भाग III ⚖️ मूल अधिकार लागू · कभी संशोधित नहीं · भाग III का अंतिम अनुच्छेद

अनुच्छेद 35: इस भाग के उपबंधों को प्रभावी करने के लिए विधान

एक साँस में उत्तर: भाग III का अंतिम अनुच्छेद 35 कहता है कि केवल संसद, कोई राज्य विधानमंडल नहीं, चार विषयों पर क़ानून बना सकती है (16(3) में नौकरी के लिए निवास, 32(3) में दूसरी अदालतों को रिट की शक्ति, 33 में बलों के अधिकार, और 34 में मार्शल लॉ की क्षतिपूर्ति) और भाग III में घोषित अपराधों की सज़ा तय कर सकती है, जैसे अस्पृश्यता (अनुच्छेद 17) और मानव तस्करी और बलात् श्रम (अनुच्छेद 23)। इससे हर राज्य में मूल अधिकार एक जैसे रहते हैं। अक्सर ख़बरों में रहने वाला अनुच्छेद 35क जम्मू-कश्मीर का अलग प्रावधान था, जो 2019 में ख़त्म हुआ।

मूल पाठअनुच्छेद 35 का आधिकारिक पाठ

हिन्दी · आधिकारिक पाठ

35. इस भाग के उपबंधों को प्रभावी करने के लिए विधान—इस संविधान में किसी बात के होते हुए भी,—

(क) संसद को शक्ति होगी और किसी राज्य के विधान-मंडल को शक्ति नहीं होगी कि वह—

(i) जिन विषयों के लिए अनुच्छेद 16 के खंड (3), अनुच्छेद 32 के खंड (3), अनुच्छेद 33 और अनुच्छेद 34 के अधीन संसद विधि द्वारा उपबंध कर सकेगी उनमें से किसी के लिए, और

(ii) ऐसे कार्यों के लिए दंड विहित करने के लिए, जो इस भाग के अधीन अपराध घोषित किए गए हैं,

विधि बनाए और संसद इस संविधान के प्रारंभ के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र ऐसे कार्यों के लिए, जो उपखंड (ii) में निर्दिष्ट हैं, दंड विहित करने के लिए विधि बनाएगी;

(ख) खंड (क) के उपखंड (i) में निर्दिष्ट विषयों में से किसी से संबंधित या उस खंड के उपखंड (ii) में निर्दिष्ट किसी कार्य के लिए दंड का उपबंध करने वाली कोई प्रवृत्त विधि, जो भारत के राज्यक्षेत्र में इस संविधान के प्रारंभ से ठीक पहले प्रवृत्त थी, उसके निबंधनों के और उन अनुकूलनों और उपांतरणों के, जो अनुच्छेद 372 के अधीन उसमें किए जाएँ, अधीन रहते हुए तब तक प्रवृत्त रहेगी जब तक उसका संसद द्वारा परिवर्तन या निरसन या संशोधन नहीं कर दिया जाता है।

स्पष्टीकरण—इस अनुच्छेद में, "प्रवृत्त विधि" पद का वही अर्थ है जो अनुच्छेद 372 में है।

कभी संशोधित नहीं। अनुच्छेद 35क अनुच्छेद 35 का संशोधन नहीं था; इसे 1954 में राष्ट्रपति के आदेश से केवल जम्मू-कश्मीर के लिए जोड़ा गया था (नीचे देखें)।
In Simple Words / आसान शब्दों में

पूरे देश के लिए एक क़ानून: अगर हर राज्य अस्पृश्यता की अपनी सज़ा बनाए, तो एक राज्य में व्यक्ति को जेल और दूसरे में हल्का जुर्माना हो सकता है। अनुच्छेद 35 यह शक्ति केवल संसद को देता है।

केवल शक्ति नहीं, कर्तव्य भी: संसद "यथाशक्य शीघ्र" सज़ा के क़ानून बनाएगी। उसने अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम, 1955 (अब सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम) बनाकर ऐसा किया।

पुराने क़ानून चलते रहेंगे: इन विषयों पर 1950 से पहले के क़ानून तब तक लागू रहेंगे जब तक संसद उन्हें न बदले (खंड (ख))।

"इस संविधान में किसी बात के होते हुए भी": यह राज्य सूची पर भी हावी है, इसलिए पुलिस और लोक व्यवस्था (राज्य के विषय) के नाम पर भी राज्य अनुच्छेद 33 वाला क़ानून नहीं बना सकते।

🏠 रोज़मर्रा की मिसाल

कई शहरों में खेले जाने वाले क्रिकेट टूर्नामेंट में नो-बॉल और जुर्माने के नियम एक केंद्रीय बोर्ड तय करता है, हर स्टेडियम नहीं। अनुच्छेद 35 भाग III के अपराधों की सज़ा के लिए संसद को वही केंद्रीय बोर्ड बनाता है, ताकि पूरे भारत में नियम एक जैसे रहें।

🇮🇳 असली भारतीय उदाहरण

अगर बिहार या गुजरात का कोई दुकानदार जाति के कारण किसी दलित ग्राहक को सामान बेचने से मना करे, तो दोनों जगह एक ही केंद्रीय क़ानून लगेगा: सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955, जिसमें पहले अपराध पर छह महीने तक जेल और जुर्माना है। अनुच्छेद 35 के कारण कोई राज्य इससे नरम या अलग सज़ा नहीं बना सकता।

35 के तहत बने क़ानूनअनुच्छेद 35: वे विषय और क़ानून जो केवल संसद बना सकती है

विषयकिस बारे मेंसंसद का क़ानून
अनुच्छेद 16(3)किसी राज्य की नौकरियों के लिए निवास की शर्तलोक नियोजन (निवास विषयक अपेक्षा) अधिनियम, 1957 (1974 में समाप्त)
अनुच्छेद 32(3)दूसरी अदालतों को रिट की शक्तिअब तक कोई क़ानून नहीं
अनुच्छेद 33सशस्त्र बलों, पुलिस, आसूचना के अधिकारसेना अधिनियम 1950, पुलिस बल (अधिकार निर्बंधन) अधिनियम 1966
अनुच्छेद 34मार्शल लॉ के बाद क्षतिपूर्तिकोई नहीं (कभी ज़रूरत नहीं पड़ी)
अनुच्छेद 17 का अपराधअस्पृश्यतासिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 (1976 में नाम बदला)
अनुच्छेद 23 का अपराधमानव तस्करी, बेगार, बलात् श्रमअनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम 1956; बंधित श्रम पद्धति (उत्सादन) अधिनियम 1976
अनुच्छेद 35: केवल संसद अनुच्छेद 16(3), 32(3), 33 और 34 के विषयों पर और भाग III के अपराधों की सज़ा पर क़ानून बनाएगी, राज्य विधानमंडल नहीं; सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम 1955, अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम 1956, बंधुआ मज़दूरी उन्मूलन अधिनियम 1976; अनुच्छेद 35क 1954 से 2019 तक
अनुच्छेद 35 के तहत केवल संसद किन विषयों पर क़ानून बना सकती है, और उसके बनाए क़ानून।

अनुच्छेद 35क की कहानीअनुच्छेद 35क क्या था? जम्मू-कश्मीर के स्थायी निवासी (1954-2019)

  • मुख्य पाठ में नहीं: अनुच्छेद 35क संसद ने अनुच्छेद 368 के तहत कभी पारित नहीं किया। इसे राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने 14 मई 1954 को अनुच्छेद 370 के तहत संविधान (जम्मू-कश्मीर पर लागू) आदेश, 1954 से जोड़ा। यह छपे संविधानों में केवल परिशिष्ट में दिखता था।
  • यह क्या करता था: यह जम्मू-कश्मीर के उन क़ानूनों को बचाता था जो "स्थायी निवासी" तय करते थे और उन्हें राज्य की नौकरियों, ज़मीन ख़रीदने, राज्य में बसने और छात्रवृत्ति में विशेष अधिकार देते थे, भले ही इनसे दूसरे भारतीय नागरिकों के मूल अधिकार टूटें।
  • विवाद क्यों था: बाहर के लोग (और कई वर्षों तक बाहरी व्यक्ति से विवाह करने वाली महिलाएँ) संपत्ति नहीं ख़रीद सकते थे या राज्य की नौकरी नहीं पा सकते थे; 1947 से जम्मू-कश्मीर में बसे पश्चिमी पाकिस्तान के शरणार्थी विधानसभा चुनाव में वोट नहीं दे सकते थे।
  • कैसे ख़त्म हुआ: 5 अगस्त 2019 को राष्ट्रपति ने C.O. 272 जारी कर पूरा संविधान जम्मू-कश्मीर पर लागू किया, और अनुच्छेद 370 निष्क्रिय हो गया। अनुच्छेद 35क उसी के साथ ख़त्म हुआ। जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 से दो केंद्र शासित प्रदेश बने।
  • सुप्रीम कोर्ट: इन री आर्टिकल 370 (11 दिसंबर 2023, पाँच न्यायाधीश) में अदालत ने 2019 के फ़ैसलों को सही माना।

त्वरित दोहराईयाद रखने योग्य मुख्य बातें

  • अनुच्छेद 35 भाग III का अंतिम अनुच्छेद है।
  • अनुच्छेद 16(3), 32(3), 33 और 34 पर केवल संसद क़ानून बनाती है।
  • भाग III के अपराधों (अनुच्छेद 17, 23) की सज़ा केवल संसद तय करती है।
  • इन विषयों पर 1950 से पहले के क़ानून संसद के बदलने तक चलते रहेंगे।
  • अनुच्छेद 35क (जम्मू-कश्मीर, 1954 का राष्ट्रपति आदेश) 5 अगस्त 2019 को ख़त्म हुआ।

समयरेखाअनुच्छेद 35 और 35क: मुख्य तिथियाँ

वर्षघटना
1950संविधान के साथ अनुच्छेद 35 लागू।
1954राष्ट्रपति के आदेश से जम्मू-कश्मीर के लिए अनुच्छेद 35क (14 मई)।
1955अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम पारित।
1976नाम सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम; बंधुआ श्रम अधिनियम पारित।
2019C.O. 272 से अनुच्छेद 35क ख़त्म (5 अगस्त)।
2023इन री आर्टिकल 370: सुप्रीम कोर्ट ने 2019 के बदलाव सही माने (11 दिसंबर)।

UPSC · राज्य PSC · न्यायपालिकाअनुच्छेद 35: UPSC परीक्षा कॉर्नर

  • प्रीलिम्स जाल: "अनुच्छेद 35क संविधान संशोधन से जोड़ा गया।" ग़लत। यह 1954 में अनुच्छेद 370 के तहत राष्ट्रपति के आदेश से आया।
  • प्रीलिम्स तथ्य: अनुच्छेद 35 के तहत संसद की शक्ति राज्य सूची पर भी हावी है ("इस संविधान में किसी बात के होते हुए भी")।

अभ्यास प्रश्नख़ुद को परखें: अनुच्छेद 35

अनुच्छेद 35 के तहत अस्पृश्यता के आचरण के लिए दंड विहित करने की शक्ति किसके पास है?

शंका समाधानअक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 35 क्या है?

अनुच्छेद 35 संसद को, राज्यों को नहीं, अनुच्छेद 16(3), 32(3), 33 और 34 के विषयों पर क़ानून बनाने और भाग III में घोषित अपराधों, जैसे अस्पृश्यता, की सज़ा तय करने की शक्ति देता है।

क्या अनुच्छेद 35क अब भी लागू है?

नहीं। अनुच्छेद 35क केवल जम्मू-कश्मीर पर लागू था और 5 अगस्त 2019 को ख़त्म हुआ, जब पूरा संविधान जम्मू-कश्मीर पर लागू किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 2023 में इसे सही माना।