मूल पाठअनुच्छेद 26 का आधिकारिक पाठ
26. धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता—
लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य के अधीन रहते हुए, प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय या उसके किसी अनुभाग को—
(क) धार्मिक और पूर्त प्रयोजनों के लिए संस्थाओं की स्थापना और पोषण का,
(ख) अपने धर्म विषयक कार्यों का प्रबंध करने का,
(ग) जंगम और स्थावर संपत्ति के अर्जन और स्वामित्व का, और
(घ) ऐसी संपत्ति का विधि के अनुसार प्रशासन करने का,
अधिकार होगा।
अनुच्छेद 26 अधिकार किसी एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि धार्मिक संप्रदाय (समान आस्था, संगठन और नाम वाला समूह) या उसके अनुभाग को देता है।
समूह धार्मिक और परोपकारी काम के लिए संस्थाएँ बना और चला सकता है।
वह अपने धार्मिक मामले ख़ुद तय कर सकता है, जैसे अनुष्ठान और पूजा के तरीक़े।
वह संपत्ति रख और ख़रीद सकता है, पर उसका प्रशासन क़ानून के अनुसार करना होगा; राज्य हिसाब-किताब जैसे लौकिक पक्ष का नियमन कर सकता है।
यह सब लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य के अधीन है।
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एक क्रिकेट क्लब सोचिए। क्लब अपनी टीम के नियम, वर्दी और मैच की परंपराएँ ख़ुद तय करता है (अपने कार्य)। वह मैदान और पवेलियन का मालिक हो सकता है। पर उसके हिसाब की जाँच देश के क़ानून से होती है, और वह हाईवे रोककर मैच नहीं कर सकता। अनुच्छेद 26 धार्मिक समूह को सीमाओं के भीतर ऐसा ही स्व-प्रबंध देता है।
🇮🇳 असली भारतीय उदाहरण
शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी पंजाब में सिख गुरुद्वारा अधिनियम 1925 के तहत कई गुरुद्वारों का प्रबंध करती है। तमिलनाडु में हिंदू मंदिरों की देखरेख राज्य के HR&CE अधिनियम से, और वक़्फ़ संपत्तियों की वक़्फ़ क़ानून से होती है। हर समुदाय अपने अनुष्ठान ख़ुद तय करता है, जबकि क़ानून पैसे और संपत्ति के पक्ष पर नज़र रखता है।
चार अधिकारअनुच्छेद 26: धार्मिक संप्रदायों के चार अधिकार
| खंड | संप्रदाय का अधिकार | उदाहरण |
|---|---|---|
| 26(क) | धार्मिक और पूर्त (परोपकारी) प्रयोजनों के लिए संस्थाएँ बनाना और चलाना | मठ, गुरुद्वारा, चर्च का अस्पताल, वक़्फ़ का अनाथालय |
| 26(ख) | धर्म विषयक अपने कार्यों का प्रबंध करना | अनुष्ठान, उत्सव और पूजा के तरीक़े तय करना |
| 26(ग) | चल और अचल संपत्ति का अर्जन और स्वामित्व | नए उपासना स्थल के लिए ज़मीन ख़रीदना |
| 26(घ) | ऐसी संपत्ति का विधि के अनुसार प्रशासन | राज्य के धर्मादा या वक़्फ़ क़ानूनों के तहत मंदिर या वक़्फ़ संपत्ति चलाना |
- ये अधिकार हर धार्मिक संप्रदाय या उसके किसी अनुभाग को हैं। नोट्स में "व्यक्ति" लिखा है; व्यक्ति की स्वतंत्रता अनुच्छेद 25 में है, जबकि अनुच्छेद 26 सामूहिक अधिकार है।
- अनुच्छेद 26 सभी धर्मों पर लागू है, बहुसंख्यक हों या अल्पसंख्यक।
- "विधि के अनुसार" (26(घ)): रतिलाल पानाचंद गांधी बनाम बंबई राज्य (1954) में कोर्ट ने कहा कि राज्य धार्मिक संपत्ति के प्रशासन का नियमन कर सकता है, पर प्रशासन का अधिकार संप्रदाय से छीनकर किसी दूसरी संस्था को नहीं दे सकता।
अनुच्छेद 25 बनाम अनुच्छेद 26
| बिंदु | अनुच्छेद 25 | अनुच्छेद 26 |
|---|---|---|
| अधिकार किसका | हर व्यक्ति (सभी व्यक्ति) | हर धार्मिक संप्रदाय या उसका अनुभाग |
| प्रकृति | अंतःकरण की स्वतंत्रता; मानना, आचरण, प्रचार | संस्था, कार्य और संपत्ति के प्रबंध का सामूहिक अधिकार |
| सीमाएँ | लोक व्यवस्था, सदाचार, स्वास्थ्य और भाग III के अन्य उपबंध | लोक व्यवस्था, सदाचार, स्वास्थ्य |
| राज्य की सुधार शक्ति | खंड (2): लौकिक गतिविधि, समाज सुधार, मंदिर प्रवेश | संपत्ति का प्रशासन "विधि के अनुसार" |

संप्रदाय क्या हैअनुच्छेद 26: धार्मिक संप्रदाय क्या है? शिरूर मठ की कसौटी
- संविधान "धार्मिक संप्रदाय" की परिभाषा नहीं देता। कमिश्नर, हिंदू रिलीजियस एंडोमेंट्स, मद्रास बनाम श्री लक्ष्मींद्र तीर्थ स्वामियार, श्री शिरूर मठ (1954, सात न्यायाधीश) में कोर्ट ने इसका अर्थ ऐसे लोगों का समूह माना जिनकी समान आस्था-प्रणाली, समान संगठन और विशिष्ट नाम हो।
- एस.पी. मित्तल बनाम भारत संघ (1983) ने इसे तीन हिस्सों की कसौटी के रूप में रखा: (1) समान आस्था, (2) समान संगठन, (3) विशिष्ट नाम। इस कसौटी पर ऑरोबिंदो सोसाइटी और ऑरोविल को धार्मिक संप्रदाय नहीं माना गया।
- जिन समूहों को संप्रदाय माना गया उनमें शिरूर मठ जैसे मठ के अनुयायी, आनंद मार्ग (1983) और रामकृष्ण मिशन (ब्रह्मचारी सिद्धेश्वर शाई बनाम पश्चिम बंगाल राज्य, 1995) हैं; कोर्ट ने यह भी कहा कि रामकृष्ण मिशन अनुच्छेद 30 के लिए अलग गैर-हिंदू अल्पसंख्यक नहीं है।
- सबरीमला केस (2018) में बहुमत ने कहा कि भगवान अय्यप्पा के भक्त अलग संप्रदाय नहीं हैं; असहमति वाली राय ने कहा कि हैं।
अनिवार्य प्रथाएँअनुच्छेद 26 और अनिवार्य धार्मिक प्रथा का सिद्धांत
- शिरूर मठ (1954): "धर्म विषयक कार्यों" में वे अनुष्ठान, संस्कार और पूजा के तरीक़े आते हैं जो धर्म का अनिवार्य हिस्सा हैं, और क्या अनिवार्य है यह मुख्य रूप से उसी धर्म के सिद्धांतों से तय होगा।
- दरगाह कमेटी, अजमेर बनाम सैयद हुसैन अली (1961): केवल वही प्रथाएँ सुरक्षित हैं जो धर्म का अनिवार्य और अभिन्न अंग हैं; पूरी तरह लौकिक प्रथाएँ या अंधविश्वास नहीं।
- श्री वेंकटरमण देवारु बनाम मैसूर राज्य (1958): 26(ख) में संप्रदाय का अधिकार 25(2)(ख) के मंदिर प्रवेश क़ानून के अधीन है, इसलिए संप्रदाय का मंदिर सभी हिंदुओं के लिए खुलना होगा; पर कुछ विशेष अनुष्ठान केवल अपने सदस्यों तक सीमित रखे जा सकते हैं।
- शेषम्मल बनाम तमिलनाडु राज्य (1972): मंदिर के पुजारी की नियुक्ति लौकिक काम है, इसलिए वंशानुगत पुजारी प्रथा ख़त्म करना वैध था; पर पुजारी को मंदिर के अनुष्ठानों का पालन करना ही होगा।
| अनिवार्य धार्मिक प्रथा | गैर-अनिवार्य प्रथा |
|---|---|
| आस्था का मूल हिस्सा: इसके बिना धर्म का मूल स्वरूप बदल जाएगा | ऐसी रीति या परंपरा जो मूल का हिस्सा नहीं |
| सुरक्षित; राज्य सामान्यतः दख़ल नहीं दे सकता | लोक व्यवस्था, सदाचार, स्वास्थ्य या सुधार के लिए राज्य नियमन कर सकता है |
| उदाहरण: नमाज़ पढ़ना अनिवार्य है (इस्माइल फ़ारूक़ी, 1994) | उदाहरण: किसी ख़ास मस्जिद में ही नमाज़, जब तक उसका विशेष महत्व न हो (वही केस) |
| मुख्य रूप से धर्म के अपने ग्रंथों और मान्यताओं से तय (शिरूर मठ, 1954) | उदाहरण: आनंद मार्गियों का सार्वजनिक तांडव नृत्य (जगदीश्वरानंद, 1983) |
- सिद्धांत पर बहस: समर्थक कहते हैं कि इससे हानिकारक रीतियाँ धर्म के पीछे नहीं छिप पातीं। अलग-अलग पक्षों के आलोचक कहते हैं कि धर्मशास्त्र तय करना न्यायाधीशों का काम नहीं, और आसान कसौटी बस यह पूछे कि प्रथा लोक व्यवस्था, सदाचार, स्वास्थ्य या दूसरे अधिकारों को नुक़सान पहुँचाती है या नहीं।
सबरीमला केसअनुच्छेद 26 और सबरीमला केस: इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन (2018)
- केरल के सबरीमला मंदिर में भगवान अय्यप्पा की पूजा नैष्ठिक ब्रह्मचारी (आजीवन ब्रह्मचारी) के रूप में होती है। परंपरा से 10 से 50 वर्ष की महिलाओं का प्रवेश वर्जित था।
- इस रोक को क़ानूनी रूप केरल हिंदू सार्वजनिक उपासना स्थल (प्रवेश प्राधिकार) नियम, 1965 के नियम 3(ख) से मिला, जो 1965 के केरल अधिनियम के तहत बने थे।
- 1991: केरल हाई कोर्ट ने रोक सही ठहराई (एस. महेंद्रन बनाम सचिव, त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड)।
- 2006: इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दायर की। 2017 में यह संविधान पीठ को गई।
28 सितंबर 2018 का फ़ैसला (5 न्यायाधीश, 4:1)
- बहुमत (मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति ए.एम. खानविलकर; न्यायमूर्ति आर.एफ़. नरीमन और डी.वाई. चंद्रचूड़ की सहमति): अय्यप्पा के भक्त अलग संप्रदाय नहीं; महिलाओं को रोकना अनिवार्य प्रथा नहीं; नियम 3(ख) अवैध; यह अनुच्छेद 25(1) में महिलाओं के उपासना के अधिकार का उल्लंघन है। अनुच्छेद 26 समूह को अपने कार्यों का प्रबंध करने देता है, पर यहाँ उससे व्यक्ति का उपासना का अधिकार नहीं रोका जा सकता। न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने अनुच्छेद 14, 15 और 17 का भी सहारा लिया।
- असहमति (न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा): अदालतों को धार्मिक प्रथाओं को तार्किकता की कसौटी पर नहीं परखना चाहिए; देवता के स्वरूप और भक्तों की आस्था का सम्मान होना चाहिए; भक्त एक संप्रदाय हैं और यह प्रथा अनुच्छेद 25 और 26 में सुरक्षित है।
पुनर्विचार और बड़ी पीठ
- 14 नवंबर 2019: पाँच न्यायाधीशों की पीठ ने 3:2 से पुनर्विचार याचिकाएँ लंबित रखीं और बड़े सवाल बड़ी पीठ को भेजे: अनिवार्य प्रथा का दायरा, अनुच्छेद 25 और 26 का संबंध, और अदालतें धार्मिक प्रथाओं की कहाँ तक समीक्षा कर सकती हैं। 2018 के फ़ैसले पर रोक नहीं लगी।
- फ़रवरी 2020: नौ न्यायाधीशों की पीठ ने सात सवाल तय किए। इससे जुड़े मुद्दे (मस्जिदों में महिलाओं का प्रवेश, दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला ख़तना, और समुदाय से बाहर विवाह करने वाली पारसी महिलाएँ) भी साथ हैं। पिछली सत्यापित सुनवाई तक संदर्भ लंबित था।
- जुड़े मामले: बॉम्बे हाई कोर्ट ने हाजी अली दरगाह के भीतरी हिस्से में महिलाओं को प्रवेश दिया (2016), और शनि शिंगणापुर मामले (2016) में कहा कि जहाँ पुरुष जा सकते हैं वहाँ महिलाओं को भी जाने का अधिकार है; दोनों जगह प्रबंधन ने बाद में प्रवेश दिया।

परीक्षा दृष्टिअनुच्छेद 26 पर बहस: धार्मिक स्वायत्तता और लैंगिक समानता (परीक्षा दृष्टि)
- संविधान धार्मिक समूहों को व्यापक स्वतंत्रता देता है: उपासना, वित्त, संस्थाएँ और प्रशासन। इससे कभी-कभी उपासना स्थलों पर लैंगिक समानता के सवाल उठते हैं।
| अदालतों से सुधार के पक्ष में अक्सर दिए जाने वाले तर्क | संप्रदाय की स्वायत्तता के पक्ष में अक्सर दिए जाने वाले तर्क |
|---|---|
| अनुच्छेद 14, 15 और 25(1) हर व्यक्ति के उपासना के समान अधिकार की रक्षा करते हैं | अनुच्छेद 26(ख) समूह को अपने धार्मिक मामले ख़ुद तय करने देता है |
| गैर-अनिवार्य रीतियों का नियमन हो सकता है (अनुच्छेद 25(2)(ख)) | भक्तों की आस्था और देवता का स्वरूप तर्क के विषय नहीं |
| संविधान परिवर्तनकारी है और सबकी गरिमा चाहता है | समुदाय के भीतर से स्वीकार हुआ बदलाव अदालत के आदेश से ज़्यादा टिकाऊ होता है |
आगे की राह (परीक्षा की दृष्टि से)
- परीक्षा उत्तरों में अक्सर कहा जाता है: सरकार और समाज संवाद को बढ़ावा दें, ताकि समुदाय ख़ुद प्रथाओं में सुधार करें, जैसा हाजी अली और शनि शिंगणापुर में हुआ।
- जहाँ कोई प्रथा दूसरों के अधिकारों का उल्लंघन करे या लोक व्यवस्था बिगाड़े, वहाँ राज्य के पास अनुच्छेद 25(2) और 26 के तहत क़दम उठाने की शक्ति है; अदालतें देखती हैं कि क़दम युक्तियुक्त हो।
- अनिवार्य प्रथा और अनुच्छेद 25 व 26 पर नौ न्यायाधीशों की पीठ का साफ़ जवाब आगे के मामलों का रास्ता दिखाएगा।
त्वरित दोहराईयाद रखने योग्य मुख्य बातें
- अनुच्छेद 26 अधिकार व्यक्तियों को नहीं, धार्मिक संप्रदाय या उसके अनुभाग को देता है।
- चार अधिकार: संस्थाएँ, धर्म विषयक अपने कार्य, संपत्ति का अर्जन और स्वामित्व, विधि के अनुसार प्रशासन।
- सीमाएँ: केवल लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य ("इस भाग के अन्य उपबंध" नहीं)।
- संप्रदाय की कसौटी: समान आस्था, समान संगठन, विशिष्ट नाम (शिरूर मठ 1954, एस.पी. मित्तल 1983)।
- सबरीमला (2018, 4:1): महिलाओं पर रोक रद्द; बड़े सवाल नौ न्यायाधीशों की पीठ के सामने लंबित।
समयरेखाअनुच्छेद 26 और सबरीमला केस: मुख्य तिथियाँ
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1954 | शिरूर मठ: संप्रदाय और अनिवार्य प्रथा का अर्थ; रतिलाल गांधी केस में 26(घ)। |
| 1958 | वेंकटरमण देवारु: 26(ख) पर 25(2)(ख) का मंदिर प्रवेश क़ानून भारी। |
| 1961 | दरगाह कमेटी, अजमेर: केवल अनिवार्य और अभिन्न प्रथाएँ सुरक्षित। |
| 1965 | केरल प्रवेश नियम; नियम 3(ख) से परंपरा के आधार पर महिलाओं को रोकने की छूट। |
| 1983 | एस.पी. मित्तल: संप्रदाय की तीन हिस्सों वाली कसौटी; ऑरोविल संप्रदाय नहीं। |
| 1991 | केरल हाई कोर्ट ने सबरीमला की रोक सही ठहराई। |
| 2006 | इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन की सुप्रीम कोर्ट में रिट। |
| 2016 | बॉम्बे हाई कोर्ट: हाजी अली दरगाह और शनि शिंगणापुर में महिलाओं का प्रवेश। |
| 2018 | सबरीमला फ़ैसला (28 सितंबर, 4:1): नियम 3(ख) रद्द। |
| 2019 | पुनर्विचार पीठ (14 नवंबर, 3:2) ने बड़े सवाल बड़ी पीठ को भेजे। |
| 2020 | नौ न्यायाधीशों की पीठ ने सात सवाल तय किए; लंबित। |
UPSC · राज्य PSC · न्यायपालिकाअनुच्छेद 26: UPSC परीक्षा कॉर्नर
- प्रीलिम्स जाल: "अनुच्छेद 26 के अधिकार हर व्यक्ति को मिलते हैं।" ग़लत। ये धार्मिक संप्रदायों या उनके अनुभागों के हैं।
- प्रीलिम्स जाल: "अनुच्छेद 25 की तरह अनुच्छेद 26 भी भाग III के अन्य उपबंधों के अधीन है।" ग़लत। इसके पाठ में केवल लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य हैं।
- प्रीलिम्स तथ्य: सबरीमला फ़ैसला (2018) 4:1 से था; न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा अकेली असहमत थीं।
- अभ्यास मेन्स (250 शब्द, कक्षा नोट्स पर आधारित): संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता उपासना, वित्त और प्रशासन तक फैली है। सबरीमला केस के संदर्भ में अनिवार्य धार्मिक प्रथा के सिद्धांत और संप्रदाय की स्वायत्तता व लैंगिक समानता के बीच संतुलन की चर्चा कीजिए।
अभ्यास प्रश्नख़ुद को परखें: अनुच्छेद 26
अनुच्छेद 26 के अधिकार स्पष्ट रूप से इनमें से किसके अधीन हैं? 1. लोक व्यवस्था 2. सदाचार 3. स्वास्थ्य 4. भाग III के अन्य उपबंध
शंका समाधानअक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 26 क्या है?
अनुच्छेद 26 हर धार्मिक संप्रदाय या उसके अनुभाग को धार्मिक और परोपकारी संस्थाएँ बनाने और चलाने, धर्म विषयक अपने कार्यों का प्रबंध करने, संपत्ति रखने और ख़रीदने, और उसका क़ानून के अनुसार प्रशासन करने का अधिकार देता है, लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य के अधीन।
अनुच्छेद 25 और अनुच्छेद 26 में क्या अंतर है?
अनुच्छेद 25 सभी व्यक्तियों का अंतःकरण और धर्म को मानने, आचरण और प्रचार करने का व्यक्तिगत अधिकार है। अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदायों का अपनी संस्थाओं, धार्मिक कार्यों और संपत्ति के प्रबंध का सामूहिक अधिकार है।
अनिवार्य धार्मिक प्रथा का सिद्धांत क्या है?
यह शिरूर मठ केस (1954) से सुप्रीम कोर्ट की बनाई कसौटी है: जो प्रथाएँ धर्म का अनिवार्य और अभिन्न अंग हैं उन्हें मज़बूत सुरक्षा मिलती है, जबकि गैर-अनिवार्य प्रथाओं का राज्य नियमन कर सकता है।
सबरीमला केस की वर्तमान स्थिति क्या है?
सभी उम्र की महिलाओं को प्रवेश देने वाले 28 सितंबर 2018 के फ़ैसले पर रोक नहीं लगी। 14 नवंबर 2019 को बड़े सवाल बड़ी पीठ को भेजे गए, और 2020 में नौ न्यायाधीशों की पीठ ने उन्हें तय किया। पिछली सत्यापित सुनवाई तक संदर्भ लंबित था।