मूल पाठअनुच्छेद 19 का आधिकारिक पाठ
19. वाक्-स्वातंत्र्य आदि विषयक कुछ अधिकारों का संरक्षण—
(1) सभी नागरिकों को—
(क) वाक्-स्वातंत्र्य और अभिव्यक्ति-स्वातंत्र्य का,
(ख) शांतिपूर्वक और निरायुध सम्मेलन का,
(ग) संगम या संघ या सहकारी सोसाइटी बनाने का,
(घ) भारत के राज्यक्षेत्र में सर्वत्र अबाध संचरण का,
(ङ) भारत के राज्यक्षेत्र के किसी भाग में निवास करने और बस जाने का, और
(च) [* * *]
(छ) कोई वृत्ति, उपजीविका, व्यापार या कारबार करने का,
अधिकार होगा।
(2) खंड (1) के उपखंड (क) की कोई बात उक्त उपखंड द्वारा दिए गए अधिकार के प्रयोग पर भारत की प्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार या सदाचार के हितों में अथवा न्यायालय-अवमान, मानहानि या अपराध-उद्दीपन के संबंध में युक्तियुक्त निर्बंधन जहाँ तक कोई विद्यमान विधि अधिरोपित करती है वहाँ तक उसके प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी या वैसे निर्बंधन अधिरोपित करने वाली कोई विधि बनाने से राज्य को निवारित नहीं करेगी।
(3) उक्त खंड के उपखंड (ख) की कोई बात उक्त उपखंड द्वारा दिए गए अधिकार के प्रयोग पर भारत की प्रभुता और अखंडता या लोक व्यवस्था के हितों में युक्तियुक्त निर्बंधन जहाँ तक कोई विद्यमान विधि अधिरोपित करती है वहाँ तक उसके प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी या वैसे निर्बंधन अधिरोपित करने वाली कोई विधि बनाने से राज्य को निवारित नहीं करेगी।
(4) उक्त खंड के उपखंड (ग) की कोई बात उक्त उपखंड द्वारा दिए गए अधिकार के प्रयोग पर भारत की प्रभुता और अखंडता या लोक व्यवस्था या सदाचार के हितों में युक्तियुक्त निर्बंधन जहाँ तक कोई विद्यमान विधि अधिरोपित करती है वहाँ तक उसके प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी या वैसे निर्बंधन अधिरोपित करने वाली कोई विधि बनाने से राज्य को निवारित नहीं करेगी।
(5) उक्त खंड के उपखंड (घ) और उपखंड (ङ) की कोई बात उक्त उपखंडों द्वारा दिए गए अधिकारों में से किसी के प्रयोग पर साधारण जनता के हितों में या किसी अनुसूचित जनजाति के हितों के संरक्षण के लिए युक्तियुक्त निर्बंधन जहाँ तक कोई विद्यमान विधि अधिरोपित करती है वहाँ तक उसके प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी या वैसे निर्बंधन अधिरोपित करने वाली कोई विधि बनाने से राज्य को निवारित नहीं करेगी।
(6) उक्त खंड के उपखंड (छ) की कोई बात उक्त उपखंड द्वारा दिए गए अधिकार के प्रयोग पर साधारण जनता के हितों में युक्तियुक्त निर्बंधन जहाँ तक कोई विद्यमान विधि अधिरोपित करती है वहाँ तक उसके प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी या वैसे निर्बंधन अधिरोपित करने वाली कोई विधि बनाने से राज्य को निवारित नहीं करेगी और विशिष्टतया उक्त उपखंड की कोई बात—
(i) कोई वृत्ति, उपजीविका, व्यापार या कारबार करने के लिए आवश्यक वृत्तिक या तकनीकी अर्हताओं से, या
(ii) राज्य द्वारा या राज्य के स्वामित्व या नियंत्रण में किसी निगम द्वारा कोई व्यापार, कारबार, उद्योग या सेवा, नागरिकों का पूर्णतः या भागतः अपवर्जन करके या अन्यथा, चलाए जाने से,
जहाँ तक कोई विद्यमान विधि संबंध रखती है वहाँ तक उसके प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी या इस प्रकार संबंध रखने वाली कोई विधि बनाने से राज्य को निवारित नहीं करेगी।
अनुच्छेद 19 केवल नागरिकों को छह स्वतंत्रताएँ देता है। भारत में रह रहा विदेशी इनका दावा नहीं कर सकता।
19(1)(क) वाक् और अभिव्यक्ति सबसे बड़ी स्वतंत्रता है। इसमें बोलना, लिखना, छापना, फ़िल्म, पोस्टर, सोशल मीडिया पोस्ट और चुप रहने का अधिकार भी शामिल है।
बाक़ी पाँच: बिना हथियार शांतिपूर्ण सभा, संगठन (और सहकारी समिति) बनाना, भारत में कहीं भी आना-जाना, कहीं भी बसना, और कोई भी पेशा या कारोबार चुनना।
सातवीं, संपत्ति (19(1)(च)), 1978 में हटा दी गई। संपत्ति अब अनुच्छेद 300क में क़ानूनी अधिकार है।
हर स्वतंत्रता के लिए खंड (2) से (6) में युक्तियुक्त निर्बंधन की अपनी सूची है। राज्य नए आधार नहीं गढ़ सकता; अदालत जाँचती है कि रोक उचित है और ज़रूरत से ज़्यादा तो नहीं।
🏠 रोज़मर्रा की मिसाल
अनुच्छेद 19 को ड्राइविंग लाइसेंस की तरह समझिए। आप कहीं भी गाड़ी चला सकते हैं (स्वतंत्रता), पर ट्रैफ़िक नियम फिर भी लागू हैं (निर्बंधन)। नियम पहले से लिखे हों, सब पर लागू हों और समझदारी भरे हों: एक लापरवाह ड्राइवर को रोकने के लिए सारी गाड़ियों पर रोक लगाने वाला नियम "अयुक्तियुक्त" मानकर रद्द हो जाएगा।
🇮🇳 असली भारतीय उदाहरण
पटना की रिया अपने शहर की कूड़े की समस्या पर ब्लॉग लिखती है, नौकरी के लिए पुणे चली जाती है, वहाँ निवासी कल्याण संघ से जुड़ती है और सप्ताहांत पर छोटी बेकरी खोलती है। हर क़दम अनुच्छेद 19 का अलग हिस्सा है: (क), (घ) और (ङ), (ग) और (छ)। बेकरी के लिए फ़ूड लाइसेंस लेना पड़े तो यह 19(6) का युक्तियुक्त निर्बंधन है, उल्लंघन नहीं।
स्वतंत्रता का अर्थस्वतंत्रता क्या है? लिबर्टी बनाम फ्रीडम और सकारात्मक बनाम नकारात्मक स्वतंत्रता
- लिबर्टी शब्द लैटिन libertas (मूल liber, यानी "स्वतंत्र") से आया है: स्वतंत्र होने की अवस्था।
- मनुष्य के लिए स्वतंत्रता का मतलब "जो मन आए करो" नहीं है। जंगल में शेर कुछ भी कर सकता है; वह स्वच्छंदता (licence) है, स्वतंत्रता नहीं। मनुष्य के लिए स्वतंत्रता का अर्थ है विकास के अवसर और परिस्थितियाँ।
- क़ानून और स्वतंत्रता साथ चलते हैं। जॉन लॉक के शब्दों में, जहाँ क़ानून नहीं वहाँ स्वतंत्रता नहीं: ट्रैफ़िक नियम न हों तो कोई सुरक्षित गाड़ी नहीं चला सकता।
सकारात्मक बनाम नकारात्मक स्वतंत्रता
- नकारात्मक स्वतंत्रता (किसी चीज़ से मुक्ति): जब व्यक्ति ख़ुद सक्षम है तो राज्य दख़ल न दे। उदाहरण: उपासना की स्वतंत्रता, बोलने की स्वतंत्रता।
- सकारात्मक स्वतंत्रता (कुछ करने की क्षमता): जो ख़ुद विकास नहीं कर पाता, राज्य उसकी मदद करे। उदाहरण: अनुच्छेद 21क में मुफ़्त शिक्षा, कमज़ोर वर्गों को सहायता।
- ये शब्द दार्शनिक आइज़ायह बर्लिन ("Two Concepts of Liberty", 1958) ने प्रसिद्ध किए। अनुच्छेद 19 मुख्यतः नकारात्मक स्वतंत्रता है; नीति निदेशक तत्व सकारात्मक पक्ष जोड़ते हैं।
लिबर्टी बनाम फ्रीडम: कक्षा वाली समझ
- उद्देशिका "विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता (liberty)" का वादा करती है, और अनुच्छेद 21 "दैहिक स्वतंत्रता (personal liberty)" की रक्षा करता है।
- भाग III में अनुच्छेद 19 से 22 का शीर्षक "स्वतंत्रता का अधिकार" (Right to Freedom) है, और अनुच्छेद 25 से 28 धर्म की स्वतंत्रता की बात करते हैं।
- कई शिक्षक ऐसे समझाते हैं: फ्रीडम यानी व्यक्ति के बंधन हटाना; लिबर्टी यानी वे परिस्थितियाँ जो व्यक्ति और राज्य मिलकर बनाते हैं। क़ानून में दोनों शब्द लगभग एक जैसे प्रयोग होते हैं, और दोनों की सीमाएँ हैं।

छह स्वतंत्रताएँअनुच्छेद 19(1)(क) से (छ): छह स्वतंत्रताएँ
| खंड | स्वतंत्रता | आसान अर्थ |
|---|---|---|
| 19(1)(क) | वाक् और अभिव्यक्ति | अपनी बात बोलना, लिखना, छापना, पोस्ट करना या दिखाना |
| 19(1)(ख) | शांतिपूर्वक और बिना हथियार सम्मेलन | बिना हथियार, शांति से सभा, रैली या प्रदर्शन |
| 19(1)(ग) | संगम, संघ या सहकारी सोसाइटी बनाना | क्लब, मज़दूर संघ, दल या सहकारी समिति बनाना |
| 19(1)(घ) | भारत में कहीं भी आना-जाना | बिना पास पूरे भारत में घूमना |
| 19(1)(ङ) | भारत के किसी भी भाग में रहना और बसना | किसी भी राज्य में घर बसाना |
| 44वें संशोधन 1978 से हटाई; अब अनुच्छेद 300क में क़ानूनी अधिकार | ||
| 19(1)(छ) | कोई भी वृत्ति, उपजीविका, व्यापार या कारबार | अपना काम चुनना: नौकरी, दुकान, खेती, स्टार्ट-अप |
- स्वतंत्रता के अधिकारों (अनुच्छेद 19 से 22) में अनुच्छेद 19 सबसे पहला है और अदालतों में सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होता है।
- केवल नागरिक: विदेशी अनुच्छेद 19 का दावा नहीं कर सकते। कंपनी नागरिक नहीं, पर उसके शेयरधारक कंपनी की स्वतंत्रता पर चोट करने वाले क़ानून को चुनौती दे सकते हैं (बेनेट कोलमैन, 1973)।
- शुरू में सात स्वतंत्रताएँ थीं। 44वें संशोधन 1978 ने 19(1)(च) (संपत्ति) और अनुच्छेद 31 हटाए; संपत्ति अब अनुच्छेद 300क में संवैधानिक (क़ानूनी) अधिकार है, मूल अधिकार नहीं।
- सहकारी समितियाँ: 97वें संशोधन 2011 ने 19(1)(ग) में सहकारी सोसाइटी जोड़ी और भाग IXख बनाया। भारत संघ बनाम राजेंद्र एन. शाह (20 जुलाई 2021) में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सहकारी समितियों से जुड़ा भाग IXख का बड़ा हिस्सा रद्द किया क्योंकि आधे राज्यों ने अनुसमर्थन नहीं किया था; 19(1)(ग) का अधिकार बना हुआ है।
- सभा का अधिकार व्यवहार में: शांतिपूर्ण प्रदर्शन सुरक्षित है, पर सार्वजनिक सड़क अनिश्चित समय तक नहीं रोकी जा सकती (अमित साहनी, 2020, शाहीन बाग़ केस)। पुलिस प्रदर्शन की जगह और समय तय कर सकती है, जैसे जंतर-मंतर पर (मज़दूर किसान शक्ति संगठन, 2018)।
- पेशे का अधिकार व्यवहार में: ग़ैरक़ानूनी या हानिकारक व्यापार का अधिकार नहीं, जैसे शराब का व्यापार, जिसे राज्य नियंत्रित या प्रतिबंधित कर सकता है (खोडे डिस्टिलरीज़, 1995)।
- आपातकाल: युद्ध या बाहरी आक्रमण के आधार पर राष्ट्रीय आपातकाल घोषित होते ही अनुच्छेद 19 अपने आप निलंबित हो जाता है (अनुच्छेद 358)।

युक्तियुक्त निर्बंधनअनुच्छेद 19 पर युक्तियुक्त निर्बंधन: खंड 19(2) से 19(6)
| स्वतंत्रता | खंड | युक्तियुक्त निर्बंधन के आधार |
|---|---|---|
| वाक् और अभिव्यक्ति (क) | 19(2) | 1. भारत की प्रभुता और अखंडता 2. राज्य की सुरक्षा 3. विदेशी राज्यों से मैत्रीपूर्ण संबंध 4. लोक व्यवस्था 5. शिष्टाचार या सदाचार 6. न्यायालय अवमान 7. मानहानि 8. अपराध के लिए उकसाना |
| सम्मेलन (ख) | 19(3) | भारत की प्रभुता और अखंडता; लोक व्यवस्था |
| संगम (ग) | 19(4) | भारत की प्रभुता और अखंडता; लोक व्यवस्था; सदाचार |
| आना-जाना (घ) और निवास (ङ) | 19(5) | साधारण जनता का हित; अनुसूचित जनजातियों के हितों की रक्षा |
| पेशा (छ) | 19(6) | साधारण जनता का हित; पेशेवर या तकनीकी योग्यता; किसी व्यापार, उद्योग या सेवा पर राज्य का एकाधिकार |
- अनुच्छेद 19 सापेक्ष अधिकार है, निरपेक्ष नहीं। पर हर रोक को तीन कसौटियों पर खरा उतरना होगा: रोक किसी क़ानून से लगे (केवल आदेश से नहीं), वह गिनाए गए आधारों में से किसी पर हो, और वह युक्तियुक्त हो।
- "युक्तियुक्त" का अर्थ है रोक मनमानी या ज़रूरत से ज़्यादा न हो, और इसका फ़ैसला अदालत करती है (मद्रास राज्य बनाम वी.जी. रो, 1952)। आज अदालतें आनुपातिकता (proportionality) की कसौटी अपनाती हैं: उद्देश्य वैध है, रोक उससे जुड़ी है, कोई हल्का विकल्प नहीं, और संतुलन ठीक है?
- "लोक व्यवस्था" का अर्थ सार्वजनिक शांति में गंभीर गड़बड़ी है, हर छोटी क़ानून-व्यवस्था समस्या नहीं (राम मनोहर लोहिया, 1960)।
- कौशल किशोर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2023) में पाँच न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि 19(2) के आधार पूर्ण सूची हैं: मंत्रियों के भाषण पर भी कोई अतिरिक्त रोक नहीं जोड़ी जा सकती।

वाक् और अभिव्यक्तिअनुच्छेद 19(1)(क) वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: इसमें क्या-क्या शामिल है
- जानने और सूचना का अधिकार: मतदाता को सरकार के बारे में जानने का अधिकार है (उत्तर प्रदेश राज्य बनाम राज नारायण, 1975); RTI अधिनियम 2005 इसी पर आधारित है। ADR बनाम भारत संघ (15 फ़रवरी 2024) में चुनावी बॉन्ड योजना रद्द हुई, क्योंकि गुप्त राजनीतिक चंदा 19(1)(क) के तहत मतदाता के सूचना के अधिकार का उल्लंघन था।
- चुप रहने का अधिकार: राष्ट्रगान के समय सम्मान से खड़े रहे पर गाया नहीं, ऐसे तीन छात्रों को स्कूल से नहीं निकाला जा सकता (बिजो इमैनुएल बनाम केरल राज्य, 1986)। यानी राष्ट्रगान गाने के लिए किसी को बाध्य नहीं किया जा सकता।
- सम्मान के साथ राष्ट्रीय ध्वज फहराना अभिव्यक्ति का हिस्सा है (भारत संघ बनाम नवीन जिंदल, 2004)।
- प्रसारण: रेडियो तरंगें सार्वजनिक संपत्ति हैं और अभिव्यक्ति के काम आनी चाहिए (क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ़ बंगाल, 1995)। व्यावसायिक विज्ञापन भी सुरक्षित अभिव्यक्ति है (टाटा प्रेस, 1995)।
- इंटरनेट: इंटरनेट से बोलना और व्यापार करना सुरक्षित है; इंटरनेट बंदी अस्थायी, ज़रूरी और समीक्षा योग्य होनी चाहिए (अनुराधा भसीन, 10 जनवरी 2020)।
- पहनावा और पहचान: पहनावे और व्यवहार से अपनी लैंगिक पहचान व्यक्त करना सुरक्षित है (NALSA, 2014)।
अभिव्यक्ति के प्रकार
- वर्बल (शाब्दिक): मौखिक (भाषण, कॉन्फ़्रेंस, सेमिनार, बैठक) और लिखित (पत्र, नोटिस, मेमो, ई-मेल, बुलेटिन)।
- नॉन-वर्बल (अशाब्दिक): इंटोनेशन (किसी शब्द पर ज़ोर देने से अर्थ बदल जाता है), शारीरिक भाषा, चेहरे के भाव और मुद्रा।
- मौखिक संचार में तुरंत फ़ीडबैक मिलता है पर बाद में साबित करना कठिन है; लिखित संचार में तुरंत फ़ीडबैक नहीं, पर रिकॉर्ड के रूप में उसकी क़ानूनी वैधता होती है।
- कॉन्फ़्रेंस में अधिक से अधिक तथ्य फैलाए जाते हैं; सेमिनार में आलोचनात्मक विचारों पर चर्चा होती है; बैठक निर्णय के लिए होती है; नोटिस सबको सूचना देता है; मेमो किसी व्यक्ति को विशेष काम के लिए दिया जाता है; बुलेटिन एक विषय पर क्रमिक जानकारी देता है।

IT अधिनियम बनाम अभिव्यक्तिIT अधिनियम की धारा 66A और श्रेया सिंघल केस: ऑनलाइन अनुच्छेद 19(1)(क)
- सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड और डिजिटल हस्ताक्षर को क़ानूनी मान्यता देने, ई-कॉमर्स और ई-शासन को बढ़ाने, और डिजिटल साक्ष्य मानने के लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 में संशोधन हेतु बना (वह अधिनियम अब भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023 से बदल चुका है)।
- धारा 66A बाद में IT (संशोधन) अधिनियम 2008 से जोड़ी गई। इसमें "घोर आपत्तिजनक", "धमकी भरे" या "असुविधा" और "झुंझलाहट" पैदा करने वाले ऑनलाइन संदेश पर 3 साल तक की जेल का प्रावधान था।
- शब्द अस्पष्ट होने से पुलिस ने साधारण पोस्ट पर भी गिरफ़्तारियाँ कीं। नवंबर 2012 में महाराष्ट्र के पालघर में दो युवतियाँ एक फ़ेसबुक पोस्ट और एक "लाइक" के कारण गिरफ़्तार हुईं।
- श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (24 मार्च 2015): न्यायमूर्ति जे. चेलमेश्वर और आर.एफ. नरीमन ने धारा 66A को पूरी तरह रद्द किया। कारण: इसके शब्द अस्पष्ट और बहुत व्यापक थे; यह 19(2) के किसी आधार में नहीं आती थी; और इससे भयकारी प्रभाव (chilling effect) पड़ता था, यानी डर से लोग बोलना बंद कर देते थे।
- कोर्ट ने एक अहम रेखा खींची: अलोकप्रिय विचारों की चर्चा और समर्थन भी सुरक्षित है; केवल ऐसा उकसावा रोका जा सकता है जो सीधे अव्यवस्था की ओर ले जाए। धारा 69A (सुरक्षा उपायों के साथ वेबसाइट ब्लॉक करना) वैध रही, और बाक़ी IT अधिनियम बना रहा।
- 2015 के बाद भी 66A में मामले दर्ज होते रहे। 2021 और 2022 में (PUCL बनाम भारत संघ) सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि 66A में किसी पर मुकदमा नहीं चलेगा और लंबित मामले हटाए जाएँ।

प्रेस और मीडियाअनुच्छेद 19(1)(क) के तहत भारत में प्रेस की स्वतंत्रता
- संविधान में प्रेस के लिए अलग से कोई खंड नहीं है। प्रेस को स्वतंत्रता उसी अनुच्छेद 19(1)(क) से मिलती है जिससे हर नागरिक को, और उस पर भी वही 19(2) की सीमाएँ लागू हैं।
- अदालतों ने बार-बार प्रेस की स्वतंत्रता को 19(1)(क) में माना: रोमेश थापर (1950, पत्रिका के प्रवेश पर रोक रद्द), सकल पेपर्स (1962, क़ीमत और पन्नों पर नियंत्रण रद्द) और बेनेट कोलमैन (1973, अख़बारी काग़ज़ का कोटा रद्द)।
- इंडियन एक्सप्रेस न्यूज़पेपर्स बनाम भारत संघ (फ़ैसला दिसंबर 1984, प्रकाशित 1985): अख़बारी काग़ज़ पर ऐसा कर जो अख़बारों पर ज़रूरत से ज़्यादा बोझ डाले, 19(1)(क) के तहत चुनौती योग्य है, क्योंकि प्रेस लोकतंत्र के लिए ज़रूरी है।
- प्रेस का महत्व: विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बाद इसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहते हैं; यह जन-जागरूकता बढ़ाता है, सरकार के काम की जाँच करता है, और कमज़ोर वर्गों की समस्याएँ मानवाधिकार आयोग, महिला आयोग जैसी संस्थाओं तक पहुँचाता है।
- सीमाएँ और चिंताएँ: व्यावसायिक दबाव, "मीडिया ट्रायल" जिसमें अदालत से पहले ही किसी को दोषी ठहरा दिया जाता है, और सनसनीखेज़ या पेड न्यूज़। मीडिया का काम तथ्य सामने लाना है, फ़ैसला सुनाना नहीं।
- क्या मीडिया पर नियंत्रण हो? 19(2) की युक्तियुक्त सीमाएँ लागू हैं, पर मीडिया पर पूरा नियंत्रण किसी लोकतंत्र में उचित नहीं। स्व-नियमन (भारतीय प्रेस परिषद, न्यूज़ ब्रॉडकास्टिंग स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी) और अदालतें संतुलन बनाती हैं।
घृणा भाषण क़ानूनक्या घृणा भाषण अनुच्छेद 19 में सुरक्षित है? विधि आयोग की 267वीं रिपोर्ट, फ़िल्में और OTT
- परिभाषा नहीं: संविधान घृणा भाषण को परिभाषित नहीं करता। मोटे तौर पर इसका अर्थ है ऐसी बात जो धर्म, जाति, भाषा या ऐसी पहचान के आधार पर किसी समूह को निशाना बनाए और वैमनस्य या हिंसा की ओर ले जा सके।
- सुरक्षित नहीं: ऐसी अभिव्यक्ति पर 19(2) के लोक व्यवस्था और अपराध-उद्दीपन जैसे आधारों पर रोक लग सकती है। भारतीय न्याय संहिता 2023 में मुख्य प्रावधान धारा 196 (समूहों में शत्रुता बढ़ाना), 197, 299 और 353 हैं (पहले IPC 153A, 153B, 295A और 505)।
- विधि आयोग की 267वीं रिपोर्ट (मार्च 2017): सुप्रीम कोर्ट के प्रवासी भलाई संगठन (2014) मामले में अनुरोध के बाद बनी। इसमें दो नए अपराध सुझाए गए: धारा 153C (घृणा के लिए उकसाना) और धारा 505A (भय, चिंता या हिंसा के लिए उकसाना)।
- फ़िल्मों के साथ अलग व्यवहार क्यों: फ़िल्म बहुत बड़े दर्शक वर्ग तक पहुँचती है और भावनाओं को गहराई से छूती है, इसलिए सिनेमैटोग्राफ़ अधिनियम 1952 के तहत CBFC का पूर्व-प्रमाणन के.ए. अब्बास बनाम भारत संघ (1970) में वैध माना गया। पर केवल कुछ लोगों के विरोध की आशंका से फ़िल्म नहीं रोकी जा सकती (एस. रंगराजन, 1989)।
- OTT प्लेटफ़ॉर्म: कोई सेंसर बोर्ड नहीं, पर IT (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम 2021 के तहत आयु रेटिंग (U, U/A 7+, 13+, 16+, A), सामग्री विवरण और तीन-स्तरीय शिकायत व्यवस्था (प्रकाशक, स्व-नियामक संस्था, मंत्रालय की निगरानी) ज़रूरी है।
- संतुलन: श्रेया सिंघल की रेखा आज भी लागू है: चर्चा और आलोचना स्वतंत्र है, केवल उकसावा दंडनीय है।
अनुच्छेद 19 बनाम 105अनुच्छेद 19 बनाम अनुच्छेद 105: नागरिकों और सांसदों की अभिव्यक्ति
| बिंदु | अनुच्छेद 19(1)(क) | अनुच्छेद 105 (सांसद) / 194 (विधायक) |
|---|---|---|
| किसके लिए | हर नागरिक | संसद या राज्य विधानमंडल के सदस्य |
| कहाँ | कहीं भी | सदन और उसकी समितियों के भीतर |
| प्रकृति | सापेक्ष: 19(2) के अधीन | लगभग निरपेक्ष: सदन में कही बात या दिए वोट पर कोई मुकदमा नहीं |
| सीमाएँ | 19(2) के आठ आधार | सदन के नियम और अध्यक्ष; अनुच्छेद 121 न्यायाधीश के आचरण पर चर्चा रोकता है |
- इतनी मज़बूत सुरक्षा क्यों? ताकि जनप्रतिनिधि मानहानि के मुकदमे के डर के बिना लोगों की असली समस्याएँ उठा सकें।
- सीता सोरेन बनाम भारत संघ (4 मार्च 2024, सात न्यायाधीश): बोलने या वोट देने के लिए रिश्वत लेना अनुच्छेद 105 या 194 में सुरक्षित नहीं; इसने पी.वी. नरसिंह राव (1998) को पलट दिया।
त्वरित दोहराईयाद रखने योग्य मुख्य बातें
- केवल नागरिकों के लिए छह स्वतंत्रताएँ: अभिव्यक्ति, सभा, संगठन, आना-जाना, निवास, पेशा।
- 19(1)(च) संपत्ति 44वें संशोधन 1978 से हटाई गई; संपत्ति अब अनुच्छेद 300क में है।
- रोक क़ानून से, गिनाए गए आधार पर और युक्तियुक्त होनी चाहिए; 19(2) में आठ आधार हैं।
- 19(1)(क) में प्रेस की स्वतंत्रता, जानने का अधिकार, चुप रहने का अधिकार, ध्वज फहराना और इंटरनेट पर अभिव्यक्ति शामिल है।
- श्रेया सिंघल (2015) ने धारा 66A रद्द की: चर्चा और समर्थन स्वतंत्र, उकसावा नहीं।
- युद्ध या बाहरी आक्रमण वाले आपातकाल में अनुच्छेद 19 अपने आप निलंबित हो जाता है (अनुच्छेद 358)।
प्रमुख मुकदमेअनुच्छेद 19 के प्रमुख मुकदमे: मुख्य तिथियाँ
| वर्ष | मुकदमा और फ़ैसला |
|---|---|
| 1950 | रोमेश थापर: प्रेस की स्वतंत्रता 19(1)(क) का हिस्सा; इसी से पहला संशोधन आया। |
| 1962 | सकल पेपर्स: अख़बार के पन्नों और क़ीमत पर नियंत्रण नहीं। केदारनाथ: राजद्रोह केवल हिंसा के उकसावे पर। |
| 1973 | बेनेट कोलमैन: अख़बारी काग़ज़ का कोटा रद्द। |
| 1985 | इंडियन एक्सप्रेस: अख़बारी काग़ज़ पर अत्यधिक कर 19(1)(क) का उल्लंघन हो सकता है। |
| 1986 | बिजो इमैनुएल: चुप रहने का अधिकार; राष्ट्रगान गाने को बाध्य नहीं। |
| 1995 | क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ़ बंगाल: रेडियो तरंगें सार्वजनिक संपत्ति। |
| 2004 | नवीन जिंदल: राष्ट्रीय ध्वज फहराना अभिव्यक्ति है। |
| 2015 | श्रेया सिंघल (24 मार्च): IT अधिनियम की धारा 66A रद्द। |
| 2020 | अनुराधा भसीन: इंटरनेट पर अभिव्यक्ति सुरक्षित; बंदी की समीक्षा ज़रूरी। |
| 2023 | कौशल किशोर: 19(2) के आधार पूर्ण सूची हैं। |
| 2024 | चुनावी बॉन्ड (15 फ़रवरी) रद्द; सीता सोरेन (4 मार्च): रिश्वत पर छूट नहीं। |
UPSC · राज्य PSC · न्यायपालिकाअनुच्छेद 19: UPSC परीक्षा कॉर्नर
- प्रीलिम्स जाल: "अनुच्छेद 19 विदेशियों को भी मिलता है।" ग़लत। केवल नागरिकों को।
- प्रीलिम्स जाल: "संपत्ति का अधिकार 42वें संशोधन से हटाया गया।" ग़लत। 44वाँ संशोधन, 1978।
- प्रीलिम्स जाल: "प्रेस की स्वतंत्रता अनुच्छेद 19 में अलग अधिकार है।" ग़लत। यह 19(1)(क) का हिस्सा है।
- मेन्स PYQ 2013: सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66A की, संविधान के अनुच्छेद 19 के कथित उल्लंघन के संदर्भ में विवेचना कीजिए।
- मेन्स PYQ 2014: "वाक् और अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य" से आप क्या समझते हैं? क्या इसकी परिधि में घृणा वाक् भी आता है? भारत में फ़िल्में अभिव्यक्ति के अन्य रूपों से तनिक भिन्न स्तर पर क्यों हैं? चर्चा कीजिए।
- अभ्यास (250 शब्द): अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और घृणा भाषण में अंतर स्पष्ट करें। अभिव्यक्ति को नुक़सान पहुँचाए बिना OTT पर हानिकारक सामग्री को नियंत्रित करने के क्या उपाय हो सकते हैं?
अभ्यास प्रश्नख़ुद को परखें: अनुच्छेद 19
अनुच्छेद 19(3) के तहत शांतिपूर्ण सम्मेलन के अधिकार पर राज्य किन आधारों पर रोक लगा सकता है? 1. भारत की प्रभुता और अखंडता 2. लोक व्यवस्था 3. मानहानि
शंका समाधानअक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 क्या है?
अनुच्छेद 19 हर नागरिक को छह स्वतंत्रताएँ देता है: वाक् और अभिव्यक्ति, शांतिपूर्ण सभा, संगठन बनाना, भारत में कहीं भी आना-जाना और बसना, और कोई भी पेशा या कारोबार। खंड (2) से (6) तय आधारों पर युक्तियुक्त रोक की अनुमति देते हैं।
अनुच्छेद 19 में कितनी स्वतंत्रताएँ हैं?
आज छह। शुरू में सात थीं; 19(1)(च) संपत्ति का अधिकार 44वें संशोधन 1978 से हटाया गया और संपत्ति अब अनुच्छेद 300क में क़ानूनी अधिकार है।
क्या भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता असीमित है?
नहीं। अनुच्छेद 19(2) के तहत क़ानून से आठ आधारों पर इसे सीमित किया जा सकता है: भारत की प्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों से मैत्रीपूर्ण संबंध, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार या सदाचार, न्यायालय अवमान, मानहानि और अपराध के लिए उकसाना।
IT अधिनियम की धारा 66A क्यों रद्द हुई?
श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (24 मार्च 2015) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 66A में "झुंझलाहट" और "घोर आपत्तिजनक" जैसे अस्पष्ट, बहुत व्यापक शब्द थे, यह 19(2) के किसी आधार में नहीं आती थी, और इससे अभिव्यक्ति पर डर का असर पड़ता था।