भाग III ⚖️ मूल अधिकार लागू · कभी संशोधित नहीं

अनुच्छेद 29: अल्पसंख्यक-वर्गों के हितों का संरक्षण

भारत में सैकड़ों भाषाएँ, कई लिपियाँ और अनगिनत संस्कृतियाँ हैं। अनुच्छेद 29 भाग III के "संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकारों" की शुरुआत करता है। यह नागरिकों के हर समूह को अपनी भाषा, लिपि और संस्कृति जीवित रखने देता है, और यह पक्का करता है कि किसी नागरिक को धर्म, मूलवंश, जाति या भाषा के कारण सरकारी या सहायता प्राप्त स्कूल-कॉलेज से बाहर न रखा जाए।

मूल पाठअनुच्छेद 29 का आधिकारिक पाठ

हिन्दी · आधिकारिक पाठ

29. अल्पसंख्यक-वर्गों के हितों का संरक्षण—

(1) भारत के राज्यक्षेत्र या उसके किसी भाग के निवासी नागरिकों के किसी अनुभाग को, जिसकी अपनी विशेष भाषा, लिपि या संस्कृति है, उसे बनाए रखने का अधिकार होगा।

(2) राज्य द्वारा पोषित या राज्य-निधि से सहायता पाने वाली किसी शिक्षा संस्था में प्रवेश से किसी भी नागरिक को केवल धर्म, मूलवंश, जाति, भाषा या इनमें से किसी के आधार पर वंचित नहीं किया जाएगा।

कभी संशोधित नहीं। अनुच्छेद 29 अनुच्छेद 30 के साथ मिलकर काम करता है, जिसमें 44वें संशोधन 1978 से खंड (1क) जोड़ा गया। अनुच्छेद 29 और 30 मिलकर संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार बनाते हैं।
In Simple Words / आसान शब्दों में

29(1): अपनी भाषा, लिपि या संस्कृति वाला नागरिकों का कोई भी समूह उसे बचाए रख सकता है: भाषा की कक्षाएँ, सांस्कृतिक उत्सव, पुस्तकालय या स्कूल चला सकता है।

पाठ में "नागरिकों का अनुभाग" लिखा है, "अल्पसंख्यक" नहीं। इसलिए यह बहुसंख्यक समूहों को भी बचाता है, जैसे कर्नाटक में मराठी बोलने वाले या दिल्ली में तमिल बोलने वाले लोग।

29(2): सरकारी या सरकार से सहायता पाने वाला स्कूल या कॉलेज किसी नागरिक को केवल धर्म, मूलवंश, जाति या भाषा के कारण प्रवेश से मना नहीं कर सकता।

29(2) में लिंग या जन्मस्थान नहीं है; ये आधार अनुच्छेद 15 में हैं।

अनुच्छेद 29 केवल नागरिकों के लिए है। विदेशी इसका दावा नहीं कर सकते।

🏠 रोज़मर्रा की मिसाल

भारत को एक बड़ी हाउसिंग सोसाइटी समझिए। अनुच्छेद 29(1) कहता है कि हर परिवार घर में अपनी भाषा बोल सकता है, अपना खाना बना सकता है और अपने त्योहार मना सकता है; सोसाइटी सब पर एक ही संस्कृति नहीं थोप सकती। अनुच्छेद 29(2) कहता है कि सबके पैसे से चलने वाली सोसाइटी की साझा लाइब्रेरी में हर सदस्य को आने देना होगा, चाहे उसका धर्म, जाति या भाषा कुछ भी हो।

🇮🇳 असली भारतीय उदाहरण

दिल्ली में एक बंगाली संघ सप्ताहांत पर बांग्ला की कक्षाएँ और दुर्गा पूजा का सांस्कृतिक कार्यक्रम चलाता है; मुंबई में एक तमिल संगम बच्चों को तमिल लिपि सिखाता है। दोनों अनुच्छेद 29(1) का प्रयोग कर रहे हैं। वहीं, अगर लखनऊ का कोई सरकारी कॉलेज किसी मलयालम भाषी छात्रा को केवल उसकी भाषा के कारण सीट न दे, तो यह अनुच्छेद 29(2) का उल्लंघन होगा।

भाषा, लिपि, संस्कृतिअनुच्छेद 29(1): भाषा, लिपि और संस्कृति बनाए रखने का अधिकार

खंडकिसे संरक्षणक्या मिलता है
29(1)भारत या उसके किसी भाग में रहने वाले नागरिकों का कोई भी अनुभाग, जिसकी अपनी विशेष भाषा, लिपि या संस्कृति होउस भाषा, लिपि या संस्कृति को बनाए रखने (संरक्षित करने) का अधिकार
29(2)हर नागरिक (व्यक्ति के रूप में)राज्य द्वारा पोषित या राज्य से सहायता पाने वाली शिक्षा संस्था में केवल धर्म, मूलवंश, जाति, भाषा या इनमें से किसी के आधार पर प्रवेश से इनकार नहीं

29(1) का अर्थ

  • तीन चीज़ें संरक्षित हैं: विशेष भाषा (जैसे उर्दू, कोंकणी, संथाली), विशेष लिपि (जैसे गुरमुखी, ओल चिकी, देवनागरी) और विशेष संस्कृति (रीति-रिवाज, त्योहार, पहनावा, संगीत)।
  • "नागरिकों का अनुभाग", "अल्पसंख्यक" नहीं: अल्पसंख्यक शब्द केवल शीर्षक में है। जो समूह पूरे भारत में बहुसंख्यक है, वह किसी राज्य में छोटा अनुभाग हो सकता है, और हर अनुभाग इसमें शामिल है। अदालतें 29(1) को इसी व्यापक अर्थ में पढ़ती हैं।
  • अपनी भाषा के लिए आंदोलन भी इसमें शामिल: जगदेव सिंह सिद्धांती बनाम प्रताप सिंह दौलता (1965) में कोर्ट ने कहा कि भाषा बचाने के अधिकार में उसकी रक्षा के लिए अभियान चलाने का अधिकार भी है, चुनाव में भी।
  • लिपि भी अहम: डी.ए.वी. कॉलेज बनाम पंजाब राज्य (1971) में कोर्ट ने विश्वविद्यालय का वह नियम रद्द किया जिसमें केवल गुरमुखी लिपि में पंजाबी को माध्यम बनाया गया था, क्योंकि इससे दूसरे अनुभागों का अपनी लिपि बचाने का अधिकार प्रभावित होता था। कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्य के क़ानून के मामले में अल्पसंख्यक होना उस राज्य की आबादी से तय होगा।
  • 29(1) संरक्षण का अधिकार है, वर्चस्व का नहीं: यह किसी समूह को दूसरे समूह की भाषा रोकने की अनुमति नहीं देता।
अनुच्छेद 29 अल्पसंख्यक-वर्गों के हितों का संरक्षण: 29(1) नागरिकों के किसी भी अनुभाग को अपनी विशेष भाषा, लिपि या संस्कृति बनाए रखने का अधिकार; 29(2) राज्य पोषित या सहायता प्राप्त शिक्षा संस्था में धर्म, मूलवंश, जाति या भाषा के आधार पर प्रवेश से इनकार नहीं; लिंग और जन्मस्थान अनुच्छेद 15 में; चंपकम दोराईराजन 1951
अनुच्छेद 29 के दो खंड: संस्कृति बचाने का समूह अधिकार और प्रवेश का व्यक्तिगत अधिकार।

समान प्रवेशअनुच्छेद 29(2): शिक्षा संस्थाओं में प्रवेश से इनकार नहीं

  • कौन-सी संस्थाएँ: केवल वे जो राज्य द्वारा पोषित हैं या राज्य-निधि से सहायता पाती हैं। पूरी तरह निजी, बिना सहायता वाली संस्था 29(2) में नहीं आती।
  • कौन-से आधार: धर्म, मूलवंश, जाति, भाषा, या इनमें से कोई। "केवल" शब्द अहम है: प्रवेश अब भी योग्यता, अंक, आयु या निवास पर निर्भर हो सकता है।
  • 29(2) में नहीं: लिंग और जन्मस्थान। ये अनुच्छेद 15(1) के आधार हैं, जो राज्य के हर भेदभाव पर लागू है। इसलिए सरकारी महिला कॉलेज 29(2) नहीं तोड़ता, और अनुच्छेद 15(3) महिलाओं के लिए विशेष उपबंध की अनुमति भी देता है।
  • यह व्यक्ति का अधिकार है, हर नागरिक का, चाहे बहुसंख्यक हो या अल्पसंख्यक।

चंपकम दोराईराजन और पहला संशोधन

  • मद्रास सरकार के सांप्रदायिक आदेश (Communal G.O.) में मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों की सीटें समुदाय के हिसाब से बाँटी गई थीं (जैसे गैर-ब्राह्मण हिंदू, ब्राह्मण, मुस्लिम, ईसाई के लिए अलग संख्या)।
  • मद्रास राज्य बनाम चंपकम दोराईराजन (9 अप्रैल 1951) में सुप्रीम कोर्ट ने इसे अनुच्छेद 29(2) के तहत रद्द किया: जाति और धर्म के आधार पर सीट से वंचित किया गया था। कोर्ट ने यह भी कहा कि नीति निदेशक तत्व (अनुच्छेद 46) मूल अधिकारों पर हावी नहीं हो सकते।
  • संसद ने पहला संशोधन 1951 किया और अनुच्छेद 15(4) जोड़ा: सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए विशेष उपबंध। बाद में अनुच्छेद 15(5) (2005) ने निजी संस्थाओं में प्रवेश को भी जोड़ा, पर अनुच्छेद 30(1) की अल्पसंख्यक संस्थाओं को छोड़कर।

अनुच्छेद 30 के साथ संतुलन

  • जो अल्पसंख्यक कॉलेज राज्य से सहायता लेता है, वह 29(2) से बँधा है। फिर भी अनुच्छेद 30(1) उसे अपने समुदाय की सेवा करने देता है।
  • सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज बनाम दिल्ली विश्वविद्यालय (1992) में कोर्ट ने संतुलन बनाया: सहायता प्राप्त अल्पसंख्यक कॉलेज लगभग 50% सीटों तक अपने समुदाय के छात्रों को प्राथमिकता दे सकता है, बाक़ी सीटें योग्यता पर सबके लिए खुली रहेंगी।
  • टी.एम.ए. पई फ़ाउंडेशन (2002) में 11 न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि कोई तय अनुपात नहीं: संस्था के प्रकार और स्थानीय ज़रूरत देखकर राज्य ग़ैर-अल्पसंख्यक छात्रों का उचित हिस्सा तय कर सकता है।

अनुच्छेद 29 बनाम 30अनुच्छेद 29 बनाम अनुच्छेद 30: मुख्य अंतर

बिंदुअनुच्छेद 29अनुच्छेद 30
किसके लिएनागरिकों का कोई भी अनुभाग (बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक)केवल अल्पसंख्यक: धार्मिक या भाषाई
"अल्पसंख्यक" शब्द?केवल शीर्षक में, पाठ में नहींहाँ, पाठ में
मुख्य अधिकारभाषा, लिपि या संस्कृति बनाए रखना; भेदभाव के बिना प्रवेशअपनी रुचि की शिक्षा संस्था स्थापित और प्रशासित करना
स्वरूप29(1) समूह का अधिकार; 29(2) व्यक्ति का अधिकारअल्पसंख्यक समुदाय का समूह अधिकार
संबंधसंस्कृति स्कूलों के ज़रिए जीवित रहती हैस्कूल संस्कृति बचाने का साधन हैं
  • दोनों अनुच्छेद जोड़ी की तरह काम करते हैं: 29(1) संस्कृति बचाता है, और 30(1) अल्पसंख्यकों को उसे बचाने का मुख्य साधन देता है, यानी अपने स्कूल और कॉलेज।
  • पर ये स्वतंत्र भी हैं: अनुच्छेद 30 की अल्पसंख्यक संस्था को केवल अपनी भाषा या धर्म पढ़ाना ज़रूरी नहीं। वह सामान्य धर्मनिरपेक्ष शिक्षा दे सकती है (केरल शिक्षा विधेयक, 1958)।
  • अनुच्छेद 15(1) बनाम 29(2): 15(1) राज्य के हर काम पर लागू है और उसमें लिंग और जन्मस्थान हैं; 29(2) केवल सरकारी या सहायता प्राप्त संस्थाओं में प्रवेश के बारे में है, पर उसमें भाषा है, जो 15(1) में नहीं है।
अनुच्छेद 29 बनाम अनुच्छेद 30 का अंतर: 29 नागरिकों के किसी भी अनुभाग के लिए, बहुसंख्यक भी शामिल, भाषा लिपि संस्कृति का संरक्षण; 30 केवल धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए, अपनी रुचि की शिक्षा संस्था स्थापित और प्रशासित करने का अधिकार; सेंट स्टीफ़ेंस 1992 में दोनों का संतुलन
हर अनुच्छेद किसे बचाता है और कौन-सा अधिकार देता है।

अल्पसंख्यक कौनअनुच्छेद 29 और अल्पसंख्यक: भारत में अल्पसंख्यक कौन? (संक्षेप)

  • संविधान "अल्पसंख्यक" की परिभाषा नहीं देता। अनुच्छेद 29 के पाठ में यह शब्द ही नहीं है; अनुच्छेद 30 "धर्म या भाषा पर आधारित" अल्पसंख्यकों की बात करता है।
  • धार्मिक अल्पसंख्यक (राष्ट्रीय सूची): राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 1992 की धारा 2(ग) के तहत केंद्र सरकार इन्हें अधिसूचित करती है। 23 अक्टूबर 1993 को पाँच (मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, पारसी) और 27 जनवरी 2014 को जैन अधिसूचित हुए।
  • अनुच्छेद 30 के लिए सुप्रीम कोर्ट ने टी.एम.ए. पई फ़ाउंडेशन (2002) में कहा कि धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यक राज्यवार गिने जाएँगे।
  • जिन राज्यों में हिंदू और कुछ अन्य समूह संख्या में कम हैं, क्या उन्हें वहाँ अल्पसंख्यक दर्जा मिलना चाहिए, यह अश्विनी कुमार उपाध्याय याचिका का विषय है, जो सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। पूरी चर्चा अनुच्छेद 30 के पेज पर है।
  • भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए अनुच्छेद 350क (प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में) और 350ख (भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए विशेष अधिकारी) भी हैं, जो 7वें संशोधन 1956 से जुड़े, और अनुच्छेद 347 (राज्य की जनता के किसी अनुभाग की भाषा को मान्यता)।

त्वरित दोहराईयाद रखने योग्य मुख्य बातें

  • 29(1): नागरिकों का कोई भी अनुभाग अपनी विशेष भाषा, लिपि या संस्कृति बनाए रख सकता है।
  • पाठ में "नागरिकों का अनुभाग" है, "अल्पसंख्यक" नहीं, इसलिए बहुसंख्यक समूह भी शामिल हैं।
  • 29(2): राज्य पोषित या सहायता प्राप्त संस्थाओं में धर्म, मूलवंश, जाति, भाषा के आधार पर प्रवेश से इनकार नहीं।
  • 29(2) में लिंग या जन्मस्थान नहीं; अनुच्छेद 15(1) में भाषा नहीं।
  • 29(2) के तहत चंपकम दोराईराजन (1951) से पहला संशोधन और अनुच्छेद 15(4) आया।

समयरेखाअनुच्छेद 29: मुख्य तिथियाँ और मुकदमे

वर्षघटना
1950संविधान के साथ अनुच्छेद 29 लागू (26 जनवरी)।
1951चंपकम दोराईराजन (9 अप्रैल): 29(2) के तहत सांप्रदायिक आदेश रद्द; पहले संशोधन से अनुच्छेद 15(4) जुड़ा।
19567वें संशोधन से भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए अनुच्छेद 350क और 350ख।
1958केरल शिक्षा विधेयक संदर्भ: अनुच्छेद 29 और 30 की व्याख्या।
1965जगदेव सिंह सिद्धांती: भाषा बचाने में उसके लिए अभियान का अधिकार शामिल।
1971डी.ए.वी. कॉलेज बनाम पंजाब राज्य: 29(1) में लिपि का संरक्षण।
1992सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज: सहायता प्राप्त अल्पसंख्यक कॉलेज लगभग 50% तक अपने समुदाय को प्राथमिकता दे सकता है।
2002टी.एम.ए. पई (11 न्यायाधीश): अल्पसंख्यक राज्यवार; कोई कठोर अनुपात नहीं।

UPSC · राज्य PSC · न्यायपालिकाअनुच्छेद 29: UPSC परीक्षा कॉर्नर

  • प्रीलिम्स जाल: "अनुच्छेद 29 केवल अल्पसंख्यकों की रक्षा करता है।" ग़लत। यह विशेष भाषा, लिपि या संस्कृति वाले नागरिकों के किसी भी अनुभाग की रक्षा करता है।
  • प्रीलिम्स जाल: "अनुच्छेद 29(2) लिंग के आधार पर प्रवेश से इनकार रोकता है।" ग़लत। इसके आधार धर्म, मूलवंश, जाति और भाषा हैं।
  • प्रीलिम्स तथ्य: अनुच्छेद 29 केवल नागरिकों के लिए है और कभी संशोधित नहीं हुआ।
  • मेन्स (क्लास नोट्स से, 250 शब्द): अल्पसंख्यकों की पहचान के संवैधानिक और क़ानूनी प्रावधान बताइए, और सुप्रीम कोर्ट के मत को ध्यान में रखते हुए बताइए कि राष्ट्रीय या राज्य की जनसंख्या के आधार पर अल्पसंख्यकों की पहचान कहाँ तक उचित है।
  • अभ्यास (150 शब्द): "अनुच्छेद 29 भारत की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता की ढाल है।" मुकदमों के साथ चर्चा करें।

अभ्यास प्रश्नख़ुद को परखें: अनुच्छेद 29

अनुच्छेद 29(2) के तहत राज्य से सहायता पाने वाली शिक्षा संस्था में केवल किन आधारों पर प्रवेश से इनकार नहीं किया जा सकता? 1. धर्म 2. लिंग 3. भाषा 4. जाति

शंका समाधानअक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 29 क्या है?

अनुच्छेद 29 अल्पसंख्यक-वर्गों के हितों का संरक्षण करता है। खंड (1) विशेष भाषा, लिपि या संस्कृति वाले नागरिकों के किसी भी अनुभाग को उसे बनाए रखने देता है। खंड (2) कहता है कि राज्य पोषित या सहायता प्राप्त शिक्षा संस्था में किसी नागरिक को केवल धर्म, मूलवंश, जाति या भाषा के आधार पर प्रवेश से वंचित नहीं किया जा सकता।

क्या अनुच्छेद 29 केवल अल्पसंख्यकों की रक्षा करता है?

नहीं। इसके पाठ में "नागरिकों का कोई अनुभाग" लिखा है, इसलिए यह बहुसंख्यक समुदायों या किसी क्षेत्र में छोटे समूहों, जैसे दूसरे राज्य में रहने वाले मराठी भाषियों, की भी रक्षा करता है। केवल शीर्षक में अल्पसंख्यक शब्द है।

अनुच्छेद 29 और अनुच्छेद 30 में क्या अंतर है?

अनुच्छेद 29 नागरिकों के किसी भी अनुभाग के लिए है और भाषा, लिपि, संस्कृति के साथ 29(2) में समान प्रवेश की रक्षा करता है। अनुच्छेद 30 केवल धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए है और उन्हें अपनी रुचि की शिक्षा संस्थाएँ स्थापित और प्रशासित करने का अधिकार देता है।

क्या अनुच्छेद 29(2) निजी स्कूलों पर लागू है?

केवल तब, जब स्कूल राज्य द्वारा पोषित हो या राज्य-निधि से सहायता पाता हो। बिना सहायता वाला निजी स्कूल 29(2) से बाहर है, हालाँकि दूसरे क़ानून (जैसे ग़ैर-अल्पसंख्यक स्कूलों पर RTE अधिनियम) फिर भी लागू होते हैं।