जंतर मंतर विरोध प्रदर्शन प्रतिबंध: अनुच्छेद 19 और BNSS धारा 163 के तहत प्रदर्शन का अधिकार
11 अक्टूबर 2026 को दिल्ली पुलिस ने जंतर मंतर को आधिकारिक प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटा दिया। क्या सरकार तय कर सकती है कि नागरिक कहाँ प्रदर्शन करें? सभा के अधिकार और लोक व्यवस्था के बीच संतुलन को आसान भाषा में समझिए।

अक्टूबर 2026 में क्या हुआ
दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार द्वारा हस्ताक्षरित 11 अक्टूबर 2026 के स्थायी आदेश से जंतर मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थल की सूची से हटा (डी-नोटिफ़ाई कर) दिया गया। यह आदेश अप्रैल 2022 के एक आदेश को आंशिक रूप से बदलता है और केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) की एक समिति की सिफ़ारिशों पर आधारित है। इसकी जगह तीन स्थल तय किए गए: रामलीला ग्राउंड (पुरानी दिल्ली), CBD ग्राउंड (पूर्वी दिल्ली) और बुराड़ी ग्राउंड (उत्तरी दिल्ली); संशोधित SOP अलग से जारी होंगी।
यह फ़ैसला एक युवा समूह (कॉकरोच जनता पार्टी) और विपक्षी दलों के रोज़ाना प्रदर्शनों के बीच आया, जो मतदाता सूची संशोधन को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफ़ा माँग रहे थे। 10 अक्टूबर के जंतर मंतर प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी गई और इलाके में BNSS धारा 163 का आदेश लागू था। 9 अक्टूबर को CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट पीठ ने कहा था कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के लिए सुविधाओं वाली कोई और जगह तय करने का "समय आ गया है"। 15 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को नोटिस जारी कर पूछा कि डी-नोटिफ़िकेशन कोर्ट की टिप्पणियों पर आधारित था या स्वतंत्र विचार पर; सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि कोर्ट का आदेश इसका आधार नहीं था। मामला लंबित है।
पृष्ठभूमिजंतर मंतर: कैसे बना दिल्ली का प्रदर्शन स्थल
| वर्ष | क्या हुआ |
|---|---|
| 1990 का दशक | संसद के पास बोट क्लब के लॉन पर बड़ी रैलियाँ बंद हुईं; जंतर मंतर रोड नई दिल्ली का मुख्य प्रदर्शन स्थल बन गया। |
| अक्टूबर 2017 | राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने शोर, सफ़ाई और सार्वजनिक जगह के इस्तेमाल को लेकर जंतर मंतर रोड पर प्रदर्शनों पर रोक लगाई और प्रदर्शनकारियों को रामलीला मैदान भेजने को कहा। |
| 23 जुलाई 2018 | सुप्रीम कोर्ट, मज़दूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ: पूर्ण प्रतिबंध की अनुमति नहीं; दिल्ली पुलिस जंतर मंतर और बोट क्लब के नियंत्रित उपयोग के लिए दिशानिर्देश बनाए। |
| 28 अप्रैल 2022 | दिल्ली पुलिस का आदेश जिसमें जंतर मंतर को प्रदर्शन स्थल घोषित किया गया (अब आंशिक रूप से बदला गया)। |
| 9 अक्टूबर 2026 | सुप्रीम कोर्ट (CJI सूर्यकांत, न्यायमूर्ति बागची और मोहना): शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के लिए सुविधाओं वाली दूसरी जगह तय की जाए। |
| 11 अक्टूबर 2026 | स्थायी आदेश से जंतर मंतर डी-नोटिफ़ाई; रामलीला, CBD और बुराड़ी ग्राउंड तय। उसी दिन सुप्रीम कोर्ट की विशेष सुनवाई: विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के बिना कोई हिरासत नहीं। |
| 13 अक्टूबर 2026 | दिल्ली पुलिस ने दिल्ली हाई कोर्ट में कहा कि फ़ैसला सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद हुआ; जंतर मंतर पर बैरिकेड पार करने वाले प्रदर्शन नेता हिरासत में। |
| 15 अक्टूबर 2026 | डी-नोटिफ़िकेशन के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को नोटिस जारी किया। लंबित। |
मूल पाठप्रदर्शन का अधिकार: अनुच्छेद 19(1)(ख) और अनुच्छेद 19(3)
19. वाक्-स्वातंत्र्य आदि विषयक कुछ अधिकारों का संरक्षण।
(1) सभी नागरिकों को—
(ख) शांतिपूर्वक और निरायुध सम्मेलन का,
अधिकार होगा।
(3) उक्त खंड के उपखंड (ख) की कोई बात उक्त उपखंड द्वारा दिए गए अधिकार के प्रयोग पर भारत की प्रभुता और अखंडता या लोक व्यवस्था के हितों में युक्तियुक्त निर्बंधन जहाँ तक कोई विद्यमान विधि अधिरोपित करती है वहाँ तक उसके प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी या वैसे निर्बंधन अधिरोपित करने वाली कोई विधि बनाने से राज्य को निवारित नहीं करेगी।
हर नागरिक दूसरों के साथ मिलकर प्रदर्शन, जुलूस या सभा कर सकता है, बशर्ते वह शांतिपूर्ण और निहत्था हो। पर यह अधिकार असीमित नहीं: राज्य इस पर युक्तियुक्त निर्बंधन लगाने वाले कानून बना सकता है, और केवल दो कारणों से, भारत की प्रभुता और अखंडता या लोक व्यवस्था। "युक्तियुक्त" का मतलब है कि निर्बंधन न्यायसंगत, ज़रूरी और ज़रूरत से ज़्यादा न हो।
🏠 रोज़मर्रा की मिसाल
हाउसिंग सोसाइटी अपने निवासियों को कम्युनिटी हॉल में बैठक करने से रोक नहीं सकती। वह समय तय कर सकती है, लाउडस्पीकर सीमित कर सकती है और एंबुलेंस के लिए गेट खुला रखवा सकती है। नियंत्रित करना ठीक है; ख़त्म करना नहीं।
🇮🇳 असली भारतीय उदाहरण
किसान, छात्र और शिक्षक दशकों से संसद के सामने अपनी माँगें रखने के लिए जंतर मंतर का इस्तेमाल करते रहे हैं। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुलिस ऐसे प्रदर्शनों को नियंत्रित कर सकती है, पूरी तरह रोक नहीं सकती।
तुलनात्मक विभाजनअनुच्छेद 19(1)(ख) बनाम अनुच्छेद 19(3): स्वतंत्रता और लोक व्यवस्था का संतुलन
✊ अनुच्छेद 19(1)(ख): अधिकार
- शांतिपूर्वक और निरायुध सभा करने का अधिकार।
- प्रदर्शन, धरना, जुलूस, जनसभा और कैंडल मार्च इसमें शामिल।
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा: प्रदर्शन अभिव्यक्ति का एक रूप है (कामेश्वर प्रसाद बनाम बिहार राज्य, 1962)।
- राज्य सार्वजनिक सड़कों पर सभाओं पर पूर्ण रोक नहीं लगा सकता (हिम्मत लाल के. शाह, 1973)।
- प्रदर्शनकारियों की गरिमा और सुरक्षा भी अधिकार है; सोते हुए प्रदर्शनकारियों पर आधी रात की कार्रवाई अवैध मानी गई (रामलीला मैदान घटना, 2012)।
🚦 अनुच्छेद 19(3): सीमाएँ
- केवल दो आधार: भारत की प्रभुता और अखंडता या लोक व्यवस्था।
- निर्बंधन युक्तियुक्त हों: ज़रूरी, आनुपातिक और सबसे कम प्रतिबंधात्मक विकल्प।
- सार्वजनिक सड़कों पर अनिश्चितकाल तक कब्ज़ा नहीं; प्रदर्शन निर्धारित जगहों तक सीमित किए जा सकते हैं (अमित साहनी बनाम पुलिस आयुक्त, 2020, शाहीन बाग)।
- हिंसा, एंबुलेंस रोकने या संपत्ति नुकसान का कोई अधिकार नहीं।
- पुलिस समय, स्थान और तरीक़ा तय कर सकती है, पर नियंत्रण के नाम पर छिपा प्रतिबंध नहीं लगा सकती (मज़दूर किसान शक्ति संगठन, 2018)।
क्रिकेट मैच सोचिए। अनुच्छेद 19(1)(ख) बल्लेबाज़ का अपने शॉट खेलने का अधिकार है। अनुच्छेद 19(3) बाउंड्री की रस्सी और नियम हैं। अंपायर (राज्य) ख़तरनाक खेल रोक सकता है, पर बल्ला ही नहीं छीन सकता। और तीसरा अंपायर (अदालत) जाँचता है कि फ़ैसला सही था या नहीं।
🏠 रोज़मर्रा की मिसाल
स्कूल मैदान में छात्रों की सभा की अनुमति देता है, पर स्कूल बस के समय गेट के बाहर मुख्य सड़क पर नहीं। अधिकार वही, जगह और समय अलग।
🇮🇳 असली भारतीय उदाहरण
शाहीन बाग मामले (2020) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रदर्शन का स्वागत है पर सार्वजनिक सड़क अनिश्चितकाल तक बंद नहीं की जा सकती; प्रशासन को निर्धारित जगहों पर प्रदर्शन की अनुमति देते हुए सड़कें खुली रखनी होंगी।
धारा का पाठBNSS धारा 163 (पहले CrPC धारा 144): निषेधाज्ञा आदेश
धारा 163. उपद्रव या आशंकित ख़तरे के अर्जेंट मामलों में आदेश जारी करने की शक्ति।
(1) जहाँ ज़िला मजिस्ट्रेट, उपखंड मजिस्ट्रेट या राज्य सरकार द्वारा इस हेतु विशेष रूप से सशक्त किसी अन्य कार्यपालक मजिस्ट्रेट की राय में इस धारा के अधीन कार्यवाही के लिए पर्याप्त आधार है और तुरंत रोकथाम या शीघ्र उपचार वांछनीय है, वहाँ ऐसा मजिस्ट्रेट मामले के तात्त्विक तथ्यों का उल्लेख करने वाले और धारा 153 में दी गई रीति से तामील किए गए लिखित आदेश द्वारा किसी व्यक्ति को कोई विशेष कार्य न करने, या अपने कब्ज़े या प्रबंध की किसी संपत्ति के बारे में विशेष व्यवस्था करने का निर्देश दे सकता है, यदि वह समझता है कि ऐसा निर्देश विधिपूर्वक नियोजित किसी व्यक्ति को बाधा, क्षोभ या क्षति, या मानव जीवन, स्वास्थ्य या सुरक्षा को ख़तरा, या लोक प्रशांति में विघ्न, या बलवा, या दंगा रोकता है या रोकने की प्रवृत्ति रखता है।
(3) इस धारा के अधीन आदेश किसी विशिष्ट व्यक्ति को, या किसी विशेष स्थान या क्षेत्र में रहने वाले व्यक्तियों को, या किसी विशेष स्थान या क्षेत्र में आने-जाने वाली आम जनता को दिया जा सकता है।
(4) इस धारा के अधीन कोई आदेश उसके किए जाने से दो मास से अधिक प्रवृत्त नहीं रहेगा:
परंतु यदि राज्य सरकार मानव जीवन, स्वास्थ्य या सुरक्षा को ख़तरा रोकने या बलवा या दंगा रोकने के लिए ऐसा करना आवश्यक समझती है, तो वह अधिसूचना द्वारा निर्देश दे सकती है कि मजिस्ट्रेट का आदेश, उस तारीख़ से जब वह अन्यथा समाप्त हो जाता, छह मास से अनधिक ऐसी अतिरिक्त अवधि तक प्रवृत्त रहेगा जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट हो।
पुरानी CrPC धारा 144 अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 है, जो 1 जुलाई 2024 से लागू है। इससे ज़िला मजिस्ट्रेट, उपखंड मजिस्ट्रेट या विशेष रूप से सशक्त कार्यपालक मजिस्ट्रेट ख़तरा, दंगा या लोक शांति भंग होने से रोकने के लिए तुरंत लिखित आदेश दे सकते हैं, जैसे किसी इलाके में लोगों के इकट्ठा होने पर रोक। आदेश में तात्त्विक तथ्य लिखने होंगे, यह अधिकतम दो महीने चल सकता है, और राज्य सरकार इसे केवल जीवन को ख़तरा या दंगा रोकने के लिए छह महीने और बढ़ा सकती है।
ऐसे आदेश की अवहेलना भारतीय न्याय संहिता की धारा 223 (पुरानी IPC धारा 188) के तहत अपराध है। दिल्ली में पुलिस आयुक्त प्रणाली है, जहाँ वरिष्ठ पुलिस अधिकारी कार्यपालक मजिस्ट्रेट के रूप में काम करते हैं, इसलिए ये आदेश आमतौर पर पुलिस ही जारी करती है।
🏠 रोज़मर्रा की मिसाल
किसी इमारत में आग लगी हो तो फ़ायर अधिकारी अदालत का इंतज़ार किए बिना तुरंत सबको उस गली में जाने से रोक सकता है। पर आग बुझने के बाद वह गली को साल भर बंद नहीं रख सकता।
🇮🇳 असली भारतीय उदाहरण
अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ (2020) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 144 के आदेश कारण सहित, प्रकाशित, आनुपातिक और अदालती समीक्षा के अधीन होने चाहिए, और वैध अभिव्यक्ति को दबाने के लिए बार-बार इस्तेमाल नहीं किए जा सकते। यही कसौटियाँ अब BNSS धारा 163 पर लागू होती हैं।
आम ग़लती का सुधार: "BNSS धारा 144" वाला कोई निषेधाज्ञा आदेश नहीं होता। नई संहिता में BNSS धारा 144 पत्नी, बच्चों और माता-पिता के भरण-पोषण से जुड़ी है (पुरानी CrPC धारा 125)। निषेधाज्ञा की शक्ति BNSS धारा 163 में है।
क़ानूनी शक्तियाँदिल्ली पुलिस अधिनियम, 1978: दिल्ली में प्रदर्शन की जगह कौन तय करता है
BNSS के अलावा दिल्ली पुलिस को दिल्ली पुलिस अधिनियम, 1978 के अध्याय IV से शक्तियाँ मिलती हैं:
- धारा 28: यातायात नियंत्रित करने और सार्वजनिक स्थानों पर व्यवस्था बनाए रखने के लिए विनियम बनाने की शक्ति, जिसमें सभाएँ और जुलूस शामिल हैं।
- धारा 29: जनता को निर्देश देने की शक्ति।
- धारा 30: अव्यवस्था रोकने के लिए कुछ कार्यों पर रोक लगाने की शक्ति।
- धारा 31: सार्वजनिक मनोरंजन, सभा या बैठक के स्थानों पर अव्यवस्था रोकने का पुलिस का दायित्व।
- धारा 32: संगीत, ध्वनि या शोर रोकने की शक्ति, इसीलिए लाउडस्पीकर के लिए अनुमति लेनी होती है।
किसी प्रदर्शन स्थल को घोषित करना या हटाना इन्हीं शक्तियों के तहत स्थायी आदेशों और SOP से लिया गया कार्यपालिका का फ़ैसला है। दिल्ली में "पुलिस" और "लोक व्यवस्था" केंद्र उपराज्यपाल और गृह मंत्रालय के ज़रिए संभालता है, इसलिए MHA समिति की भूमिका अहम रही। मूल अधिकार को प्रभावित करने वाली हर कार्यपालिका कार्रवाई की तरह यह फ़ैसला भी युक्तियुक्तता और आनुपातिकता की कसौटी पर न्यायिक समीक्षा के अधीन है, और सुप्रीम कोर्ट अभी यही जाँच रहा है।
अदालत कैसे तय करती हैक्या जंतर मंतर प्रतिबंध वैध है? आनुपातिकता की कसौटी
अदालतें ऐसे निर्बंधनों को चार चरणों वाली आनुपातिकता कसौटी पर परखती हैं, जो अनुराधा भसीन (2020) और उससे पहले मॉडर्न डेंटल कॉलेज (2016) में अपनाई गई:
- 1वैध उद्देश्य
क्या निर्बंधन लोक व्यवस्था या प्रभुता-अखंडता के लिए है, जो अनुच्छेद 19(3) के एकमात्र आधार हैं?
- 2उपयुक्त साधन
क्या प्रदर्शनों को जंतर मंतर से हटाना वास्तव में उस उद्देश्य को पाने में मदद करता है?
- 3आवश्यकता
क्या कोई कम प्रतिबंधात्मक विकल्प है, जैसे जंतर मंतर पर ही संख्या, समय या शोर को नियंत्रित करना?
- 4संतुलन
क्या नए स्थल (दूरी, सुविधाएँ, लागत, संसद से निकटता) अब भी सार्थक प्रदर्शन की अनुमति देते हैं?
क़ानूनी सवाल यह नहीं कि प्रदर्शन नियंत्रित किए जा सकते हैं या नहीं (किए जा सकते हैं), बल्कि यह कि सबसे सुलभ जगह हटाना और सत्ता के केंद्र से दूर जगहें देना युक्तियुक्त नियंत्रण है या छिपा प्रतिबंध। सुप्रीम कोर्ट के जवाब का इंतज़ार है। तब तक डी-नोटिफ़िकेशन लागू है और निर्धारित स्थलों पर प्रदर्शन के लिए पुलिस अनुमति चाहिए।
🏠 रोज़मर्रा की मिसाल
अगर बाज़ार समिति साप्ताहिक हाट को शहर के बीच से शहर के बाहर के मैदान में भेज दे, तो दुकानदार बेच तो सकते हैं, पर ग्राहक बहुत कम आते हैं। यह उचित है या नहीं, यह इस पर निर्भर है कि ऐसा क्यों किया गया और नए मैदान में क्या सुविधाएँ हैं।
🇮🇳 असली भारतीय उदाहरण
आलोचकों ने कोर्ट को बताया कि रामलीला मैदान की बुकिंग में शुल्क लगता है, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने ख़ुद 9 अक्टूबर को किसी भी प्रदर्शन स्थल के लिए शौचालय, पीने का पानी, चिकित्सा सहायता और आपात पहुँच को न्यूनतम सुविधाएँ बताया।
UPSC कॉर्नरUPSC प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा के लिए प्रदर्शन का अधिकार
- प्रारंभिक तथ्य: अनुच्छेद 19(3) में सभा के अधिकार पर निर्बंधन के केवल दो आधार हैं: भारत की प्रभुता और अखंडता (16वाँ संशोधन, 1963 से जुड़ा) और लोक व्यवस्था।
- प्रारंभिक तथ्य: BNSS धारा 163 का आदेश: अधिकतम 2 महीने; राज्य द्वारा 6 महीने और बढ़ाया जा सकता है।
- प्रारंभिक तथ्य: अनुच्छेद 19 का अधिकार केवल नागरिकों को है, विदेशियों को नहीं।
- मुख्य परीक्षा (250 शब्द): "प्रदर्शन का अधिकार लोकतंत्र का अभिन्न अंग है, पर इसे किसी भी जगह और किसी भी समय इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।" शाहीन बाग (2020), मज़दूर किसान शक्ति संगठन (2018) और जंतर मंतर डी-नोटिफ़िकेशन (2026) के संदर्भ में परीक्षण कीजिए।
- निबंध कोण: सार्वजनिक स्थान लोकतंत्र की साझा संपत्ति: सड़क किसकी है?
अभ्यास MCQख़ुद को परखें: जंतर मंतर विरोध प्रदर्शन प्रतिबंध
भारत में प्रदर्शन के अधिकार के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: (1) अनुच्छेद 19(3) सभा के अधिकार पर केवल भारत की प्रभुता और अखंडता या लोक व्यवस्था के हित में युक्तियुक्त निर्बंधन की अनुमति देता है। (2) BNSS की धारा 163 के तहत मजिस्ट्रेट का आदेश दो महीने से अधिक लागू नहीं रह सकता, जब तक राज्य सरकार अधिसूचना से उसे न बढ़ाए। (3) मज़दूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ (2018) में सुप्रीम कोर्ट ने मध्य दिल्ली में प्रदर्शनों पर पूर्ण प्रतिबंध को सही ठहराया। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
शंका समाधानअक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
जंतर मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से क्यों हटाया गया?
11 अक्टूबर 2026 के दिल्ली पुलिस के स्थायी आदेश से गृह मंत्रालय की समिति की सिफ़ारिशों पर जंतर मंतर को डी-नोटिफ़ाई किया गया और रामलीला ग्राउंड, CBD ग्राउंड और बुराड़ी ग्राउंड तय किए गए। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से फ़ैसले का आधार बताने को कहा है; मामला लंबित है।
क्या भारत में प्रदर्शन मूल अधिकार है?
हाँ। अनुच्छेद 19(1)(क) और 19(1)(ख) शांतिपूर्वक और निहत्थे प्रदर्शन के अधिकार की रक्षा करते हैं। अनुच्छेद 19(3) के तहत राज्य भारत की प्रभुता और अखंडता या लोक व्यवस्था के हित में युक्तियुक्त निर्बंधन लगा सकता है।
BNSS धारा 163 क्या है?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 163 ने CrPC धारा 144 की जगह ली है। इससे ज़िला मजिस्ट्रेट, उपखंड मजिस्ट्रेट या विशेष रूप से सशक्त कार्यपालक मजिस्ट्रेट ख़तरा या अशांति रोकने के लिए तुरंत निषेधाज्ञा जारी कर सकते हैं, जो दो महीने तक वैध रहती है और राज्य इसे छह महीने बढ़ा सकता है।
क्या पुलिस दिल्ली में सभी प्रदर्शनों पर रोक लगा सकती है?
नहीं। मज़दूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ (2018) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पूर्ण प्रतिबंध अनुमत नहीं है; प्रदर्शनों को समय, स्थान और तरीक़े से नियंत्रित किया जा सकता है, पूरी तरह रोका नहीं जा सकता।
अब दिल्ली में लोग कहाँ प्रदर्शन कर सकते हैं?
11 अक्टूबर 2026 के आदेश के बाद निर्धारित स्थल रामलीला ग्राउंड, CBD ग्राउंड और बुराड़ी ग्राउंड हैं, जो पुलिस अनुमति और अलग से जारी होने वाली SOP के अधीन हैं।
स्रोत और आगे की पढ़ाईहमने जिन स्रोतों की जाँच की
इस पेज के समाचार तथ्य 15 अक्टूबर 2026 को नीचे दी गई रिपोर्टों से जाँचे गए। अदालती मामले लंबित हैं और बदल सकते हैं।
- Outlook, 12 Oct 2026: Jantar Mantar de-notified as protest site: who decides where people can protest?
- The Quint, 12 Oct 2026: Jantar Mantar de-notified after MHA committee recommendations
- LiveLaw, 11 Oct 2026: Supreme Court directs no illegal detention of peaceful protesters
- Bar & Bench, 15 Oct 2026: Was our order relied upon to de-notify Jantar Mantar? Supreme Court seeks Centre's response
- Al Jazeera, 13 Oct 2026: Police detain protest leaders at Jantar Mantar
- India Code: The Delhi Police Act, 1978