भाग III ⚖️ मूल अधिकार लागू · कभी संशोधित नहीं · आपातकाल में भी निलंबित नहीं

अनुच्छेद 20: अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण

जब राज्य किसी व्यक्ति पर अपराध का आरोप लगाता है, तो मुक़ाबला बराबरी का नहीं होता: एक तरफ़ पुलिस, अभियोजक और जेल, दूसरी तरफ़ अकेला व्यक्ति। अनुच्छेद 20 उस व्यक्ति को तीन ढालें देता है: बाद में बने क़ानून से सज़ा नहीं, एक ही अपराध के लिए दूसरी बार मुकदमा और सज़ा नहीं, और ज़बरन इक़बाल नहीं।

मूल पाठअनुच्छेद 20 का आधिकारिक पाठ

हिन्दी · आधिकारिक पाठ

20. अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण—

(1) कोई व्यक्ति किसी अपराध के लिए तब तक सिद्धदोष नहीं ठहराया जाएगा, जब तक कि उसने ऐसा कोई कार्य करने के समय, जो अपराध के रूप में आरोपित है, किसी प्रवृत्त विधि का अतिक्रमण नहीं किया है या उससे अधिक शास्ति का भागी नहीं होगा जो उस अपराध के किए जाने के समय प्रवृत्त विधि के अधीन अधिरोपित की जा सकती थी।

(2) किसी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक बार से अधिक अभियोजित और दंडित नहीं किया जाएगा।

(3) किसी अपराध के लिए अभियुक्त किसी व्यक्ति को स्वयं अपने विरुद्ध साक्षी होने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा।

कभी संशोधित नहीं। लेकिन 44वें संशोधन, 1978 ने अनुच्छेद 359 बदला, ताकि राष्ट्रीय आपातकाल में भी राष्ट्रपति अनुच्छेद 20 और 21 को लागू कराने का अधिकार निलंबित न कर सकें। यह 1975 से 1977 के अनुभव से सीखा गया सबक़ था।
In Simple Words / आसान शब्दों में

20(1): कोई काम करते समय वह क़ानूनी था, तो बाद में बना नया क़ानून आपको उसके लिए अपराधी नहीं बना सकता। और अगर आपके काम के बाद सज़ा बढ़ा दी गई, तो आप पर पुरानी, कम सज़ा ही लागू होगी।

20(2): अदालत ने एक बार किसी अपराध के लिए आप पर अभियोजन चलाकर सज़ा दे दी, तो राज्य उसी अपराध के लिए फिर मुकदमा चलाकर सज़ा नहीं दे सकता।

20(3): अभियुक्त को अपने ही ख़िलाफ़ गवाह बनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। पुलिस मारपीट या चालाकी से इक़बाल नहीं करवा सकती, और आप चुप रह सकते हैं।

अनुच्छेद 20 हर व्यक्ति की रक्षा करता है: नागरिक, विदेशी और कंपनियाँ भी। यह केवल आपराधिक मामलों में काम करता है।

🏠 रोज़मर्रा की मिसाल

क्रिकेट मैच सोचिए। गेंद डलने के बाद अंपायर नियम बदलकर आपको आउट नहीं दे सकता (20(1))। एक बार आउट होकर लौट गए, तो उसी गेंद पर दोबारा आउट नहीं दिया जाता (20(2))। और किसी बल्लेबाज़ को अपने ही ख़िलाफ़ अपील करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता (20(3))।

🇮🇳 असली भारतीय उदाहरण

2024 में नए आपराधिक क़ानूनों (BNS, BNSS, BSA) ने 1 जुलाई से IPC, CrPC और साक्ष्य अधिनियम की जगह ली। मई 2024 में की गई चोरी पर अब भी IPC के अनुसार ही सज़ा होगी, क्योंकि 20(1) उस दिन लागू क़ानून को देखता है जिस दिन काम हुआ। अगर नया क़ानून किसी अपराध की सज़ा बढ़ाता है, तो उसे लागू होने से पहले के कामों पर नहीं लगाया जा सकता।

तीन संरक्षणअनुच्छेद 20: अभियुक्त के तीन संरक्षण

खंडसंरक्षणआसान अर्थ
20(1)भूतलक्षी आपराधिक क़ानून नहींसज़ा केवल उसी क़ानून से जो काम करते समय लागू था, और उस क़ानून से अधिक सज़ा नहीं
20(2)दोहरा दंड नहींअदालत एक अपराध के लिए अभियोजन चलाकर सज़ा दे चुकी है तो उसी अपराध के लिए फिर मुकदमा और सज़ा नहीं
20(3)आत्म-अभिशंसन नहींअभियुक्त को अपने ख़िलाफ़ सबूत देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता; वह चुप रह सकता है

किसे और कब संरक्षण

  • शब्द "व्यक्ति" है, इसलिए नागरिक, विदेशी और कंपनियों जैसे विधिक व्यक्ति सभी शामिल हैं।
  • यह केवल आपराधिक कार्यवाही पर लागू है: दोषसिद्धि, दंड, अभियोजन। दीवानी मुकदमे, कर की माँग या केवल विभागीय मामले इसमें नहीं आते।
  • 44वें संशोधन 1978 से बदले गए अनुच्छेद 359(1) के तहत राष्ट्रीय आपातकाल में भी अनुच्छेद 20 और 21 का प्रवर्तन निलंबित नहीं हो सकता। भाग III के बाक़ी मूल अधिकारों का प्रवर्तन निलंबित हो सकता है।
अनुच्छेद 20 के तीन संरक्षण: 20(1) भूतलक्षी आपराधिक क़ानून नहीं और उस समय से अधिक दंड नहीं, 20(2) एक अपराध के लिए दो बार अभियोजन और दंड नहीं, 20(3) अभियुक्त को अपने विरुद्ध गवाह बनने को बाध्य नहीं किया जाएगा; आपातकाल में भी निलंबित नहीं
अनुच्छेद 20 की तीन ढालें और हर एक के पीछे के मुख्य मुकदमे।

भूतलक्षी क़ानूनअनुच्छेद 20(1): भूतलक्षी आपराधिक क़ानून से संरक्षण

  • भूतलक्षी (ex post facto) का अर्थ है "घटना के बाद"। ऐसा क़ानून किसी काम को उसके हो जाने के बाद अपराध बनाता है या उसकी सज़ा बढ़ाता है।
  • 20(1) के दो हिस्से हैं: (i) दोषसिद्धि केवल तभी जब काम के समय लागू क़ानून टूटा हो; (ii) उस क़ानून में तय सज़ा से अधिक सज़ा नहीं। केदारनाथ बजोरिया बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1953) में बाद के क़ानून से जोड़ा गया अतिरिक्त जुर्माना पुराने अपराध पर नहीं लगाया जा सका।
  • कम सज़ा वाला नया क़ानून पीछे से लागू हो सकता है, क्योंकि इससे अभियुक्त को फ़ायदा है। रतन लाल बनाम पंजाब राज्य (1965) में एक लड़के को अपराधी परिवीक्षा अधिनियम 1958 का लाभ मिला, जबकि दोषसिद्धि के समय वह क़ानून उस क्षेत्र में लागू नहीं था।
  • 20(1) केवल दोषसिद्धि और सज़ा रोकता है। किसी प्रक्रिया पर व्यक्ति का निहित अधिकार नहीं होता, इसलिए पुराने अपराधों पर नई सुनवाई प्रक्रिया या नई अदालत लागू हो सकती है।
  • यह भूतलक्षी दीवानी या कर क़ानूनों को नहीं रोकता, और निवारक निरोध को भी नहीं, क्योंकि वह दोषसिद्धि नहीं है।
  • आपके नोट्स सही कहते हैं: यह संरक्षण केवल आपराधिक क़ानून के लिए है।

दोहरा दंडअनुच्छेद 20(2): दोहरे दंड से संरक्षण

  • यह विचार अमेरिकी संविधान (5वाँ संशोधन) और अंग्रेज़ी कॉमन लॉ से आया, पर भारत ने इसे संकीर्ण रूप में अपनाया।
  • अमेरिका में बरी होने के बाद भी दूसरा मुकदमा नहीं चल सकता। अनुच्छेद 20(2) तभी लागू है जब व्यक्ति पर अभियोजन भी चला और सज़ा भी हुई।
  • पहली कार्यवाही किसी अदालत या न्यायिक अधिकरण के सामने होनी चाहिए। मक़बूल हुसैन बनाम बंबई राज्य (1953) में सीमा शुल्क अधिकारियों द्वारा सोना ज़ब्त करना "अभियोजन" नहीं माना गया, इसलिए बाद का आपराधिक मुकदमा चल सका। एस.ए. वेंकटरमन बनाम भारत संघ (1954) में विभागीय जाँच के बारे में भी यही कहा गया।
  • अपराध वही होना चाहिए। एक काम से अलग-अलग तत्वों वाले दो क़ानून टूटें, तो दोनों में मुकदमा चल सकता है।

ट्रैफ़िक नियमों का उदाहरण, सही ढंग से

  • आपके नोट्स में लिखा है कि दीवानी और प्रशासनिक ग़लतियों पर दो बार सज़ा हो सकती है, जैसे बार-बार ट्रैफ़िक नियम तोड़ना। सही बात यह है: हर बार का उल्लंघन एक नया अपराध है, इसलिए हर बार जुर्माना दोहरा दंड नहीं।
  • साथ ही, एक ही काम के लिए विभागीय कार्रवाई (जैसे सरकारी कर्मचारी का निलंबन) और आपराधिक मुकदमा दोनों साथ चल सकते हैं।

क़ानूनी नियम

  • दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 300 ने और व्यापक नियम दिया: एक बार दोषसिद्ध या बरी व्यक्ति पर उसी अपराध के लिए फिर मुकदमा नहीं चलेगा। 1 जुलाई 2024 से यह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) 2023 की धारा 337 है।

आत्म-अभिशंसनअनुच्छेद 20(3): स्वयं के विरुद्ध गवाही से संरक्षण और नार्को टेस्ट

  • 20(3) किसी अपराध के अभियुक्त को अपने ही विरुद्ध गवाह बनने के लिए बाध्य किए जाने से बचाता है। इसकी जड़ें उस पुराने नियम में हैं कि किसी को ख़ुद पर आरोप लगाने के लिए मजबूर नहीं करना चाहिए।
  • बंबई राज्य बनाम काठी कालू ओघड़ (1961, 11 न्यायाधीश): "गवाह" होने का अर्थ है व्यक्तिगत जानकारी (बयान) देना। उँगलियों या हथेली के निशान, या नमूने के हस्तलेख देना बयान नहीं है, इसलिए पुलिस इन्हें ले सकती है।
  • नंदिनी सत्पथी बनाम पी.एल. दानी (1978): यह संरक्षण केवल अदालत में नहीं, पुलिस पूछताछ से शुरू होता है। व्यक्ति ऐसे सवालों का जवाब देने से मना कर सकता है जो उसे आपराधिक आरोप में फँसा सकते हैं: चुप रहने का अधिकार।
  • सेल्वी बनाम कर्नाटक राज्य (2010, 3 न्यायाधीश): बिना सहमति नार्को-एनालिसिस, पॉलीग्राफ (झूठ पकड़ने वाली मशीन) और ब्रेन मैपिंग (BEAP) टेस्ट अनुच्छेद 20(3) और अनुच्छेद 21 का उल्लंघन हैं। ये केवल व्यक्ति की स्वतंत्र सहमति से, मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज करके हो सकते हैं, और केवल इनके नतीजे सबूत नहीं हैं।
  • रितेश सिन्हा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2019): मजिस्ट्रेट किसी व्यक्ति को आवाज़ का नमूना देने का आदेश दे सकता है। ख़ून या DNA के नमूने की तरह यह भौतिक सबूत है, बयान नहीं।
  • तलाशी और ज़ब्ती "गवाह बनने की बाध्यता" नहीं है (एम.पी. शर्मा, 1954)।
अनुच्छेद 20 में क्या वर्जित और क्या मान्य: भूतलक्षी दंड वर्जित पर दीवानी और कर क़ानून मान्य; दोहरा दंड वर्जित पर विभागीय जाँच और आपराधिक मुकदमा मान्य; ज़बरन बयान और नार्को टेस्ट वर्जित पर उँगलियों के निशान, हस्तलेख, आवाज़ के नमूने मान्य
अनुच्छेद 20 का हर खंड क्या रोकता है और क्या नहीं, एक नज़र में।

त्वरित दोहराईयाद रखने योग्य मुख्य बातें

  • 20(1): बाद के क़ानून से दोषसिद्धि नहीं, और उस समय लागू सज़ा से अधिक सज़ा नहीं।
  • 20(2): एक ही अपराध के लिए दोबारा अभियोजन और सज़ा नहीं; पहले अदालत में मुकदमा ज़रूरी।
  • 20(3): ज़बरन बयान नहीं; उँगलियों के निशान और हस्तलेख के नमूने मान्य (काठी कालू ओघड़ 1961)।
  • सेल्वी (2010): बिना सहमति नार्को, पॉलीग्राफ और ब्रेन मैपिंग असंवैधानिक।
  • हर व्यक्ति को संरक्षण, केवल आपराधिक मामलों में; आपातकाल में निलंबित नहीं।

समयरेखाअनुच्छेद 20: मुख्य मुकदमे और तिथियाँ

वर्षघटना
1950संविधान के साथ अनुच्छेद 20 लागू।
1953मक़बूल हुसैन: सीमा शुल्क ज़ब्ती अभियोजन नहीं; केदारनाथ बजोरिया: बाद में अधिक दंड नहीं।
1961काठी कालू ओघड़: उँगलियों के निशान और हस्तलेख बयान नहीं।
1965रतन लाल: कम सज़ा वाला नया क़ानून अभियुक्त की मदद कर सकता है।
197844वाँ संशोधन: आपातकाल में अनुच्छेद 20 और 21 निलंबित नहीं; नंदिनी सत्पथी: चुप रहने का अधिकार।
2010सेल्वी: बिना सहमति नार्को, पॉलीग्राफ और ब्रेन मैपिंग असंवैधानिक।
2019रितेश सिन्हा: मजिस्ट्रेट आवाज़ का नमूना माँग सकता है।
20241 जुलाई से BNSS धारा 337 ने CrPC धारा 300 की जगह ली।

UPSC · राज्य PSC · न्यायपालिकाअनुच्छेद 20: UPSC परीक्षा कॉर्नर

  • प्रीलिम्स जाल: "अनुच्छेद 20 केवल नागरिकों को मिलता है।" ग़लत। यह विदेशियों और कंपनियों सहित हर व्यक्ति की रक्षा करता है।
  • प्रीलिम्स जाल: "अनुच्छेद 20(2) आपराधिक मुकदमे के बाद विभागीय जाँच रोकता है।" ग़लत। केवल अदालत द्वारा दूसरा अभियोजन और दंड वर्जित है।
  • प्रीलिम्स तथ्य: राष्ट्रीय आपातकाल में अनुच्छेद 20 और 21 निलंबित नहीं हो सकते (44वाँ संशोधन 1978, अनुच्छेद 359)।
  • मेन्स (150 शब्द): "आत्म-अभिशंसन के विरुद्ध अधिकार और जाँच की ज़रूरतों में संतुलन होना चाहिए।" सेल्वी केस के संदर्भ में चर्चा करें।

अभ्यास प्रश्नख़ुद को परखें: अनुच्छेद 20

इनमें से क्या अनुच्छेद 20(3) का उल्लंघन है? 1. अभियुक्त की उँगलियों के निशान लेना 2. बिना सहमति अभियुक्त का नार्को-एनालिसिस टेस्ट 3. अभियुक्त से नमूने का हस्तलेख लेना

शंका समाधानअक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 20 क्या है?

अनुच्छेद 20 अपराध के आरोपी व्यक्ति को तीन संरक्षण देता है: भूतलक्षी क़ानून से या अधिक सज़ा नहीं, दोहरा दंड नहीं, और अपने विरुद्ध गवाह बनने की बाध्यता नहीं।

भारतीय संविधान में दोहरा दंड क्या है?

अनुच्छेद 20(2) के तहत किसी व्यक्ति पर एक ही अपराध के लिए एक बार से अधिक अभियोजन चलाकर सज़ा नहीं दी जा सकती। यह तभी लागू है जब अदालत में पहले के अभियोजन में सज़ा हुई हो। BNSS धारा 337 (पुरानी CrPC धारा 300) बरी होने के बाद दोबारा मुकदमा भी रोकती है।

क्या भारत में नार्को टेस्ट क़ानूनी है?

केवल व्यक्ति की स्वतंत्र सहमति से, मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज करके और सुरक्षा उपायों के साथ। सेल्वी बनाम कर्नाटक राज्य (2010) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बिना सहमति नार्को, पॉलीग्राफ और ब्रेन मैपिंग अनुच्छेद 20(3) और 21 का उल्लंघन है।

क्या आपातकाल में अनुच्छेद 20 निलंबित हो सकता है?

नहीं। 44वें संशोधन 1978 के बाद अनुच्छेद 359 राष्ट्रपति को राष्ट्रीय आपातकाल में अनुच्छेद 20 और 21 का प्रवर्तन निलंबित करने की अनुमति नहीं देता।