भाग III ⚖️ मूल अधिकार लागू · कभी संशोधित नहीं · कभी प्रयोग नहीं

अनुच्छेद 34: सेना विधि (मार्शल लॉ) और मूल अधिकार

एक साँस में उत्तर: अनुच्छेद 34 सेना विधि (मार्शल लॉ) से जुड़ा है, यानी ऐसे क्षेत्र में सेना का शासन जहाँ नागरिक सरकार और अदालतें काम करना बंद कर दें। यह संसद को ऐसे समय के बाद क्षतिपूर्ति अधिनियम बनाने देता है, ताकि व्यवस्था बहाल करने के लिए किए गए कार्यों पर अधिकारियों और दूसरों की रक्षा हो, और सेना विधि में दी गई सज़ाओं को विधिमान्य किया जा सके, भले ही उनसे मूल अधिकार टूटे हों। संविधान में मार्शल लॉ की परिभाषा नहीं है, और स्वतंत्र भारत में यह कभी घोषित नहीं हुआ।

मूल पाठअनुच्छेद 34 का आधिकारिक पाठ

हिन्दी · आधिकारिक पाठ

34. जब किसी क्षेत्र में सेना विधि प्रवृत्त है तब इस भाग द्वारा प्रदत्त अधिकारों का निर्बंधन—इस भाग के पूर्वगामी उपबंधों में किसी बात के होते हुए भी, संसद विधि द्वारा संघ या किसी राज्य की सेवा में किसी व्यक्ति की या किसी अन्य व्यक्ति की किसी ऐसे कार्य के संबंध में क्षतिपूर्ति कर सकेगी जो उसने भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर किसी ऐसे क्षेत्र में, जहाँ सेना विधि प्रवृत्त थी, व्यवस्था बनाए रखने या उसका पुनःस्थापन करने के संबंध में किया है या ऐसे क्षेत्र में सेना विधि के अधीन पारित दंडादेश, दिए गए दंड, आदिष्ट समपहरण या किए गए अन्य कार्य को विधिमान्य कर सकेगी।

1950 से कभी संशोधित नहीं और कभी प्रयोग नहीं हुआ।
In Simple Words / आसान शब्दों में

सेना विधि (मार्शल लॉ) युद्ध या किसी क्षेत्र में बहुत बड़े दंगे जैसी स्थिति है, जहाँ सेना शासन अपने हाथ में ले लेती है, नियम बनाती है और सैन्य अदालतों से लोगों को सज़ा दे सकती है, क्योंकि सामान्य अदालतें और पुलिस काम नहीं कर पातीं।

अनुच्छेद 34 क्या करता है: हालात सामान्य होने के बाद संसद ऐसा क़ानून बना सकती है जो (1) व्यवस्था बहाल करने के लिए सद्भाव से किए गए कार्यों पर अधिकारियों और दूसरों को मुकदमों से बचाए, और (2) सेना विधि की सज़ाओं को क़ानूनी रूप से वैध बनाए।

ऐसे क्षतिपूर्ति अधिनियम को मूल अधिकारों के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती।

मार्शल लॉ कौन तय करता है? संविधान चुप है। यह कॉमन लॉ का विचार है; इसे केवल किसी विशेष क्षेत्र में और केवल तब लागू माना जाता है जब नागरिक अदालतें सच में काम करना बंद कर दें।

यह आपातकाल नहीं है: अनुच्छेद 352 का राष्ट्रीय आपातकाल राष्ट्रपति पूरे देश या उसके भाग के लिए घोषित करते हैं, और नागरिक सरकार चलती रहती है। मार्शल लॉ किसी अनुच्छेद से घोषित नहीं होता।

🏠 रोज़मर्रा की मिसाल

भीड़ वाले बाज़ार में आग की कल्पना कीजिए। आग रोकने के लिए दमकलकर्मी दरवाज़े तोड़ते हैं, लोगों को धकेलते हैं और एक दुकान गिरा देते हैं। बाद में दुकानदार नुकसान का मुकदमा कर सकते हैं। अनुच्छेद 34 ऐसे नियम जैसा है कि संसद बाद में क़ानून बना सकती है: "बाज़ार बचाने के लिए दमकलकर्मियों ने सद्भाव से जो किया, उसकी सज़ा नहीं होगी"।

🇮🇳 असली भारतीय उदाहरण

भारत ने अनुच्छेद 34 का कभी प्रयोग नहीं किया। सबसे प्रसिद्ध उदाहरण ब्रिटिश भारत का है: अप्रैल 1919 में पंजाब में मार्शल लॉ घोषित हुआ। उसी दौरान 13 अप्रैल 1919 को जनरल डायर ने जलियाँवाला बाग़ में भीड़ पर गोली चलवाई, और लोगों को कोड़े मारे गए और रेंगने पर मजबूर किया गया। औपनिवेशिक सरकार ने फिर अपने अधिकारियों को बचाने के लिए क्षतिपूर्ति अधिनियम बनाया। संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद 34 रखा, पर यह शक्ति केवल चुनी हुई संसद को दी।

मार्शल लॉ बनाम आपातकालमार्शल लॉ और राष्ट्रीय आपातकाल में अंतर: अनुच्छेद 34 बनाम अनुच्छेद 352

बिंदुमार्शल लॉ (अनुच्छेद 34)राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352)
अर्थनागरिक प्रशासन टूटने पर सेना का शासनयुद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह के कारण विशेष संवैधानिक स्थिति
संविधान में परिभाषा?नहींहाँ, पूरी प्रक्रिया के साथ
क्षेत्रकेवल कोई विशेष क्षेत्रपूरा भारत या कोई भाग
कौन घोषित करता हैकोई अनुच्छेद नहीं; स्थिति से उत्पन्नराष्ट्रपति, मंत्रिमंडल की लिखित सलाह पर; संसद एक महीने में अनुमोदन
सरकार पर असरउस क्षेत्र में नागरिक सरकार और अदालतें निलंबितनागरिक सरकार और अदालतें चलती रहती हैं
अधिकारों पर असरसंसद बाद में कार्यों पर क्षतिपूर्ति दे सकती हैअनु. 358 अनु. 19 निलंबित (युद्ध/आक्रमण); अनु. 359 दूसरों का प्रवर्तन रोकता है, 20 और 21 नहीं
भारत में प्रयोग?कभी नहीं1962, 1971, 1975
  • AFSPA मार्शल लॉ नहीं है। नगा पीपल्स मूवमेंट ऑफ़ ह्यूमन राइट्स बनाम भारत संघ (1998) में पाँच न्यायाधीशों ने कहा कि सशस्त्र बल (विशेष शक्तियाँ) अधिनियम, 1958 केवल सेना को नागरिक प्रशासन की मदद करने देता है; नागरिक सरकार और अदालतें काम करती रहती हैं।
सेना विधि (मार्शल लॉ) अनुच्छेद 34 बनाम राष्ट्रीय आपातकाल अनुच्छेद 352: सेना विधि की परिभाषा संविधान में नहीं, किसी विशेष क्षेत्र में, सिविल प्रशासन टूटने पर सेना का शासन, संसद क्षतिपूर्ति अधिनियम बना सकती है; आपातकाल पूरे देश या भाग में, राष्ट्रपति की घोषणा; AFSPA मार्शल लॉ नहीं
अनुच्छेद 34 का मार्शल लॉ और अनुच्छेद 352 का राष्ट्रीय आपातकाल आमने-सामने।

त्वरित दोहराईयाद रखने योग्य मुख्य बातें

  • अनुच्छेद 34: संसद मार्शल लॉ वाले क्षेत्र में व्यवस्था बहाल करने के कार्यों पर क्षतिपूर्ति दे सकती है।
  • वह सेना विधि की सज़ाओं, दंडों और समपहरण को विधिमान्य भी कर सकती है।
  • संविधान में मार्शल लॉ की परिभाषा नहीं है और स्वतंत्र भारत में यह कभी घोषित नहीं हुआ।
  • मार्शल लॉ ≠ राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352); AFSPA ≠ मार्शल लॉ।

समयरेखाअनुच्छेद 34 और मार्शल लॉ: मुख्य तिथियाँ

वर्षघटना
1919पंजाब में मार्शल लॉ; जलियाँवाला बाग़ (13 अप्रैल); बाद में क्षतिपूर्ति अधिनियम।
1950अनुच्छेद 34 लागू; शक्ति केवल संसद को।
1958AFSPA पारित (मार्शल लॉ नहीं)।
1998नगा पीपल्स मूवमेंट केस: AFSPA वैध, मार्शल लॉ नहीं।

UPSC · राज्य PSC · न्यायपालिकाअनुच्छेद 34: UPSC परीक्षा कॉर्नर

  • प्रीलिम्स जाल: "राष्ट्रपति अनुच्छेद 34 के तहत मार्शल लॉ घोषित करते हैं।" ग़लत। मार्शल लॉ घोषित करने का कोई अनुच्छेद नहीं; अनुच्छेद 34 केवल संसद को क्षतिपूर्ति विधि बनाने देता है।
  • प्रीलिम्स तथ्य: मार्शल लॉ अनुच्छेद 34 से मूल अधिकारों को प्रभावित करता है; राष्ट्रीय आपातकाल अनुच्छेद 358 और 359 से।

अभ्यास प्रश्नख़ुद को परखें: अनुच्छेद 34

भारत में मार्शल लॉ के बारे में कौन-सा सही है? 1. इसकी परिभाषा अनुच्छेद 34 में है। 2. संसद विधि द्वारा इसके तहत किए कार्यों पर क्षतिपूर्ति दे सकती है। 3. इसे 1975 के आपातकाल में घोषित किया गया।

शंका समाधानअक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 34 क्या है?

अनुच्छेद 34 संसद को मार्शल लॉ वाले क्षेत्र में व्यवस्था बहाल करने के कार्यों पर व्यक्तियों को क्षतिपूर्ति देने और मार्शल लॉ में दी गई सज़ाओं को विधिमान्य करने वाला क़ानून बनाने देता है, भले ही उनसे मूल अधिकार टूटे हों।

क्या भारत में कभी मार्शल लॉ लगा है?

आज़ादी के बाद कभी नहीं। सबसे प्रसिद्ध मामला ब्रिटिश शासन में 1919 का पंजाब का मार्शल लॉ है, जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड का समय।