर 2026⏳ मामला लंबित
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पृष्ठभूमिभारत में न्यायालय की अवमानना: वागले-राउत मामले की समयरेखा
तारीख़
क्या हुआ
1926 और 1952
पहले के न्यायालय अवमान अधिनियम लागू; अवमानना क्या है, यह मुख्यतः अदालती फ़ैसलों से तय होता था।
1950
संविधान ने सुप्रीम कोर्ट (अनुच्छेद 129) और हाई कोर्ट (अनुच्छेद 215) को अपनी अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति वाले अभिलेख न्यायालय बनाया; अनुच्छेद 19(2) में न्यायालय-अवमान को वाक्-स्वातंत्र्य पर निर्बंधन का आधार बनाया।
1963
एच.एन. सान्याल समिति ने अवमानना क़ानून की समीक्षा की; उसकी रिपोर्ट से नया क़ानून बना।
1971
न्यायालय अवमान अधिनियम, 1971 लागू: सिविल और आपराधिक अवमानना की परिभाषा और अधिकतम दंड तय।
2006
संशोधन से धारा 13 बदली गई: न्याय में सारवान हस्तक्षेप न हो तो दंड नहीं; लोकहित और सद्भाव में सत्य को बचाव माना जा सकता है।
2018
विधि आयोग की 274वीं रिपोर्ट ने आपराधिक अवमानना की परिभाषा में संशोधन न करने की सिफ़ारिश की।
15 अक्टूबर 2026 से पहले
वागले की X पोस्ट (बाद में हटाई, माफ़ी के साथ) और जजों पर राउत की सार्वजनिक टिप्पणियों पर सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने आपत्ति की।
15 अक्टूबर 2026
SCBA ने अटॉर्नी जनरल को पत्र लिखा; AG आर. वेंकटरमणी ने उसी दिन धारा 15(1)(ख) के तहत लिखित सहमति दी।
16 अक्टूबर 2026
CJI सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कारण बताओ नोटिस जारी किए; तलब करने से इनकार; फ़िलहाल व्यक्तिगत पेशी से छूट। लंबित।
परीक्षा के लिए क्यों अहम: सोशल मीडिया के दौर में यह एक पत्रकार और एक मौजूदा सांसद, दोनों के ख़िलाफ़ एक साथ चलने वाला चर्चित आपराधिक अवमानना मामला है। इसमें अनुच्छेद 129, 19(1)(क), 19(2), 105 और 1971 का अधिनियम एक ही कहानी में आ जाते हैं।
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मूल पाठअनुच्छेद 129 और अनुच्छेद 215: अभिलेख न्यायालय और अवमानना के लिए दंड की शक्ति
📜 मूल पाठ · अनुच्छेद 129, 215 और 142(2), भारत का संविधान
129. उच्चतम न्यायालय का अभिलेख न्यायालय होना।
उच्चतम न्यायालय अभिलेख न्यायालय होगा और उसको अपने अवमान के लिए दंड देने की शक्ति सहित ऐसे न्यायालय की सभी शक्तियाँ होंगी।
215. उच्च न्यायालयों का अभिलेख न्यायालय होना।
प्रत्येक उच्च न्यायालय अभिलेख न्यायालय होगा और उसको अपने अवमान के लिए दंड देने की शक्ति सहित ऐसे न्यायालय की सभी शक्तियाँ होंगी।
142. उच्चतम न्यायालय की डिक्रियों और आदेशों का प्रवर्तन और प्रकटीकरण आदि के बारे में आदेश।
(2) संसद द्वारा इस निमित्त बनाई गई किसी विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए, उच्चतम न्यायालय को भारत के संपूर्ण राज्यक्षेत्र के बारे में किसी व्यक्ति को हाज़िर कराने के, किन्हीं दस्तावेज़ों के प्रकटीकरण या पेश कराने के अथवा अपने किसी अवमान का अन्वेषण करने या दंड देने के प्रयोजन के लिए कोई आदेश करने की समस्त और प्रत्येक शक्ति होगी।
In Simple Words / आसान शब्दों में
अभिलेख न्यायालय (कोर्ट ऑफ़ रिकॉर्ड) वह अदालत है जिसके फ़ैसले और कार्यवाही स्थायी रिकॉर्ड के रूप में रखे जाते हैं और हर जगह साक्ष्य के रूप में माने जाते हैं, और जिसके पास अपनी अवमानना करने वाले को दंड देने की अंतर्निहित शक्ति होती है। अनुच्छेद 129 यह दर्जा सुप्रीम कोर्ट को और अनुच्छेद 215 हर हाई कोर्ट को देता है। अनुच्छेद 142(2) जोड़ता है कि सुप्रीम कोर्ट, संसद के क़ानून के अधीन रहते हुए, पूरे भारत में अपनी अवमानना की जाँच या दंड के लिए कोई भी आदेश दे सकता है।
मुख्य शब्द है "अंतर्निहित"। यह शक्ति 1971 के अधिनियम से नहीं, सीधे संविधान से आती है। इन रे विजय कुर्ले (2020) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 129 की उसकी शक्ति 1971 के अधिनियम की प्रक्रिया से सीमित नहीं होती। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ (1998) में कोर्ट ने एक सीमा भी तय की: अनुच्छेद 129 और 142 से किसी वकील का लाइसेंस निलंबित नहीं किया जा सकता, यह बार काउंसिल का काम है।
🏠 रोज़मर्रा की मिसाल
फ़ुटबॉल मैच में रेफ़री उसे गाली देने वाले खिलाड़ी को लीग कमेटी की बैठक का इंतज़ार किए बिना लाल कार्ड दिखा सकता है। यह शक्ति इसलिए है क्योंकि रेफ़री का अधिकार ढह जाए तो मैच नहीं चल सकता। पर रेफ़री खिलाड़ी का लीग रजिस्ट्रेशन रद्द नहीं कर सकता।
🇮🇳 असली भारतीय उदाहरण
इन रे: प्रशांत भूषण (2020) में सुप्रीम कोर्ट ने CJI और कोर्ट के बारे में दो ट्वीट पर स्वयं संज्ञान लिया और 1 रुपये का जुर्माना लगाया। कोर्ट ने अनुच्छेद 129 के तहत अभिलेख न्यायालय की शक्ति का इस्तेमाल किया।
अवमानना पर क़ानून कौन बनाता है? संघ सूची की प्रविष्टि 77 में सुप्रीम कोर्ट "ऐसे न्यायालय के अवमान सहित" शामिल है। समवर्ती सूची की प्रविष्टि 14 में "न्यायालय-अवमान, किंतु इसके अंतर्गत उच्चतम न्यायालय का अवमान नहीं है"। यानी सुप्रीम कोर्ट की अवमानना पर क़ानून केवल संसद बना सकती है, जबकि अन्य अदालतों की अवमानना पर संसद और राज्य दोनों।
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धारा का पाठन्यायालय अवमान अधिनियम, 1971 के तहत आपराधिक अवमानना
📜 अनौपचारिक हिंदी अनुवाद · न्यायालय अवमान अधिनियम, 1971 की धारा 2(क), (ख), (ग)
2. परिभाषाएँ। इस अधिनियम में, जब तक संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,—
(क) "न्यायालय अवमान" से सिविल अवमान या आपराधिक अवमान अभिप्रेत है;
(ख) "सिविल अवमान" से किसी न्यायालय के किसी निर्णय, डिक्री, निदेश, आदेश, रिट या अन्य आदेशिका की जानबूझकर अवज्ञा, या न्यायालय को दिए गए किसी वचनबंध का जानबूझकर भंग अभिप्रेत है;
(ग) "आपराधिक अवमान" से किसी भी बात का (चाहे बोले या लिखे गए शब्दों द्वारा, या संकेतों द्वारा, या दृश्य रूपणों द्वारा, या अन्यथा) प्रकाशन, अथवा कोई भी ऐसा अन्य कार्य करना अभिप्रेत है, जो—
(i) किसी न्यायालय को कलंकित करता है या कलंकित करने की प्रवृत्ति रखता है, अथवा उसके प्राधिकार को घटाता है या घटाने की प्रवृत्ति रखता है; या
(ii) किसी न्यायिक कार्यवाही के उचित क्रम पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है, या उसमें हस्तक्षेप करता है या हस्तक्षेप करने की प्रवृत्ति रखता है; या
(iii) किसी अन्य रीति से न्याय-प्रशासन में हस्तक्षेप करता है या हस्तक्षेप करने की प्रवृत्ति रखता है, अथवा उसमें बाधा डालता है या बाधा डालने की प्रवृत्ति रखता है;
In Simple Words / आसान शब्दों में
अधिनियम दो तरह की अवमानना मानता है:
सिविल अवमाननाअवज्ञा से जुड़ी है: कोई जानबूझकर अदालत का आदेश न माने या अदालत को दिया गया वचन (अंडरटेकिंग) तोड़े। आपराधिक अवमाननाव्यवस्था पर हमले से जुड़ी है: ऐसा कुछ प्रकाशित करना या करना जो (i) अदालत को कलंकित करे या उसका प्राधिकार घटाए, (ii) लंबित मामले पर असर डाले, या (iii) न्याय-प्रशासन में बाधा डाले। मौजूदा मामला पहले हिस्से से जुड़ा है, जिसे आम तौर पर "अदालत को कलंकित करना" (स्कैंडलाइज़िंग द कोर्ट) कहते हैं।
शब्द "प्रवृत्ति रखता है" पर ध्यान दें: यह साबित करना ज़रूरी नहीं कि लोगों का अदालत पर भरोसा सच में घटा; प्राधिकार घटाने की प्रवृत्ति भी काफ़ी हो सकती है। इसीलिए आलोचक इस अपराध को अस्पष्ट कहते हैं।
🏠 रोज़मर्रा की मिसाल
स्कूल में जो छात्र शिक्षक के कहने पर भी होमवर्क जमा नहीं करता, वह सिविल अवमानना जैसा है। जो छात्र क्लास के WhatsApp ग्रुप में बिना सबूत अफ़वाह फैलाए कि प्रिंसिपल रिश्वत लेकर नंबर देते हैं, वह आपराधिक अवमानना जैसा है: हमला उस भरोसे पर है जिस पर पूरा स्कूल चलता है।
🇮🇳 असली भारतीय उदाहरण
जब कोई सरकारी विभाग हाई कोर्ट के आदेश के बावजूद वेतन या पेंशन नहीं देता, तो सिविल अवमानना याचिकाएँ आम हैं। आपराधिक अवमानना कम होती है और बयानों से जुड़ी होती है, जैसे SCBA की याचिका में अब सुप्रीम कोर्ट के सामने रखी गई टिप्पणियाँ।
📜 अनौपचारिक हिंदी अनुवाद · न्यायालय अवमान अधिनियम, 1971 की धारा 15(1) और स्पष्टीकरण
15. अन्य मामलों में आपराधिक अवमान का संज्ञान।
(1) धारा 14 में निर्दिष्ट अवमान से भिन्न आपराधिक अवमान के मामले में, उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय स्वप्रेरणा से, या निम्नलिखित द्वारा किए गए समावेदन (मोशन) पर कार्रवाई कर सकता है—
(क) महाधिवक्ता, या
(ख) महाधिवक्ता की लिखित सहमति से कोई अन्य व्यक्ति, या
(ग) दिल्ली संघ राज्यक्षेत्र के उच्च न्यायालय के संबंध में, केंद्र सरकार का ऐसा विधि अधिकारी जिसे केंद्र सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस हेतु विनिर्दिष्ट करे, या ऐसे विधि अधिकारी की लिखित सहमति से कोई अन्य व्यक्ति।
स्पष्टीकरण—इस धारा में "महाधिवक्ता" से अभिप्रेत है— (क) उच्चतम न्यायालय के संबंध में, महान्यायवादी (अटॉर्नी जनरल) या महासॉलिसिटर (सॉलिसिटर जनरल); ...
In Simple Words / आसान शब्दों में
धारा 15 बताती है कि आपराधिक अवमानना का मामला कौन शुरू कर सकता है। अदालत ख़ुद (स्वप्रेरणा से, सुओ मोटो) कार्रवाई कर सकती है। वरना किसी निजी व्यक्ति या संस्था को पहले सुप्रीम कोर्ट के लिए अटॉर्नी जनरल या सॉलिसिटर जनरल की लिखित सहमति, और हाई कोर्ट के लिए एडवोकेट जनरल की सहमति लेनी होती है। यह सहमति एक छलनी है: निजी रंजिश और बेबुनियाद शिकायतों से अदालत का समय बर्बाद होने से बचाती है।
🏠 रोज़मर्रा की मिसाल
सोसाइटी का कोई सदस्य कोषाध्यक्ष को हटाने के लिए विशेष आम सभा बुलाना चाहे, तो नियमों के अनुसार पहले सचिव की मंज़ूरी लगती है। सचिव नतीजा तय नहीं करता; बस जाँचता है कि शिकायत बैठक लायक़ है या नहीं।
🇮🇳 असली भारतीय उदाहरण
यहाँ SCBA ने धारा 15(1)(ख) का इस्तेमाल किया। AG आर. वेंकटरमणी ने 15 अक्टूबर 2026 को पोस्ट को "प्रथम दृष्टया कलंकित करने वाली" बताते हुए लिखित सहमति दी, और अगले दिन कोर्ट ने नोटिस जारी किया।
📜 अनौपचारिक हिंदी अनुवाद · न्यायालय अवमान अधिनियम, 1971 की धारा 5, 12(1) और 13
5. न्यायिक कार्य की उचित आलोचना अवमान नहीं।
कोई व्यक्ति किसी ऐसे मामले के गुण-दोष पर, जिसकी सुनवाई हो चुकी है और जो अंतिम रूप से विनिश्चित हो चुका है, कोई उचित टिप्पणी प्रकाशित करने के लिए न्यायालय अवमान का दोषी नहीं होगा।
12. न्यायालय अवमान के लिए दंड।
(1) इस अधिनियम में या किसी अन्य विधि में अभिव्यक्त रूप से अन्यथा उपबंधित के सिवाय, न्यायालय अवमान के लिए सादा कारावास, जिसकी अवधि छह मास तक हो सकेगी, या जुर्माना, जो दो हज़ार रुपये तक हो सकेगा, या दोनों से दंडित किया जा सकेगा:
परंतु अभियुक्त द्वारा न्यायालय के समाधानप्रद रूप में क्षमायाचना किए जाने पर उसे उन्मोचित किया जा सकेगा या अधिनिर्णीत दंड का परिहार किया जा सकेगा।
स्पष्टीकरण—कोई क्षमायाचना केवल इस आधार पर अस्वीकार नहीं की जाएगी कि वह सीमित या सशर्त है, यदि अभियुक्त उसे सद्भावपूर्वक करता है।
13. कुछ मामलों में अवमान दंडनीय नहीं। तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में किसी बात के होते हुए भी,—
(क) कोई न्यायालय इस अधिनियम के अधीन न्यायालय अवमान के लिए दंड तब तक अधिरोपित नहीं करेगा जब तक उसका यह समाधान न हो जाए कि अवमान ऐसी प्रकृति का है कि वह न्याय के उचित क्रम में सारवान रूप से हस्तक्षेप करता है या सारवान रूप से हस्तक्षेप करने की प्रवृत्ति रखता है;
(ख) न्यायालय, न्यायालय अवमान की किसी कार्यवाही में, सत्य द्वारा न्यायोचित ठहराने को विधिमान्य बचाव के रूप में अनुमत कर सकेगा, यदि उसका यह समाधान हो जाए कि यह लोकहित में है और उक्त बचाव का सहारा लेने का अनुरोध सद्भावपूर्ण है।
In Simple Words / आसान शब्दों में
अधिनियम में वाक्-स्वातंत्र्य के लिए सुरक्षा वाल्व हैं:
धारा 5: जिस मामले की सुनवाई हो चुकी है और जो अंतिम रूप से तय हो चुका है, उसके गुण-दोष पर उचित टिप्पणी अवमानना नहीं है। धारा 13(क): जब तक अवमानना न्याय में सारवान हस्तक्षेप न करे, दंड नहीं; यानी छोटी-मोटी टिप्पणियों को नज़रअंदाज़ किया जाए। धारा 13(ख) (2006 में जोड़ी गई): सत्य बचाव हो सकता है, अगर वह लोकहित में हो और अनुरोध सद्भावपूर्ण हो। धारा 12: अधिकतम दंड छह महीने तक सादा कारावास, या 2,000 रुपये तक जुर्माना, या दोनों है, और सच्ची माफ़ी से मामला ख़त्म हो सकता है।
🏠 रोज़मर्रा की मिसाल
क्रिकेट कमेंटेटर कह सकता है "वह LBW फ़ैसला ग़लत था, गेंद लेग स्टंप से बाहर जा रही थी"। यह उचित आलोचना है। बिना सबूत यह कहना कि "अंपायर को दूसरी टीम ने ख़रीद लिया" अंपायर की ईमानदारी और पूरे खेल पर हमला है।
🇮🇳 असली भारतीय उदाहरण
पी.एन. दुडा बनाम पी. शिव शंकर (1988) में तत्कालीन केंद्रीय क़ानून मंत्री के सुप्रीम कोर्ट की तीखी आलोचना वाले भाषण को अवमानना नहीं माना गया: वह आलोचना थी, कितनी भी तीखी हो, न्याय में बाधा डालने की कोशिश नहीं।
✅ उचित आलोचना (अनुमत)
फ़ैसले के तर्क या नतीजे से असहमति।
क़ानून या तथ्य की ग़लतियाँ, देरी या लंबित मामलों की ओर ध्यान दिलाना।
अंतिम रूप से तय मामले पर टिप्पणी (धारा 5)।
तथ्यों के साथ न्यायिक जवाबदेही या नियुक्तियों में सुधार की माँग।
ऐसे बयान जो सत्य हों, लोकहित में हों और सद्भाव से दिए गए हों (धारा 13(ख))।
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🚫 कलंकित करना (अवमानना)
बिना आधार जजों पर भ्रष्ट या अनुचित इरादे का आरोप।
जज पर व्यक्ति के रूप में अभद्र, अपमानजनक या निजी हमले।
जनता का भरोसा तोड़ने के लिए यह आरोप कि पूरी अदालत बिकी हुई या नियंत्रित है।
ऐसी टिप्पणी जो लंबित मामले पर असर डाले या जज पर दबाव बनाए।
अदालत के आदेश न मानने या न्याय-प्रशासन में बाधा डालने का आह्वान।
मूल विचार: जज की आलोचना हो सकती है; संस्था को कलंकित नहीं किया जा सकता। अदालतें देखती हैं कि बयान किसी फ़ैसले पर तर्कपूर्ण हमला है या संस्था की ईमानदारी पर लापरवाह हमला। मौजूदा याचिका के आरोप इसी रेखा पर परखे जाएँगे। कोर्ट ने अभी केवल नोटिस दिया है; अवमानना बनती है या नहीं, यह तय नहीं हुआ है।
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मूल पाठअनुच्छेद 19(1)(क), 19(2) और अनुच्छेद 105: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और न्यायालय की अवमानना
📜 मूल पाठ · अनुच्छेद 19(1)(क) और 19(2), भारत का संविधान
19. वाक्-स्वातंत्र्य आदि विषयक कुछ अधिकारों का संरक्षण।
(1) सभी नागरिकों को—
(क) वाक्-स्वातंत्र्य और अभिव्यक्ति-स्वातंत्र्य का,
अधिकार होगा।
(2) खंड (1) के उपखंड (क) की कोई बात उक्त उपखंड द्वारा दिए गए अधिकार के प्रयोग पर भारत की प्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार या सदाचार के हितों में अथवा न्यायालय-अवमान, मानहानि या अपराध-उद्दीपन के संबंध में युक्तियुक्त निर्बंधन जहाँ तक कोई विद्यमान विधि अधिरोपित करती है वहाँ तक उसके प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी या वैसे निर्बंधन अधिरोपित करने वाली कोई विधि बनाने से राज्य को निवारित नहीं करेगी।
In Simple Words / आसान शब्दों में
हर नागरिक को वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, जिसमें जजों और फ़ैसलों की आलोचना का अधिकार भी शामिल है। पर अनुच्छेद 19(2) में "न्यायालय-अवमान" उन आधारों में है जिन पर राज्य युक्तियुक्त निर्बंधन लगा सकता है। यानी अवमानना क़ानून अभिव्यक्ति पर संविधान द्वारा अनुमत सीमा है, पर उसे "युक्तियुक्त" रहना होगा। ईमानदार आलोचना को दंडित करने वाला निर्बंधन ख़ुद असंवैधानिक होगा।
🏠 रोज़मर्रा की मिसाल
आप अपने शहर के अस्पताल की तीखी समीक्षा लिख सकते हैं: लंबी कतारें, रूखा स्टाफ़, ख़राब इलाज। पर यह पोस्ट नहीं कर सकते कि कोई नामित डॉक्टर पैसे के लिए मरीज़ों को ज़हर देता है, जब तक साबित न कर सकें। पहली बात अस्पताल सुधारती है; दूसरी मरीज़ों को इलाज से डरा सकती है।
🇮🇳 असली भारतीय उदाहरण
इन रे अरुंधति रॉय (2002) में सुप्रीम कोर्ट ने उनके हलफ़नामे के बयानों को आपराधिक अवमानना माना और एक दिन की प्रतीकात्मक क़ैद व 2,000 रुपये जुर्माने की सज़ा दी। इससे साफ़ हुआ कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कोर्ट पर लांछन को संरक्षण नहीं देती।
📜 मूल पाठ · अनुच्छेद 105(1) और (2), भारत का संविधान
105. संसद के सदनों की तथा उनके सदस्यों और समितियों की शक्तियाँ, विशेषाधिकार आदि।
(1) इस संविधान के उपबंधों और संसद की प्रक्रिया का विनियमन करने वाले नियमों और स्थायी आदेशों के अधीन रहते हुए, संसद में वाक्-स्वातंत्र्य होगा।
(2) संसद में या उसकी किसी समिति में संसद के किसी सदस्य द्वारा कही गई किसी बात या दिए गए किसी मत के संबंध में उसके विरुद्ध किसी न्यायालय में कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी और किसी व्यक्ति के विरुद्ध संसद के किसी सदन के प्राधिकार द्वारा या उसके अधीन किसी प्रतिवेदन, पत्र, मतों या कार्यवाहियों के प्रकाशन के संबंध में इस प्रकार की कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी।
In Simple Words / आसान शब्दों में
सांसदों को संसद के भीतर पूर्ण वाक्-स्वातंत्र्य है: सदन या उसकी समितियों में कही गई बात या दिए गए मत के लिए उन पर कोई अदालती मामला नहीं हो सकता। पर यह छूट केवल संसद में दिए भाषण और मत तक है। प्रेस कॉन्फ़्रेंस, इंटरव्यू या सोशल मीडिया पर की गई टिप्पणियाँ किसी भी नागरिक के बयान जैसी मानी जाती हैं। इसलिए संजय राउत संसद के बाहर दिए बयानों के लिए संसदीय विशेषाधिकार का दावा नहीं कर सकते।
उल्टी दिशा में भी संयम है: अनुच्छेद 121 के तहत संसद स्वयं सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के किसी जज के कर्तव्य-पालन में आचरण पर चर्चा नहीं कर सकती, सिवाय जज को हटाने के प्रस्ताव के।
🏠 रोज़मर्रा की मिसाल
स्टाफ़ मीटिंग के भीतर शिक्षक की बातें मीटिंग के नियमों से सुरक्षित हैं। वही शिक्षक सार्वजनिक फ़ेसबुक पेज पर कुछ कहे तो वे नियम उस पर लागू ही नहीं होते।
🇮🇳 असली भारतीय उदाहरण
राउत मौजूदा राज्यसभा सांसद हैं, पर SCBA की याचिका में उद्धृत टिप्पणियाँ सदन के बाहर की गई थीं, इसलिए अनुच्छेद 105(2) उन्हें अवमानना कार्यवाही से नहीं बचाता।
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ऐतिहासिक फ़ैसलेभारत में न्यायालय की अवमानना: सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख मामले
मामला
कोर्ट ने क्या कहा
क्यों अहम
ई.एम.एस. नंबूदरीपाद बनाम टी.एन. नांबियार (1970)
केरल के मुख्यमंत्री द्वारा न्यायपालिका को वर्ग-शोषण का साधन बताना अवमानना माना गया; दोषसिद्धि बरक़रार।
मौजूदा मुख्यमंत्री का वैचारिक हमला भी अदालतों को कलंकित कर सकता है।
पी.एन. दुडा बनाम पी. शिव शंकर (1988)
सुप्रीम कोर्ट पर केंद्रीय क़ानून मंत्री का आलोचनात्मक भाषण अवमानना नहीं।
संस्था के रवैये की तीखी आलोचना भी अनुमत है, अगर वह न्याय में बाधा न डाले।
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ (1998)
अनुच्छेद 129 और 142 से वकील का प्रैक्टिस लाइसेंस निलंबित नहीं किया जा सकता।
अवमानना शक्ति व्यापक है, असीमित नहीं; यह बार काउंसिल जैसे वैधानिक निकायों को दरकिनार नहीं कर सकती।
इन रे अरुंधति रॉय (2002)
लेखिका आपराधिक अवमानना की दोषी; एक दिन की प्रतीकात्मक क़ैद और 2,000 रुपये जुर्माना।
हलफ़नामे में कोर्ट पर लांछन संरक्षित अभिव्यक्ति नहीं।
इन रे विजय कुर्ले (2020)
अनुच्छेद 129 की सुप्रीम कोर्ट की शक्ति अंतर्निहित है, 1971 के अधिनियम की प्रक्रिया से सीमित नहीं।
कोर्ट स्वप्रेरणा से कार्रवाई कर सकता है और अपनी प्रक्रिया तय कर सकता है।
इन रे: प्रशांत भूषण (2020)
CJI और कोर्ट पर ट्वीट के लिए वकील दोषी; 1 रुपये जुर्माना।
देशभर में बहस छिड़ी कि अदालत को कलंकित करने का अपराध रहना चाहिए या नहीं।
SCBA बनाम निखिल वागले और अन्य (2026)
कारण बताओ नोटिस जारी; फ़िलहाल व्यक्तिगत पेशी से छूट।
लंबित। पत्रकार और सांसद की सोशल मीडिया अभिव्यक्ति पर अवमानना क़ानून की परीक्षा।
In Simple Words / आसान शब्दों में
इन मामलों को साथ पढ़ें तो एक पैटर्न दिखता है: अदालतें तर्क की आलोचना की रक्षा करती हैं (दुडा), पर ईमानदारी पर हमले को दंडित करती हैं (नंबूदरीपाद, रॉय, भूषण), और अब जेल के बजाय प्रतीकात्मक दंड या माफ़ी स्वीकार करना पसंद करती हैं। कोर्ट "अपने ही मामले में जज" दिखने से भी सावधान रहता है।
विदेश में रुझान उल्टा रहा है। लॉर्ड डेनिंग ने R v Metropolitan Police Commissioner, ex parte Blackburn (No 2) (1968) में कहा: "हम इस अधिकार-क्षेत्र का इस्तेमाल अपनी गरिमा बनाए रखने के साधन के रूप में कभी नहीं करेंगे।" ब्रिटेन ने क्राइम एंड कोर्ट्स एक्ट 2013 से इंग्लैंड और वेल्स में न्यायपालिका को कलंकित करने का अपराध ख़त्म कर दिया। भारत के विधि आयोग ने 274वीं रिपोर्ट (2018) में आपराधिक अवमानना की परिभाषा में संशोधन न करने की सिफ़ारिश की, इसलिए यह अपराध भारतीय क़ानून में बना हुआ है।
🏠 रोज़मर्रा की मिसाल
शादी में किसी बुज़ुर्ग का मज़ाक़ उड़ाया जाए तो वे पलटकर चिल्ला सकते हैं या मुस्कुराकर आगे बढ़ सकते हैं। मुस्कुराने वाले बुज़ुर्ग को अक्सर इज़्ज़त माँगने वाले से ज़्यादा इज़्ज़त मिलती है।
🇮🇳 असली भारतीय उदाहरण
प्रशांत भूषण मामले (2020) में 1 रुपये के जुर्माने को कई लोगों ने इस संकेत के रूप में देखा कि कोर्ट आलोचक को शहीद बनाए बिना अपना अधिकार जताना चाहता था।
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विश्लेषणअदालत को कलंकित करना: पक्ष-विपक्ष के तर्क और आगे की राह
🛡️ अपराध बनाए रखने के पक्ष में
परंपरा के अनुसार जज हमलों का सार्वजनिक जवाब नहीं दे सकते; अवमानना ही उनकी ढाल है।
जनता का भरोसा ही अदालत की असली ताक़त है; उसके पास न सेना है, न ख़ज़ाना।
सोशल मीडिया पर जजों के ख़िलाफ़ बिना जाँचे आरोप मिनटों में लाखों तक पहुँचते हैं।
अनुच्छेद 19(2) स्पष्ट रूप से न्यायालय-अवमान को निर्बंधन का आधार मानता है।
विधि आयोग की 274वीं रिपोर्ट (2018) ने परिभाषा कमज़ोर न करने की सलाह दी।
धारा 5 और 13 पहले से उचित और सत्य आलोचना की रक्षा करती हैं।
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🗣️ इसे सीमित करने के पक्ष में
"कलंकित करना" और "प्रवृत्ति" जैसे शब्द अस्पष्ट हैं और वैध आलोचना को दबा सकते हैं (चिलिंग इफ़ेक्ट)।
अदालत अपने ही मामले में पीड़ित, अभियोजक और जज तीनों बनती है।
ब्रिटेन ने 2013 में यह अपराध ख़त्म किया; लॉर्ड डेनिंग ने गरिमा के लिए इसके इस्तेमाल से आगाह किया था।
मुक़दमा चलाने से टिप्पणी पर और ज़्यादा ध्यान जाता है (स्ट्राइसैंड इफ़ेक्ट)।
मज़बूत न्यायपालिका तर्कपूर्ण फ़ैसलों से भरोसा कमाती है, दंड से नहीं।
जजों की जवाबदेही के तंत्र सीमित हैं, इसलिए सार्वजनिक आलोचना एक कमी पूरी करती है।
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संयम से इस्तेमाल
आपराधिक अवमानना उन्हीं टिप्पणियों के लिए रहे जो न्याय में सारवान हस्तक्षेप करें, जैसा धारा 13(क) पहले से कहती है; मामूली बातों को नज़रअंदाज़ करें।
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माफ़ी और सुधार को प्राथमिकता
सद्भावपूर्ण माफ़ी और पोस्ट हटाना, जैसा धारा 12 अनुमति देती है, आम तौर पर मामला ख़त्म कर दे।
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AG की छलनी मज़बूत हो
धारा 15 की सहमति एक तर्कपूर्ण जाँच हो, ताकि केवल गंभीर मामले ही कोर्ट तक पहुँचें।
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स्पष्ट मार्गदर्शन
तर्क की आलोचना और इरादों पर लांछन के फ़र्क़ पर एकसमान न्यायिक मार्गदर्शन अनिश्चितता घटाएगा।
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दिखने वाली न्यायिक जवाबदेही
पारदर्शी इन-हाउस प्रक्रिया (1999 में अपनाई गई) और अनुच्छेद 124(4) के तहत हटाने के लिए न्यायाधीश (जाँच) अधिनियम, 1968 नागरिकों को शिकायत का उचित रास्ता देते हैं, जिससे सोशल मीडिया पर आरोप लगाने की प्रवृत्ति घटती है।
क़ानूनी जागरूकता: अदालतों के बारे में ऑनलाइन क्या सुरक्षित रूप से कह सकते हैं
तर्क की आलोचना करें: "फ़ैसले ने अनुच्छेद 14 को नज़रअंदाज़ किया क्योंकि..." उचित टिप्पणी है।
तथ्य और स्रोत दें: आदेश का लिंक दें, सही उद्धरण दें, तारीख़ें बताएँ।
लंबित मामलों में सावधानी: सुनवाई चलते समय जज पर दबाव डालने या पहले से दोष तय करने वाली टिप्पणी से बचें।
बिना सबूत भ्रष्टाचार या पक्षपात का आरोप न लगाएँ: रिश्वत या राजनीतिक मेहरबानी के आरोप के लिए सबूत चाहिए; सबूत हो तो उचित रास्ता अपनाएँ (इन-हाउस प्रक्रिया के तहत CJI)।
गाली या अभद्र भाषा नहीं: निजी अपमान तर्क में कुछ नहीं जोड़ता और कलंकित करना माना जा सकता है।
सीमा लाँघ जाएँ तो: तुरंत पोस्ट हटाएँ, सुधारें और माफ़ी माँगें; धारा 12 के तहत सद्भावपूर्ण माफ़ी मायने रखती है।
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UPSC कॉर्नरUPSC प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा के लिए न्यायालय की अवमानना
प्रारंभिक तथ्य: अनुच्छेद 129 (सुप्रीम कोर्ट) और अनुच्छेद 215 (हाई कोर्ट) उन्हें अपनी अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति वाला अभिलेख न्यायालय बनाते हैं।
प्रारंभिक तथ्य: सुप्रीम कोर्ट की अवमानना: संघ सूची की प्रविष्टि 77। अन्य अदालतों की अवमानना: समवर्ती सूची की प्रविष्टि 14 (जिसमें सुप्रीम कोर्ट शामिल नहीं)।
प्रारंभिक तथ्य: न्यायालय अवमान अधिनियम, 1971, एच.एन. सान्याल समिति (1963) पर आधारित। सिविल अवमानना: धारा 2(ख)। आपराधिक अवमानना: धारा 2(ग)।
प्रारंभिक तथ्य: अधिकतम दंड (धारा 12): छह महीने तक सादा कारावास, या 2,000 रुपये तक जुर्माना, या दोनों। सत्य को बचाव: धारा 13(ख), 2006 में जोड़ी गई।
प्रारंभिक तथ्य: सुप्रीम कोर्ट में आपराधिक अवमानना के लिए निजी व्यक्ति को अटॉर्नी जनरल या सॉलिसिटर जनरल की लिखित सहमति चाहिए (धारा 15(1)(ख))।
प्रारंभिक तथ्य: अनुच्छेद 105(2) की छूट केवल संसद या उसकी समितियों में सांसद द्वारा कही बात या दिए मत तक है।
मुख्य परीक्षा GS2 (250 शब्द): "अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति न्याय-प्रशासन की रक्षा के लिए है, न कि जजों की व्यक्तिगत गरिमा के लिए।" हाल के मामलों के आलोक में भारत में अदालत को कलंकित करने संबंधी क़ानून पर चर्चा कीजिए और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए सुरक्षा उपाय सुझाइए।
मुख्य परीक्षा GS4 (नीतिशास्त्र): न्यायिक संयम बनाम संस्थागत आत्मरक्षा: क्या संवैधानिक अदालत को निजी अपमान का जवाब अवमानना शक्ति से देना चाहिए या चुप्पी से? सहिष्णुता, जवाबदेही और जन-विश्वास के मूल्यों पर चर्चा कीजिए।
निबंध कोण: "जज की आलोचना हो सकती है, संस्था को कलंकित नहीं किया जा सकता।"
नीतिशास्त्र दृष्टि: जजों को संयम दिखाना चाहिए और अवमानना का इस्तेमाल निजी प्रतिष्ठा बचाने के लिए नहीं करना चाहिए; सार्वजनिक हस्तियों को ज़िम्मेदारी दिखानी चाहिए, क्योंकि सांसद या पत्रकार के शब्दों का वज़न होता है; और व्यवस्था को वास्तविक जवाबदेही देनी चाहिए (इन-हाउस प्रक्रिया, 1999; न्यायाधीश (जाँच) अधिनियम, 1968 के ज़रिए अनुच्छेद 124(4) के तहत हटाना) ताकि भरोसा कमाया जाए, थोपा न जाए।
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अभ्यास MCQख़ुद को परखें: न्यायालय की अवमानना: वागले, राउत को नोटिस
भारत में न्यायालय की अवमानना के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: (1) सुप्रीम कोर्ट की अवमानना संबंधी विधान समवर्ती सूची की प्रविष्टि 14 के अंतर्गत आता है। (2) 2006 में संशोधित न्यायालय अवमान अधिनियम, 1971 के तहत अदालत सत्य को विधिमान्य बचाव के रूप में अनुमत कर सकती है, यदि वह लोकहित में हो और अनुरोध सद्भावपूर्ण हो। (3) अधिनियम की धारा 12 के तहत अधिकतम दंड छह महीने तक सादा कारावास, या दो हज़ार रुपये तक जुर्माना, या दोनों है। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
उत्तर: (b) केवल 2 और 3। कथन 1 ग़लत है: सुप्रीम कोर्ट की अवमानना संघ सूची की प्रविष्टि 77 में है; समवर्ती सूची की प्रविष्टि 14 सुप्रीम कोर्ट की अवमानना को स्पष्ट रूप से बाहर रखती है। कथन 2 सही है: 2006 में प्रतिस्थापित धारा 13(ख) इन शर्तों पर सत्य को बचाव मानती है। कथन 3 सही है: धारा 12(1) में यही सीमाएँ हैं, और सद्भावपूर्ण माफ़ी पर अभियुक्त को उन्मोचित किया जा सकता है या दंड माफ़ किया जा सकता है।
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शंका समाधानअक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भारत में न्यायालय की अवमानना क्या है?
न्यायालय की अवमानना ऐसा आचरण है जो अदालत का अनादर करे या उसके काम में बाधा डाले। न्यायालय अवमान अधिनियम, 1971 के तहत यह सिविल अवमानना (अदालती आदेश की जानबूझकर अवज्ञा या वचन भंग) या आपराधिक अवमानना (अदालत को कलंकित करना या उसका प्राधिकार घटाना, न्यायिक कार्यवाही पर असर डालना, या न्याय-प्रशासन में बाधा) होती है। अनुच्छेद 129 और 215 सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट को अपनी अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति देते हैं।
आपराधिक अवमानना और अदालत को कलंकित करना क्या है?
1971 के अधिनियम की धारा 2(ग) के तहत आपराधिक अवमानना में ऐसा कोई भी प्रकाशन या कार्य शामिल है जो अदालत को कलंकित करे या उसकी प्रवृत्ति रखे, या उसका प्राधिकार घटाए या घटाने की प्रवृत्ति रखे। कलंकित करने का आम अर्थ है बिना आधार जजों पर भ्रष्ट या अनुचित इरादों का आरोप लगाना या संस्था को ऐसे अपमानित करना जिससे न्याय पर जनता का भरोसा डगमगाए। फ़ैसले की उचित आलोचना कलंकित करना नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने निखिल वागले और संजय राउत को अवमानना नोटिस क्यों दिया?
16 अक्टूबर 2026 को CJI सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की याचिका पर कारण बताओ नोटिस जारी किए, जो धारा 15(1)(ख) के तहत अटॉर्नी जनरल की सहमति से दायर की गई थी। याचिका में आरोप है कि वागले ने X पर CJI के बारे में अभद्र संदेश पोस्ट किया (बाद में हटाया और माफ़ी माँगी) और राउत ने जजों के राजनीतिक नेताओं के साथ मेलजोल के दावे किए। कोर्ट ने फ़िलहाल व्यक्तिगत पेशी से छूट दी है। मामला लंबित है।
क्या भारत में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले की आलोचना कर सकते हैं?
हाँ। न्यायालय अवमान अधिनियम की धारा 5 सुनवाई पूरी होकर अंतिम रूप से तय मामले के गुण-दोष पर उचित टिप्पणी की रक्षा करती है, और अनुच्छेद 19(1)(क) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। आप तथ्यों के साथ तर्क की आलोचना कर सकते हैं। गाली-गलौज, बिना सबूत जजों पर भ्रष्ट इरादों का आरोप, या लंबित मामले पर असर डालने वाली टिप्पणी संरक्षित नहीं है।
भारत में न्यायालय की अवमानना की सज़ा क्या है?
न्यायालय अवमान अधिनियम, 1971 की धारा 12 के तहत अवमानना के लिए छह महीने तक सादा कारावास, या दो हज़ार रुपये तक जुर्माना, या दोनों हो सकते हैं। सद्भावपूर्ण माफ़ी से अदालत संतुष्ट हो तो अभियुक्त को छोड़ा जा सकता है या दंड माफ़ किया जा सकता है, और धारा 13 के तहत जब तक अवमानना न्याय में सारवान हस्तक्षेप न करे, सज़ा नहीं दी जाती।
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स्रोत और आगे की पढ़ाईहमने जिन स्रोतों की जाँच की
इस पेज के समाचार तथ्य 16 अक्टूबर 2026 को नीचे दी गई रिपोर्टों से जाँचे गए। अवमानना मामला लंबित है और अभी केवल नोटिस जारी हुए हैं; इस पेज की कोई बात दोष का निष्कर्ष नहीं है।