भाग III ⚖️ मूल अधिकार लागू · कभी संशोधित नहीं · आपातकाल में भी निलंबित नहीं

अनुच्छेद 21: प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण

अनुच्छेद 21 केवल एक वाक्य है, फिर भी यह सबसे बड़ा मूल अधिकार बन गया है। 1950 में यह इतना ही वादा था कि राज्य क़ानून के बिना जीवन या स्वतंत्रता नहीं छीनेगा। 1978 से सुप्रीम कोर्ट ने इसमें गरिमा से जीने का अधिकार पढ़ा: आजीविका, साफ़ हवा, निजता, शीघ्र सुनवाई, शिक्षा और गरिमा से मृत्यु भी।

मूल पाठअनुच्छेद 21 का आधिकारिक पाठ

हिन्दी · आधिकारिक पाठ

21. प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण—

किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं।

कभी संशोधित नहीं। 44वें संशोधन, 1978 ने अनुच्छेद 359 बदला, ताकि राष्ट्रीय आपातकाल में अनुच्छेद 20 और 21 निलंबित न हों। इससे ADM जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला (1976) का असर ख़त्म हुआ, जिसमें अदालत ने कहा था कि आपातकाल में कोई दैहिक स्वतंत्रता के लिए अदालत नहीं जा सकता। पुट्टस्वामी (2017) ने ADM जबलपुर को औपचारिक रूप से पलट दिया।
In Simple Words / आसान शब्दों में

राज्य किसी के प्राण या दैहिक स्वतंत्रता तभी छीन सकता है जब कोई वैध क़ानून ऐसा करने दे और सही प्रक्रिया अपनाई जाए।

मेनका गांधी (1978) के बाद वह क़ानून और प्रक्रिया न्यायसंगत, उचित और युक्तियुक्त भी होनी चाहिए, मनमानी नहीं।

"जीवन" का अर्थ केवल साँस लेना नहीं। इसका अर्थ है गरिमा के साथ जीवन: भोजन, आश्रय, स्वास्थ्य, स्वच्छ पर्यावरण, आजीविका, निजता और शिक्षा।

यह हर व्यक्ति की रक्षा करता है, नागरिक हो या विदेशी, और आपातकाल में भी निलंबित नहीं हो सकता।

🏠 रोज़मर्रा की मिसाल

अनुच्छेद 21 घर की नींव जैसा है। 1950 में लोगों को केवल एक ख़ाली चबूतरा दिखता था: "क़ानून के बिना आपको मारा या जेल में नहीं डाला जाएगा"। सालों में सुप्रीम कोर्ट ने उस पर कमरे बनाए: रसोई (भोजन), शयनकक्ष (नींद, निजता), खिड़कियाँ (साफ़ हवा), पढ़ाई का कमरा (शिक्षा)। नींव वही है; घर बड़ा हो गया है।

🇮🇳 असली भारतीय उदाहरण

1977 में मेनका गांधी का पासपोर्ट "जनहित में" ज़ब्त किया गया, बिना कारण बताए और बिना सुनवाई के। सुप्रीम कोर्ट ने 1978 में कहा कि विदेश जाना दैहिक स्वतंत्रता का हिस्सा है, और बिना निष्पक्ष सुनवाई इसे छीनने वाली प्रक्रिया वैध नहीं। आज पासपोर्ट दफ़्तर पासपोर्ट देने से मना करे, तो उसे कारण बताने होंगे, और व्यक्ति आदेश को चुनौती दे सकता है।

जीवन बनाम स्वतंत्रताअनुच्छेद 21: जीवन का अधिकार बनाम दैहिक स्वतंत्रता

बिंदुप्राण (जीवन)दैहिक स्वतंत्रता
क्या शामिलज़िंदा रहने के लिए ज़रूरी चीज़ें: सबसे बुनियादी प्राकृतिक अधिकारगरिमापूर्ण जीवन के लिए ज़रूरी चीज़ें: शरीर, आवाजाही और फ़ैसलों की आज़ादी
प्राथमिकतापहले: जीवन नहीं तो स्वतंत्रता नहींयह भी प्राकृतिक अधिकार, पर क्रम में दूसरा
कितना विस्तारकम विस्तार; विशेष स्थिति में गरिमा से मृत्यु (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) शामिलसुप्रीम कोर्ट ने सबसे अधिक विस्तार किया
उद्देश्यअस्तित्व और शरीर की सुरक्षाव्यक्ति की पहल और विकास को न रोकना

दोनों जुड़े हुए हैं

  • जीवन के बिना स्वतंत्रता नहीं, और स्वतंत्रता के बिना जीवन गरिमापूर्ण नहीं। अदालतें दोनों को साथ पढ़ती हैं।
  • अनुच्छेद 21 हर व्यक्ति को मिलता है: नागरिक और विदेशी दोनों को। यह राज्य को नकारात्मक आदेश है ("वंचित नहीं करेगा"), पर अदालतों ने इससे सकारात्मक कर्तव्य भी निकाले हैं, जैसे क़ानूनी सहायता और आपात चिकित्सा देना।
  • यह राज्य के विरुद्ध लागू होता है। कुछ हिस्से, जैसे बंधुआ मज़दूरी से मुक्ति या स्वच्छ पर्यावरण, क़ानूनों और अदालती आदेशों से निजी व्यक्तियों पर भी लागू होते हैं।

गोपालन से मेनकाअनुच्छेद 21 का विस्तार: ए.के. गोपालन से मेनका गांधी तक

  • ए.के. गोपालन बनाम मद्रास राज्य (1950), संकीर्ण दृष्टि: एक कम्युनिस्ट नेता ने अपने निवारक निरोध को चुनौती दी। अदालत ने हर मूल अधिकार को अलग डिब्बे की तरह पढ़ा। "जीवन" का अर्थ केवल शारीरिक अस्तित्व, और "विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया" का अर्थ विधायिका के बनाए क़ानून की कोई भी प्रक्रिया, चाहे कितनी भी अनुचित हो।
  • खड़क सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1962): रात में पुलिस का घर आना दैहिक स्वतंत्रता का उल्लंघन मानकर रद्द किया गया; अल्पमत राय ने निजता की बात की।
  • मेनका गांधी बनाम भारत संघ (25 जनवरी 1978, 7 न्यायाधीश), व्यापक दृष्टि: अनुच्छेद 14, 19 और 21 एक "स्वर्णिम त्रिभुज" हैं और साथ पढ़े जाएँगे। प्रक्रिया न्यायसंगत, उचित और युक्तियुक्त होनी चाहिए। जीवन का अर्थ गरिमा के साथ जीवन है, और दैहिक स्वतंत्रता में विदेश जाने का अधिकार शामिल है (जिसे सतवंत सिंह साहनी, 1967 में पहले ही माना गया था)।

मेनका के बाद: नए अधिकारों की बाढ़

  • आपके नोट्स स्वच्छ पानी, भोजन और आवाजाही को मेनका से जोड़ते हैं। सही बात यह है कि ये मेनका पर आधारित बाद के मुकदमों से आए: गरिमा पर फ्रांसिस कोरली मुलिन (1981), प्रदूषण-मुक्त पानी और हवा पर सुभाष कुमार (1991), और 2001 से भोजन के अधिकार पर PUCL के आदेश।
  • हुसैनारा ख़ातून (1979) केवल मनमाने निरोध के बारे में नहीं था: इसने शीघ्र सुनवाई को अनुच्छेद 21 का हिस्सा बनाया, बिहार में हज़ारों विचाराधीन क़ैदियों की रिहाई करवाई, और मुफ़्त क़ानूनी सहायता (अनुच्छेद 39क) पर ज़ोर दिया।
  • मोहिनी जैन (1992) और उन्नीकृष्णन (1993) ने शिक्षा का अधिकार माना; इसी से 86वाँ संशोधन 2002 और अनुच्छेद 21क (6 से 14 वर्ष के लिए मुफ़्त शिक्षा) आए।
  • के.एस. पुट्टस्वामी: निजता का फ़ैसला 24 अगस्त 2017 को आया (9 न्यायाधीश, सर्वसम्मत); अलग आधार फ़ैसला 26 सितंबर 2018 को आया (5 न्यायाधीश, 4:1)।
अनुच्छेद 21 में पढ़ा गया अधिकारमुख्य केस
मानवीय गरिमा के साथ जीवनफ्रांसिस कोरली मुलिन बनाम प्रशासक, दिल्ली (1981)
आजीविकाओल्गा टेलिस बनाम बंबई नगर निगम (1985): फुटपाथ पर रहने वाले
शीघ्र सुनवाई, मुफ़्त क़ानूनी सहायताहुसैनारा ख़ातून बनाम बिहार राज्य (1979); एम.एच. होसकोट (1978)
स्वच्छ पर्यावरण, पानी और हवाएम.सी. मेहता मामले; सुभाष कुमार बनाम बिहार राज्य (1991)
आपात चिकित्सा और स्वास्थ्यपरमानंद कटारा (1989); पश्चिम बंगा खेत मज़दूर समिति (1996)
भोजनPUCL बनाम भारत संघ (2001 से आदेश; मिड-डे मील और खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 तक)
आश्रयचमेली सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1996)
विदेश यात्रासतवंत सिंह साहनी (1967); मेनका गांधी (1978)
हिरासत में यातना के विरुद्धडी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1997)
शिक्षा (14 वर्ष तक)मोहिनी जैन (1992); उन्नीकृष्णन (1993): इन्हीं से अनुच्छेद 21क बना
नींदरामलीला मैदान घटना (2012): सोते प्रदर्शनकारियों पर आधी रात पुलिस कार्रवाई
निजताके.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (24 अगस्त 2017, 9 न्यायाधीश)
अपनी पसंद से विवाहशफ़ीन जहाँ (2018); शक्ति वाहिनी बनाम भारत संघ (2018)
गरिमा से मृत्युकॉमन कॉज़ बनाम भारत संघ (9 मार्च 2018, 5 न्यायाधीश)
जलवायु परिवर्तन के बुरे असर से सुरक्षाएम.के. रणजीतसिंह बनाम भारत संघ (2024), अनुच्छेद 14 के साथ

इंटरनेट और शिक्षा

  • अदालतों ने इंटरनेट पहुँच को शिक्षा और अभिव्यक्ति से जोड़ा है: केरल हाई कोर्ट ने फ़हीमा शिरीन (2019) में, और सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 19 के तहत अनुराधा भसीन (2020) में। स्कूली बच्चों की पहुँच के सवाल उठते रहते हैं; नीचे दिया गया हमारा लेख देखें।
अनुच्छेद 21 का विस्तार: ए.के. गोपालन 1950 संकीर्ण दृष्टि, मेनका गांधी 1978 न्यायसंगत प्रक्रिया, हुसैनारा 1979 शीघ्र सुनवाई, फ्रांसिस कोरली 1981 गरिमा, ओल्गा टेलिस 1985 आजीविका, सुभाष कुमार 1991 स्वच्छ पर्यावरण, उन्नीकृष्णन 1993 शिक्षा, रामलीला मैदान 2012 नींद, पुट्टस्वामी 2017 निजता, कॉमन कॉज़ 2018 गरिमा से मृत्यु
सुप्रीम कोर्ट ने "प्राण और दैहिक स्वतंत्रता" को मुकदमे दर मुकदमे कैसे बढ़ाया।

सम्यक प्रक्रियाअनुच्छेद 21: विधि की सम्यक प्रक्रिया बनाम विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया

बिंदुविधि की सम्यक प्रक्रियाविधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया
कहाँ सेअमेरिका (5वाँ और 14वाँ संशोधन)ब्रिटेन की संसदीय संप्रभुता का विचार; शब्द जापान के संविधान के अनुच्छेद 31 से
अदालत क्या जाँचती हैप्रक्रिया का पालन और यह भी कि क़ानून ख़ुद न्यायसंगत है या नहींकेवल यह कि वैध क़ानून है और उसकी प्रक्रिया का पालन हुआ
कौन मज़बूतन्यायपालिकाविधायिका
न्यायाधीशों का विवेकव्यापकसीमित
कमज़ोरीअदालतें नीति पर "तीसरे सदन" की तरह फ़ैसले करने लगेंठीक से पास हुआ अन्यायपूर्ण क़ानून भी जीवन या स्वतंत्रता छीन सकता है

भारत ने "विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया" क्यों चुनी

  • मसौदे में पहले "विधि की सम्यक प्रक्रिया" थी। संविधान सभा ने इसे बदलकर "विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया" किया, जो जापान के संविधान (1946) के अनुच्छेद 31 के शब्द हैं, ताकि अमेरिका की तरह अदालतें सामाजिक और भूमि सुधार क़ानूनों को रद्द न करें। बी.एन. राव ने इस पर अमेरिकी न्यायाधीश फ़ेलिक्स फ़्रैंकफ़र्टर से चर्चा की थी।
  • ब्रिटेन में संसदीय संप्रभुता है: अदालतें संसद का अधिनियम रद्द नहीं कर सकतीं। भारत में लिखित संविधान से सीमित संसदीय सर्वोच्चता और न्यायिक पुनर्विलोकन (अनुच्छेद 13, 32 और 226) है, इसलिए भारतीय मॉडल कभी पूरी तरह ब्रिटिश नहीं था।

मेनका गांधी के बाद क्या बदला

  • 1978 से प्रक्रिया न्यायसंगत, उचित और युक्तियुक्त होनी चाहिए, और क़ानून को अनुच्छेद 14 और 19 की कसौटी भी पार करनी होगी। व्यवहार में भारतीय अदालतें मूल शब्द रखते हुए सम्यक प्रक्रिया जैसी जाँच करती हैं।
  • उदाहरण: मिठू बनाम पंजाब राज्य (1983) में अदालत ने IPC की धारा 303 की अनिवार्य मृत्युदंड व्यवस्था रद्द की, क्योंकि जो क़ानून न्यायाधीश को कोई विकल्प न दे, वह अनुचित है।
  • परीक्षा उत्तरों में अक्सर लिखे जाने वाले बिंदु: इससे नागरिकों को मज़बूत सुरक्षा मिलती है; आलोचक कहते हैं कि इससे न्यायाधीशों को बहुत गुंजाइश मिलती है। दोनों विचार न्यायिक सक्रियता की बहस का हिस्सा हैं।
विधि की सम्यक प्रक्रिया बनाम विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया: अमेरिका में अदालत क़ानून के न्यायसंगत होने की भी जाँच करती है, भारत ने जापान के संविधान से शब्द लिए जिसमें अदालत केवल प्रक्रिया देखती है; मेनका गांधी 1978 के बाद प्रक्रिया न्यायसंगत, उचित और युक्तियुक्त होनी चाहिए
अमेरिकी और भारतीय मॉडल आमने-सामने, और मेनका गांधी केस से क्या बदला।

इच्छामृत्युअनुच्छेद 21 और इच्छामृत्यु: गरिमा से मृत्यु का अधिकार

  • इच्छामृत्यु (euthanasia) ग्रीक शब्दों eu (अच्छी) और thanatos (मृत्यु) से बना है: "अच्छी मृत्यु"। इसका अर्थ है लाइलाज बीमारी से जूझ रहे व्यक्ति का कष्ट ख़त्म करने के लिए उसका जीवन समाप्त करना।

इच्छामृत्यु के प्रकार

आधारप्रकारअर्थ
सहमतिस्वैच्छिकसक्षम मरीज़ ख़ुद माँगे
सहमतिअस्वैच्छिकमरीज़ सहमति देने की हालत में नहीं, जैसे कोमा; परिवार या डॉक्टर तय करते हैं
सहमतिअनैच्छिकसहमति दे सकने वाले मरीज़ की इच्छा के विरुद्ध या बिना पूछे; लगभग हर जगह हत्या माना जाता है
तरीक़ासक्रियकोई क़दम उठाकर जीवन ख़त्म करना, जैसे घातक इंजेक्शन। नीदरलैंड, बेल्जियम और कनाडा जैसी जगहों पर वैध; अमेरिका के कई राज्य डॉक्टर की मदद से मृत्यु की अनुमति देते हैं। भारत में वैध नहीं।
तरीक़ानिष्क्रियजीवन रक्षक सहायता हटाना या न देना, जैसे वेंटिलेटर बंद करना या फ़ीडिंग ट्यूब रोकना। भारत में कड़ी शर्तों के साथ मान्य।

भारत में क़ानून कैसे बना

  • ज्ञान कौर बनाम पंजाब राज्य (1996, 5 न्यायाधीश): अनुच्छेद 21 में आत्महत्या का अधिकार नहीं है; इसने पी. रतिनम (1994) को पलटा। पर अदालत ने कहा कि मरने की प्रक्रिया में गरिमा अलग बात है।
  • अरुणा शानबाग बनाम भारत संघ (7 मार्च 2011): मुंबई की नर्स अरुणा 1973 से निष्चेष्ट अवस्था में थीं। अदालत ने उनके लिए इच्छामृत्यु नहीं दी, पर सामान्य रूप से हाई कोर्ट की मंज़ूरी से निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी।
  • कॉमन कॉज़ बनाम भारत संघ (9 मार्च 2018, 5 न्यायाधीश): गरिमा से मृत्यु का अधिकार अनुच्छेद 21 का हिस्सा है। निष्क्रिय इच्छामृत्यु और लिविंग विल (अग्रिम चिकित्सा निर्देश) को मान्यता मिली, और मेडिकल बोर्ड फ़ैसला करेंगे।
  • 24 जनवरी 2023: अदालत ने दिशानिर्देश सरल किए: लिविंग विल दो गवाहों के साथ नोटरी या राजपत्रित अधिकारी के सामने बन सकती है (मजिस्ट्रेट के प्रतिहस्ताक्षर की ज़रूरत नहीं); अस्पताल का प्राथमिक बोर्ड और द्वितीयक बोर्ड 48 घंटे में फ़ैसला करें; विशेषज्ञों का अनुभव 20 की जगह 5 वर्ष।
  • सितंबर 2024: केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने गंभीर रूप से बीमार मरीज़ों से जीवन रक्षक सहायता हटाने पर मसौदा दिशानिर्देश जनता की राय के लिए जारी किए।
  • अदालत ने संसद से क़ानून बनाने को कहा। इच्छामृत्यु पर अब भी संसद का कोई अधिनियम नहीं; अदालत के दिशानिर्देश ही लागू हैं।
इच्छामृत्यु के प्रकार: सहमति के आधार पर स्वैच्छिक, अस्वैच्छिक, अनैच्छिक; तरीक़े के आधार पर सक्रिय (भारत में अवैध) और निष्क्रिय (भारत में शर्तों के साथ वैध); ज्ञान कौर 1996, अरुणा शानबाग 2011, कॉमन कॉज़ 2018, 2023 के सरल दिशानिर्देश
सहमति और तरीक़े के आधार पर इच्छामृत्यु, और भारत के चार पड़ाव।

चुनौतियाँअनुच्छेद 21 के तहत इच्छामृत्यु: चुनौतियाँ और आगे की राह

  • निष्क्रिय इच्छामृत्यु और लिविंग विल के पक्ष में तर्क: मरीज़ की अपनी पसंद (स्वायत्तता) का सम्मान, लंबे कष्ट का अंत, परिवार की बचत ख़त्म करने वाले बेकार इलाज से बचना, और जीवन के अंत में गरिमा।
  • सावधानी के पक्ष में तर्क: अधिकतर धर्मों और चिकित्सा नैतिकता में जीवन मूल्यवान है; उपशामक देखभाल (palliative care) से कष्ट कम हो सकता है; कमज़ोर व्यक्ति ख़ुद को बोझ समझ सकता है; और फ़ैसला पलटा नहीं जा सकता।

आपके नोट्स में बताई गई चुनौतियाँ

  • ग़रीबी और भूख आर्थिक कारणों से परिवार या मरीज़ को इस ओर धकेल सकती है।
  • दुरुपयोग का ख़तरा, जैसे किसी अपराध को छिपाने या संपत्ति के लिए।
  • कम साक्षरता और जागरूकता के कारण ज़्यादातर लोगों के लिए लिविंग विल लिखना कठिन है।
  • जीवन रक्षक सहायता कब और कैसे हटाई जाए, यह हमेशा साफ़ नहीं।
  • सहमति सच में स्वैच्छिक है, यह कैसे जाँचा जाए, इसका विस्तार नहीं।
  • यह धर्म, परिवार और चिकित्सा नैतिकता से जुड़ा संवेदनशील विषय है।

आगे की राह (परीक्षा दृष्टि)

  • अदालत के सुझाव के अनुसार संसद का स्पष्ट क़ानून, दुरुपयोग रोकने के उपायों के साथ।
  • बेहतर उपशामक देखभाल, ताकि दर्द से राहत न मिलने के कारण कोई मृत्यु न चुने।
  • स्थानीय भाषा में सरल लिविंग विल फ़ॉर्म, अस्पतालों में रिकॉर्ड व्यवस्था, और डॉक्टरों व मेडिकल बोर्डों का प्रशिक्षण।
  • जन जागरूकता, और बहस में सभी विचारों का सम्मान।

त्वरित दोहराईयाद रखने योग्य मुख्य बातें

  • किसी व्यक्ति को विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से वंचित किया जा सकता है।
  • गोपालन (1950) ने संकीर्ण अर्थ लिया; मेनका गांधी (1978) ने प्रक्रिया को "न्यायसंगत, उचित और युक्तियुक्त" बनाया।
  • जीवन का अर्थ गरिमापूर्ण जीवन: आजीविका, स्वास्थ्य, पर्यावरण, निजता, शीघ्र सुनवाई, शिक्षा और बहुत कुछ।
  • कॉमन कॉज़ (2018): गरिमा से मृत्यु का अधिकार; निष्क्रिय इच्छामृत्यु और लिविंग विल मान्य; सक्रिय इच्छामृत्यु नहीं।
  • हर व्यक्ति को संरक्षण; आपातकाल में निलंबित नहीं (44वाँ संशोधन 1978)।

समयरेखाअनुच्छेद 21: मुख्य मुकदमे और तिथियाँ

वर्षघटना
1950ए.के. गोपालन: जीवन और प्रक्रिया की संकीर्ण व्याख्या।
1976ADM जबलपुर: आपातकाल में बंदी प्रत्यक्षीकरण नहीं (बाद में पलटा)।
1978मेनका गांधी (25 जनवरी): न्यायसंगत प्रक्रिया; 44वें संशोधन से आपातकाल में अनुच्छेद 21 सुरक्षित।
1979हुसैनारा ख़ातून: शीघ्र सुनवाई और क़ानूनी सहायता।
1985ओल्गा टेलिस: आजीविका का अधिकार।
1996ज्ञान कौर: आत्महत्या का अधिकार नहीं।
2011अरुणा शानबाग (7 मार्च): हाई कोर्ट की मंज़ूरी से निष्क्रिय इच्छामृत्यु।
2017पुट्टस्वामी (24 अगस्त): निजता मूल अधिकार।
2018कॉमन कॉज़ (9 मार्च): गरिमा से मृत्यु, लिविंग विल; आधार फ़ैसला (26 सितंबर)।
2023लिविंग विल दिशानिर्देश सरल (24 जनवरी)।
2024जलवायु परिवर्तन केस (रणजीतसिंह); जीवन रक्षक सहायता पर स्वास्थ्य मंत्रालय के मसौदा दिशानिर्देश (सितंबर)।

UPSC · राज्य PSC · न्यायपालिकाअनुच्छेद 21: UPSC परीक्षा कॉर्नर

  • प्रीलिम्स जाल: "भारत अनुच्छेद 21 में विधि की सम्यक प्रक्रिया अपनाता है।" मूल शब्द "विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया" हैं; मेनका गांधी के बाद अदालतें सम्यक प्रक्रिया जैसी निष्पक्षता की जाँच करती हैं।
  • प्रीलिम्स जाल: "अनुच्छेद 21 में आत्महत्या का अधिकार शामिल है।" ग़लत (ज्ञान कौर, 1996)। गरिमा से मृत्यु का अधिकार (कॉमन कॉज़, 2018) अलग है।
  • प्रीलिम्स तथ्य: "विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया" वाक्यांश जापान के संविधान से लिया गया है।
  • मेन्स (गौरव के नोट्स से): जीवन के अधिकार और दैहिक स्वतंत्रता में अंतर बताइए और न्यायपालिका ने इनका विस्तार कैसे किया, समझाइए।
  • अभ्यास (250 शब्द): भारत में इच्छामृत्यु की क़ानूनी स्थिति और लिविंग विल लागू करने की चुनौतियों की जाँच कीजिए।

अभ्यास प्रश्नख़ुद को परखें: अनुच्छेद 21

अनुच्छेद 21 के बारे में इन कथनों पर विचार करें: 1. "विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया" वाक्यांश जापान के संविधान से लिया गया। 2. मेनका गांधी (1978) में अदालत ने कहा कि प्रक्रिया न्यायसंगत, उचित और युक्तियुक्त हो। 3. कॉमन कॉज़ फ़ैसले के तहत भारत में सक्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति है। कौन-से सही हैं?

शंका समाधानअक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 क्या है?

अनुच्छेद 21 कहता है कि किसी व्यक्ति को विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से वंचित किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने इसे गरिमा के साथ जीने का अधिकार माना है।

विधि की सम्यक प्रक्रिया और विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया में क्या अंतर है?

सम्यक प्रक्रिया (अमेरिका) में अदालत प्रक्रिया और क़ानून के न्यायसंगत होने, दोनों की जाँच करती है। विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया (भारत के शब्द, जापान से) में अदालत देखती है कि वैध क़ानून और उसकी प्रक्रिया का पालन हुआ। मेनका गांधी (1978) के बाद भारतीय अदालतें प्रक्रिया का न्यायसंगत, उचित और युक्तियुक्त होना भी ज़रूरी मानती हैं।

क्या भारत में इच्छामृत्यु वैध है?

कॉमन कॉज़ बनाम भारत संघ (2018) के तहत निष्क्रिय इच्छामृत्यु (जीवन रक्षक सहायता हटाना) और लिविंग विल वैध हैं, और 24 जनवरी 2023 से दिशानिर्देश सरल हैं। घातक इंजेक्शन जैसी सक्रिय इच्छामृत्यु वैध नहीं।

क्या निजता का अधिकार मूल अधिकार है?

हाँ। के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (24 अगस्त 2017) में नौ न्यायाधीशों की पीठ ने सर्वसम्मति से कहा कि निजता मूल अधिकार है, मुख्य रूप से अनुच्छेद 21 में और पूरे भाग III में।

क्या अनुच्छेद 21 विदेशियों को भी मिलता है?

हाँ। इसमें "व्यक्ति" शब्द है, इसलिए यह नागरिकों और विदेशियों दोनों की रक्षा करता है।