मूल पाठअनुच्छेद 17 का आधिकारिक पाठ
17. अस्पृश्यता का अंत—"अस्पृश्यता" का अंत किया जाता है और उसका किसी भी रूप में आचरण निषिद्ध किया जाता है। "अस्पृश्यता" से उपजी किसी निर्योग्यता को लागू करना अपराध होगा जो विधि के अनुसार दंडनीय होगा।
अनुच्छेद 17 एक पूर्ण (absolute) अधिकार है: इसमें कोई अपवाद नहीं और कोई "युक्तियुक्त निर्बंधन" नहीं। कोई भी धार्मिक प्रथा का हवाला देकर अस्पृश्यता को सही नहीं ठहरा सकता।
यह राज्य और निजी व्यक्तियों दोनों पर लागू होता है। कोई दुकानदार, मंदिर ट्रस्ट या ग्राम पंचायत अगर छुआछूत करे तो वह संविधान तोड़ता है।
संविधान में "अस्पृश्यता" को परिभाषित नहीं किया गया है। न्यायालय इसे ऐतिहासिक अर्थ में पढ़ते हैं: जाति आधारित बहिष्कार, न कि किसी बीमार व्यक्ति को शाब्दिक रूप से "न छूना" (देवराजिया बनाम पद्मन्ना, मैसूर HC, 1958)।
अस्पृश्यता का आचरण अपराध है। संसद ने पहले अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम, 1955 बनाया, जिसका नाम 1976 में बदलकर नागरिक अधिकार संरक्षण (PCR) अधिनियम किया गया।
🏠 रोज़मर्रा की मिसाल
अनुच्छेद 17 को पूरे देश में खींची एक लाल रेखा समझिए। ज़्यादातर अधिकारों की बाड़ में एक दरवाज़ा होता है ("युक्तियुक्त निर्बंधन")। इसमें कोई दरवाज़ा ही नहीं: कोई सरकार, समुदाय या प्रथा इसे पार नहीं कर सकती।
🇮🇳 असली भारतीय उदाहरण
गाँव की चाय की दुकान पर दलित ग्राहकों को अलग रखे गिलास में चाय दी जाती है ("दो-गिलास प्रथा")। यह अस्पृश्यता है। दुकानदार पर PCR अधिनियम के तहत मुक़दमा चल सकता है, और क्योंकि पीड़ित अनुसूचित जाति के हैं, SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत भी, जिसमें अग्रिम ज़मानत वर्जित है।
अधिकार की प्रकृतिअनुच्छेद 17: अस्पृश्यता के अंत का अर्थ और प्रकृति
- पूर्ण: अनुच्छेद 19 के विपरीत इसमें कोई युक्तियुक्त निर्बंधन नहीं।
- क्षैतिज: राज्य के साथ-साथ निजी व्यक्तियों पर भी लागू। पीपुल्स यूनियन फ़ॉर डेमोक्रेटिक राइट्स बनाम भारत संघ (एशियाड मज़दूर केस, 1982) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 17, 23 और 24 निजी व्यक्तियों पर भी लागू होते हैं, और उल्लंघन होने पर राज्य को कार्रवाई करनी होगी।
- संविधान या PCR अधिनियम में परिभाषित नहीं। इसका अर्थ है कुछ जातियों में जन्म के कारण लोगों पर थोपी गई सामाजिक निर्योग्यताएँ। इसी ऐतिहासिक अर्थ को दिखाने के लिए शब्द को उद्धरण चिह्नों में रखा गया है।
- जुड़े अनुच्छेद: अनुच्छेद 15(2) (दुकानें, कुएँ, तालाब, सड़कें), अनुच्छेद 23 (बेगार निषेध), अनुच्छेद 25(2)(ख) (सभी हिंदुओं के लिए मंदिर प्रवेश), अनुच्छेद 35 (दंड क़ानून केवल संसद बनाएगी), अनुच्छेद 46 (SC/ST को सामाजिक अन्याय से संरक्षण) और अनुच्छेद 338 (राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग)।
- कर्नाटक राज्य बनाम अप्पा बालू इंगले (1993) में सुप्रीम कोर्ट ने अस्पृश्यता को दासता का अप्रत्यक्ष रूप कहा और अदालतों से PCR मामलों को गंभीरता से लेने को कहा।
1955 → 1976नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम 1955: अस्पृश्यता के अपराध और सज़ा
अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम, 1955 को 1976 में संशोधित कर नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम नाम दिया गया और सज़ा कड़ी की गई। अस्पृश्यता के आधार पर ये कार्य अपराध हैं:
- किसी व्यक्ति को सार्वजनिक पूजा स्थल में प्रवेश या पूजा करने से रोकना।
- दुकान, रेस्तराँ, होटल, अस्पताल, सार्वजनिक मनोरंजन स्थल या वहाँ रखे बर्तनों के उपयोग से रोकना।
- कुएँ, तालाब, नल, स्नान घाट, सड़क, श्मशान या किसी सार्वजनिक स्थान के उपयोग से रोकना।
- अस्पताल, औषधालय, शिक्षण संस्थान या छात्रावास में प्रवेश न देना।
- सामान बेचने या सेवा देने से इनकार करना।
- अस्पृश्यता के आधार पर अनुसूचित जाति के व्यक्ति का अपमान करना, या प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से अस्पृश्यता का प्रचार या उसे सही ठहराना।
- इस आधार पर किसी से मैला ढोने, झाड़ू लगाने या मृत पशु हटाने का काम करवाना, या इन अधिकारों का उपयोग करने पर किसी का सामाजिक बहिष्कार करना।
सज़ा की सीढ़ी
| दोषसिद्धि | कारावास | जुर्माना (भी) |
|---|---|---|
| पहली बार अपराध | 1 माह से 6 माह | ₹100 से ₹500 |
| दूसरी बार अपराध | 6 माह से 1 वर्ष | ₹200 से ₹500 |
| तीसरी बार या उसके बाद | 1 वर्ष से 2 वर्ष | ₹500 से ₹1,000 |

कड़ा क़ानून, 1989SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989: दूसरा क़ानून क्यों ज़रूरी था
जो चुनौतियाँ बनी रहीं (नोट्स से)
- PCR अधिनियम की सज़ाएँ हल्की थीं, इसलिए डर पैदा नहीं हुआ।
- गाँवों और शहरों में भी छुआछूत छिपे रूपों में जारी रही: अलग बर्तन, मंदिर प्रवेश से इनकार, बारात पर रोक, सामाजिक बहिष्कार।
- डर, ग़रीबी और सामाजिक दबाव के कारण पीड़ित कम ही शिकायत करते थे, और दोषसिद्धि दर कम रही।
- अनुच्छेद 17 सबकी रक्षा करता है, लेकिन व्यवहार में पीड़ित ज़्यादातर अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग थे। उन पर केंद्रित क़ानून की ज़रूरत थी।
इसलिए संसद ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 बनाया:
- सज़ा सामान्यतः 6 माह से 5 वर्ष और जुर्माना, गंभीर अपराधों में इससे कहीं अधिक।
- अग्रिम ज़मानत नहीं (धारा 18)।
- 2015 संशोधन (26 जनवरी 2016 से लागू) ने सिर मुंडवाना, जूते-चप्पल की माला पहनाना, सिंचाई सुविधा से रोकना, मृत पशु उठवाना और सामाजिक या आर्थिक बहिष्कार जैसे नए अपराध जोड़े; अनन्य विशेष न्यायालय बनाए, 60 दिन में आरोप-पत्र और जहाँ संभव हो दो माह में सुनवाई।
- अदालत में उतार-चढ़ाव: सुभाष काशीनाथ महाजन (20 मार्च 2018) ने अग्रिम ज़मानत और गिरफ़्तारी से पहले प्रारंभिक जाँच की अनुमति दी। विरोध के बाद संसद ने अगस्त 2018 में धारा 18क जोड़कर इसे पलटा, और पृथ्वी राज चौहान बनाम भारत संघ (10 फ़रवरी 2020) में सुप्रीम कोर्ट ने धारा 18क को वैध ठहराया, यह कहते हुए कि अदालतें केवल वहीं अग्रिम ज़मानत दे सकती हैं जहाँ प्रथम दृष्टया मामला न बनता हो।
- हितेश वर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य (2020): अपमान तब अपराध है जब वह पीड़ित की जाति के कारण और सार्वजनिक दृष्टि में किया गया हो।
| बिंदु | नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 | SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 |
|---|---|---|
| किसकी रक्षा | अस्पृश्यता झेलने वाला कोई भी व्यक्ति | अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्य |
| अपराधी | कोई भी व्यक्ति | जो SC/ST का सदस्य नहीं है |
| सज़ा | पहले अपराध पर 6 माह तक, बढ़कर 2 वर्ष तक; हमेशा जुर्माने के साथ | सामान्यतः 6 माह से 5 वर्ष और जुर्माना; गंभीरतम अपराधों में आजीवन कारावास या मृत्युदंड |
| अग्रिम ज़मानत | उपलब्ध | वर्जित (धारा 18, और 2018 में जोड़ी गई 18क) |
| न्यायालय | सामान्य न्यायालय; अपराध संज्ञेय | अनन्य विशेष न्यायालय और विशेष लोक अभियोजक (2015 संशोधन) |

अक्टूबर 2026 तक अद्यतनआज की अस्पृश्यता: हाथ से मैला उठाना, जेलों में जाति और हाल के फ़ैसले
- हाथ से मैला उठाना अस्पृश्यता का सबसे कठोर रूप है। हाथ से मैला उठाने वाले कर्मियों के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम, 2013 इसे प्रतिबंधित करता है। सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन (2014) में कोर्ट ने सीवर मौतों पर ₹10 लाख मुआवज़े का आदेश दिया; डॉ. बलराम सिंह बनाम भारत संघ (20 अक्टूबर 2023) में इसे बढ़ाकर ₹30 लाख किया और कहा कि सरकारें यह प्रथा ख़त्म करें। सीवर और सेप्टिक टैंक में मौतें अब भी दर्ज होती हैं, और केंद्र की NAMASTE योजना (2023) मशीनीकृत सफ़ाई का लक्ष्य रखती है।
- जेलों में जाति (3 अक्टूबर 2024): सुकन्या शांता बनाम भारत संघ में सुप्रीम कोर्ट ने जेल मैनुअल के वे नियम रद्द किए जो जाति के आधार पर सफ़ाई और झाड़ू का काम देते थे, और इन्हें अनुच्छेद 14, 15, 17, 21 और 23 का उल्लंघन कहा। राज्यों को अपने मैनुअल बदलने पड़े।
- मंदिर प्रवेश: जहाँ दलितों को गाँव के मंदिरों और उत्सवों से दूर रखा जाता है, अदालतें प्रवेश दिलाने के आदेश देती रहती हैं; जाति के आधार पर प्रवेश से रोकना PCR और अत्याचार निवारण अधिनियम दोनों में अपराध है।
- आँकड़े: NCRB की "क्राइम इन इंडिया" रिपोर्टें हर साल अनुसूचित जातियों के विरुद्ध हज़ारों अपराध दर्ज करती हैं, जबकि PCR अधिनियम के तहत मामले बहुत कम हैं; यानी अधिकांश मामले अब कड़े अत्याचार निवारण अधिनियम में दर्ज होते हैं।
त्वरित दोहराईयाद रखने योग्य मुख्य बातें
- अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता का अंत करता है और किसी भी रूप में उसका आचरण निषिद्ध करता है।
- यह पूर्ण है और राज्य के साथ निजी व्यक्तियों पर भी लागू है।
- "अस्पृश्यता" संविधान या किसी अधिनियम में परिभाषित नहीं है।
- दंड क़ानून केवल संसद बना सकती है (अनुच्छेद 35)।
- अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम 1955 → नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम 1976।
- PCR सज़ा: 1–6 माह, फिर 6 माह–1 वर्ष, फिर 1–2 वर्ष, जुर्माने सहित।
- SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989: अग्रिम ज़मानत नहीं, विशेष न्यायालय।
समयरेखाअनुच्छेद 17 और अस्पृश्यता क़ानून: मुख्य तिथियाँ
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1950 | अनुच्छेद 17 लागू; अस्पृश्यता का अंत। |
| 1955 | अनुच्छेद 35 के तहत अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम। |
| 1976 | नाम बदलकर नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम; सज़ा कड़ी। |
| 1982 | एशियाड मज़दूर केस: अनुच्छेद 17 निजी व्यक्तियों पर भी लागू। |
| 1989 | SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम। |
| 2013 | हाथ से मैला उठाने पर प्रतिबंध का अधिनियम। |
| 2015 | अत्याचार अधिनियम संशोधित: नए अपराध, विशेष न्यायालय। |
| 2018 | सुभाष काशीनाथ महाजन (मार्च); धारा 18क जोड़ी गई (अगस्त)। |
| 2020 | पृथ्वी राज चौहान में धारा 18क वैध। |
| 2023 | बलराम सिंह: सीवर मौतों पर ₹30 लाख। |
| 2024 | सुकन्या शांता: जेलों में जाति आधारित काम रद्द। |
UPSC · राज्य PSC · न्यायपालिकाअनुच्छेद 17: UPSC परीक्षा कॉर्नर
- प्रीलिम्स जाल: "अस्पृश्यता अनुच्छेद 366 में परिभाषित है।" ग़लत। यह कहीं परिभाषित नहीं।
- प्रीलिम्स जाल: "राज्य विधान-मंडल अस्पृश्यता के लिए सज़ा तय कर सकते हैं।" ग़लत। अनुच्छेद 35 यह शक्ति केवल संसद को देता है।
- प्रीलिम्स तथ्य: अनुच्छेद 17, 23 और 24 उन अधिकारों में हैं जो निजी व्यक्तियों के विरुद्ध भी लागू होते हैं।
- मेन्स (150 शब्द): अनुच्छेद 17 और विशेष क़ानूनों के बावजूद जातिगत भेदभाव बना हुआ है। कारणों की चर्चा करें और उपाय सुझाएँ।
- मेन्स (150 शब्द): हाथ से मैला उठाना अस्पृश्यता का सबसे बुरा बचा हुआ रूप है। क़ानूनी और न्यायिक प्रतिक्रिया का परीक्षण करें।
अभ्यास प्रश्नख़ुद को परखें: अनुच्छेद 17
किस अनुच्छेद के तहत अस्पृश्यता के आचरण के लिए सज़ा तय करने वाले क़ानून केवल संसद बना सकती है?
शंका समाधानअक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 17 क्या है?
अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता का अंत करता है, किसी भी रूप में उसका आचरण निषिद्ध करता है और उससे उपजी किसी निर्योग्यता को लागू करना विधि के अनुसार दंडनीय अपराध बनाता है।
क्या संविधान में अस्पृश्यता परिभाषित है?
नहीं। न संविधान, न PCR अधिनियम इसे परिभाषित करता है। अदालतें इसे कुछ समुदायों पर ऐतिहासिक रूप से थोपी गई जाति आधारित सामाजिक निर्योग्यताओं के रूप में पढ़ती हैं।
भारत में अस्पृश्यता की सज़ा क्या है?
नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम के तहत पहले अपराध पर 1 से 6 माह कारावास और ₹100 से ₹500 जुर्माना, तीसरे अपराध पर 1 से 2 वर्ष और ₹500 से ₹1,000। SC/ST पर अत्याचार में 1989 के अधिनियम के तहत 6 माह से 5 वर्ष या अधिक।
क्या अनुच्छेद 17 निजी व्यक्तियों पर लागू होता है?
हाँ। अनुच्छेद 17 उन गिने-चुने मूल अधिकारों में है जो निजी व्यक्तियों पर भी लागू होते हैं, जैसा एशियाड मज़दूर केस (1982) में कहा गया।