भाग III ⚖️ मूल अधिकार लागू · संशोधित 1995, 2000, 2001, 2019

अनुच्छेद 16: लोक नियोजन में अवसर की समता और भारत में आरक्षण

सरकारी नौकरी केवल वेतन नहीं, देश चलाने में हिस्सेदारी है। अनुच्छेद 16 हर नागरिक को इसमें बराबर मौक़े का वादा करता है, और फिर बताता है कि राज्य कैसे पद आरक्षित कर सकता है, ताकि सदियों से बाहर रखे गए समुदायों को भी शासन में जगह मिले।

मूल पाठअनुच्छेद 16 का आधिकारिक पाठ

हिन्दी · आधिकारिक पाठ

16. लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता—

(1) राज्य के अधीन किसी पद पर नियोजन या नियुक्ति से संबंधित विषयों में सभी नागरिकों के लिए अवसर की समता होगी।

(2) राज्य के अधीन किसी नियोजन या पद के संबंध में केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, उद्भव, जन्मस्थान, निवास या इनमें से किसी के आधार पर न तो कोई नागरिक अपात्र होगा और न उससे विभेद किया जाएगा।

(3) इस अनुच्छेद की कोई बात संसद को कोई ऐसी विधि बनाने से निवारित नहीं करेगी जो किसी राज्य या संघ राज्यक्षेत्र की सरकार के या उसमें के किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकारी के अधीन वाले किसी वर्ग या वर्गों के पद पर नियोजन या नियुक्ति के संबंध में ऐसे नियोजन या नियुक्ति से पहले उस राज्य या संघ राज्यक्षेत्र के भीतर निवास विषयक कोई अपेक्षा विहित करती है।

(4) इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को पिछड़े हुए नागरिकों के किसी वर्ग के पक्ष में, जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है, नियुक्तियों या पदों के आरक्षण के लिए उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी।

(4क) इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के पक्ष में, जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है, राज्य के अधीन सेवाओं में किसी वर्ग या वर्गों के पदों पर, पारिणामिक ज्येष्ठता सहित, प्रोन्नति के मामलों में आरक्षण के लिए उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी।

(4ख) इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को किसी वर्ष में किन्हीं न भरी गई ऐसी रिक्तियों को, जो खंड (4) या खंड (4क) के अधीन आरक्षण के लिए किए गए किसी उपबंध के अनुसार उस वर्ष में भरी जाने के लिए आरक्षित हैं, किसी उत्तरवर्ती वर्ष या वर्षों में भरे जाने के लिए पृथक् वर्ग की रिक्तियों के रूप में विचार करने से निवारित नहीं करेगी और ऐसे वर्ग की रिक्तियों पर उस वर्ष की रिक्तियों के साथ जिसमें वे भरी जा रही हैं, उस वर्ष की रिक्तियों की कुल संख्या के संबंध में पचास प्रतिशत आरक्षण की अधिकतम सीमा का अवधारण करने के लिए विचार नहीं किया जाएगा।

(5) इस अनुच्छेद की कोई बात किसी ऐसी विधि के प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी जो यह उपबंध करती है कि किसी धार्मिक या सांप्रदायिक संस्था के कार्यकलाप से संबंधित कोई पदधारी या उसके शासी निकाय का कोई सदस्य किसी विशिष्ट धर्म का मानने वाला या विशिष्ट संप्रदाय का ही हो।

(6) इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को खंड (4) में उल्लिखित वर्गों से भिन्न नागरिकों के आर्थिक रूप से दुर्बल किन्हीं वर्गों के पक्ष में नियुक्तियों या पदों के आरक्षण के लिए कोई उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी, जो विद्यमान आरक्षण के अतिरिक्त और प्रत्येक प्रवर्ग में पदों के अधिकतम दस प्रतिशत के अधीन होगा।

संशोधन: खंड (4क) 77वें संशोधन (1995) से, उसमें "पारिणामिक ज्येष्ठता सहित" शब्द 85वें संशोधन (2001) से, खंड (4ख) 81वें संशोधन (2000) से और खंड (6) 103वें संशोधन (2019) से जोड़ा गया। अनुच्छेद 16 केवल नागरिकों की रक्षा करता है और "राज्य के अधीन" (अनुच्छेद 12) नौकरियों पर लागू है, निजी कंपनियों पर नहीं।
In Simple Words / आसान शब्दों में

खंड (1) वादा है: सभी व्यक्तियों को समान अवसर प्राप्त हो, इसके लिए राज्य के अधीन नियोजन या सरकारी नौकरी में सबको समान अवसर मिलेंगे: वही परीक्षा, वही आयु सीमा, वही नियम।

खंड (2) दो ऐसे आधार जोड़ता है जो अनुच्छेद 15 में नहीं हैं: उद्भव (Descent, आप किस परिवार से हैं) और निवास (Residence, आप कहाँ रहते हैं)। कोई राज्य अपनी नौकरियाँ केवल अपने मूल निवासियों के लिए नहीं रख सकता; निवास की शर्त केवल संसद कानून द्वारा लगा सकती है (खंड 3)।

खंड (4), (4क), (4ख) और (6) आरक्षण की अनुमति देते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आरक्षण समानता के विरुद्ध नहीं है: भारत के संविधान में अनुपातिक समानता की अवधारणा अंतर्निहित है, जिससे वितरणमूलक न्याय (Distributive Justice) प्राप्त किया जा सकता है, यानी विभेदीकृत तरीके से प्राथमिकता के आधार पर संसाधनों का वितरण।

आरक्षण एक सक्षमकारी शक्ति (enabling factor) है, कर्तव्य नहीं। आरक्षण का मौलिक अधिकार किसी के पास नहीं, और राज्य को इसे आँकड़ों से सही ठहराना होता है तथा ऐसी सीमाओं में रखना होता है जिनकी न्यायिक समीक्षा हो सके।

🏠 रोज़मर्रा की मिसाल

400 मीटर की दौड़ सोचिए जिसमें कुछ धावकों को पीढ़ियों तक 100 मीटर पीछे से दौड़ाया गया। आज सबको एक ही लाइन से दौड़ाना (औपचारिक समानता) न्याय नहीं है। आरक्षण उन धावकों को तब तक अलग लेन देने जैसा है जब तक दूरी पट न जाए, लेकिन शर्तों के साथ: जिस धावक का परिवार आगे निकल चुका है (क्रीमी लेयर) वह पीछे वालों के लिए जगह छोड़े, और विशेष लेन पूरे ट्रैक पर कब्ज़ा न करें (50% नियम)।

🇮🇳 असली भारतीय उदाहरण

पूजा (OBC) और अर्जुन (सामान्य) दोनों UPSC सिविल सेवा परीक्षा पास करते हैं। पूजा के पिता किसान हैं और माँ छोटी दुकान चलाती हैं; अन्य स्रोतों से परिवार की आय ₹8 लाख सालाना से कम है, इसलिए वह "नॉन-क्रीमी लेयर" है और 27% OBC सीटों में आती है। उसकी चचेरी बहन के पिता ग्रुप A अधिकारी हैं, इसलिए वह पद के आधार पर "क्रीमी लेयर" है और उसे सामान्य श्रेणी में प्रतिस्पर्धा करनी होगी। अर्जुन के परिवार की आय ₹6 लाख है और बड़ी संपत्ति नहीं, इसलिए वह 10% EWS कोटे में आवेदन कर सकता है।

खंड-दर-खंडअनुच्छेद 16 खंड-दर-खंड: लोक नियोजन में अवसर की समता

खंडआसान अर्थस्रोत
16(1)राज्य के अधीन नियोजन या सरकारी नौकरी में सभी नागरिकों को समान अवसरमूल
16(2)धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान के अलावा उद्भव (Descent) और निवास (Residence) के आधार पर भी भेदभाव नहींमूल
16(3)संसद (केवल संसद) कानून द्वारा किसी राज्य/UT की नौकरियों में निवास की शर्त लगा सकती हैमूल
16(4)जिन पिछड़े वर्गों का सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं, उनके लिए आरक्षण या अन्य प्रावधानमूल
16(4क)SC/ST को पदोन्नति में आरक्षण, परिणामी ज्येष्ठता सहित77वाँ (1995), 85वाँ (2001)
16(4ख)न भरे आरक्षित पद अगले वर्ष अलग वर्ग के रूप में; 50% सीमा से बाहर81वाँ (2000)
16(5)धार्मिक संस्था के पद उस धर्म-विशेष के अनुयायियों के लिए आरक्षित रह सकते हैंमूल
16(6)EWS को अधिकतम 10%, मौजूदा आरक्षण के अतिरिक्त103वाँ (2019)

ध्यान देने योग्य बातें

  • अनुच्छेद 16(2) में उद्भव और निवास अतिरिक्त आधार हैं। 16(3) के तहत संसद ने एक बार लोक नियोजन (निवास संबंधी अपेक्षा) अधिनियम, 1957 बनाया था; आज निवास के नियम मुख्यतः अनुच्छेद 371घ (आंध्र प्रदेश और तेलंगाना) जैसे विशेष प्रावधानों से हैं।
  • अधिवास के आधार पर "धरती पुत्रों" के लिए नौकरियाँ आरक्षित करने वाला राज्य कानून सामान्यतः अवैध है (कैलाश चंद शर्मा बनाम राजस्थान राज्य, 2002)।
  • खंड (5) का उदाहरण: धार्मिक संस्था के पद उस धर्म-विशेष के अनुयायियों के लिए आरक्षित रहेंगे, जैसे हिंदू मंदिर बोर्ड के न्यासी हिंदू हों।
  • एन.एम. थॉमस (1976) और इंद्रा साहनी (1992): अनुच्छेद 16(4) 16(1) का अपवाद नहीं, बल्कि उसी का एक पहलू है।

आरक्षण का मुद्दाभारत में आरक्षण का इतिहास: कालेलकर, मंडल आयोग और 27% OBC कोटा

  • संविधान के प्रारंभिक दिनों से ही SC और ST वर्ग को आरक्षण दिया गया और इसको लेकर कोई विवाद नहीं रहा।
  • पिछड़े वर्ग के कल्याण के लिए अनुच्छेद 340 राष्ट्रपति को समय-समय पर आयोग बनाने के अधिकार देता है। इसी प्रक्रिया में 1953 में काका कालेलकर आयोग का गठन किया गया था (नेहरू सरकार)। इसकी 1955 की रिपोर्ट स्वीकार नहीं हुई।
  • अनुच्छेद 340 से प्रेरणा लेकर 1979 में मोरारजी देसाई सरकार ने बी.पी. मंडल आयोग का गठन किया, जिसे पिछड़े वर्ग के हितों के लिए सुझाव देने की ज़िम्मेदारी दी गई। 1980 की रिपोर्ट ने 3,743 जातियों की पहचान कर OBC को 27% आरक्षण की सिफ़ारिश की।
  • विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार (दिसंबर 1989) के आने के उपरांत मंडल आयोग की सिफ़ारिशों को औपचारिक रूप से अगस्त 1990 से लागू करते हुए 27% आरक्षण OBC वर्ग को दिया गया। इस आरक्षण का आधार जाति को चुना गया।
  • पुनः सितंबर 1991 में नरसिंह राव सरकार द्वारा 10% आरक्षण आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग को प्रदान किया गया। यह 10% इंद्रा साहनी (1992) में रद्द कर दिया गया। (आज का EWS कोटा अलग और बाद की व्यवस्था है, जो 103वें संशोधन, 2019 से आई।)
  • इससे यह वाद-विवाद प्रारंभ हो गया कि क्या भारत का संविधान जाति आधारित आरक्षण की स्वीकृति देता है? क्या आर्थिक आधार पर आरक्षण हो सकता है? पिछड़ेपन की क्या परिभाषा है? इनका उत्तर सुप्रीम कोर्ट ने इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ, 16 नवंबर 1992 में दिया।
भारत में आरक्षण का इतिहास टाइमलाइन: 1950 SC/ST, अनुच्छेद 340, काका कालेलकर आयोग 1953, मंडल आयोग 1979, वी.पी. सिंह 1990 OBC 27%, इंद्रा साहनी 1992, 103वाँ संशोधन EWS 2019, जनगणना 2027
भारत में आरक्षण, पहले आयोग से जनगणना 2027 की जाति गणना तक।

59.5% का गणितभारत में आरक्षण प्रतिशत: SC 15%, ST 7.5%, OBC 27% और EWS 10%

केंद्र सरकार की नौकरियों और केंद्रीय शिक्षा संस्थानों में हिस्सेदारी इस प्रकार है:

  • अनुसूचित जाति (SC): 15%
  • अनुसूचित जनजाति (ST): 7.5%
  • अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC): 27% (केवल नॉन-क्रीमी लेयर)
  • SC + ST + OBC = 49.5%, इंद्रा साहनी की 50% सीमा से ठीक नीचे।
  • EWS: 10%, 2019 में जोड़ा गया → कुल 59.5%।
50% से ऊपर कैसे? जनहित अभियान (2022) में बहुमत ने कहा कि 50% आरक्षण की सीमा सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग के लिए रखी गई है, और राज्य अन्य आधारों पर, अर्थात आर्थिक आधार पर, आरक्षण दे सकता है। राज्य अपनी हिस्सेदारी ख़ुद तय करते हैं (तमिलनाडु में 69%, जो 76वें संशोधन से नौवीं अनुसूची में संरक्षित है)।
भारत में आरक्षण प्रतिशत चार्ट: SC 15%, ST 7.5%, OBC 27% = 49.5%, EWS 10% जोड़कर कुल 59.5%, इंद्रा साहनी की 50% सीमा रेखा, केंद्र सरकार की नौकरियाँ
केंद्र की नौकरियों में 59.5% कैसे बनता है, और 50% की रेखा कहाँ है।

16 नवंबर 1992इंद्रा साहनी केस (मंडल केस): आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के विचार

नौ न्यायाधीशों की पीठ ने 6:3 से फ़ैसला दिया:

  • सर्वोच्च न्यायालय ने 16 नवंबर 1992 को अपने इस निर्णय में बड़ा निर्णय देते हुए यह स्पष्ट किया कि भारत के संविधान में समानता की स्थापना के लिए राज्य सकारात्मक भेदभाव कर सकता है।
  • आरक्षण समानता के विरुद्ध नहीं है। भारत के संविधान में अनुपातिक समानता की अवधारणा अंतर्निहित है, जिससे वितरणमूलक न्याय (Distributive Justice) को प्राप्त किया जा सकता है। (वितरणमूलक न्याय = विभेदीकृत तरीके से प्राथमिकता के आधार पर संसाधनों का वितरण।)
  • जाति आधारित संरक्षण सही है, क्योंकि बहुसंख्यक हिंदू समुदाय में कई जातियाँ पिछड़ेपन का शिकार हैं। पिछड़ेपन को पहचानने के लिए जाति सबसे पहला और प्रमुख आधार है, जबकि दूसरी प्राथमिकता में रोज़गार, व्यवसाय, आवास इत्यादि आर्थिक स्थितियों को भी देखा जा सकता है।
  • OBC वर्ग के लिए क्रीमी लेयर (साधन संपन्न) का प्रावधान भी होगा, अर्थात जो अधिक साधन संपन्न हैं उन्हें आरक्षण का लाभ प्राप्त नहीं होगा। आज 8 लाख या इससे अधिक आय वर्ग (2017 से) में यदि किसी व्यक्ति के माता-पिता आते हैं, या वे उच्च संवैधानिक पद अथवा ग्रुप A/क्लास I पद पर हैं, तो उसे क्रीमी लेयर का माना जाता है।
  • SC और ST वर्ग के लिए क्रीमी लेयर का प्रावधान नहीं होगा।
  • सामाजिक न्याय हेतु जाति आधारित आरक्षण की अधिकतम सीमा 50% होगी (असाधारण परिस्थितियों को छोड़कर) और इसकी न्यायिक समीक्षा होगी।
  • पदोन्नति में आरक्षण के प्रावधान नहीं होंगे (भावी प्रभाव से, मौजूदा पदोन्नतियाँ पाँच वर्ष तक सुरक्षित)।
  • 1991 का 10% आर्थिक कोटा रद्द: केवल आय से अनुच्छेद 16(4) के पिछड़े वर्ग की पहचान नहीं हो सकती।
  • OBC सूची में शामिल करने और हटाने के लिए स्थायी निकाय का आदेश (राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग, 1993; 102वें संशोधन, 2018 से अनुच्छेद 338ख के तहत संवैधानिक दर्जा)।

उपर्युक्त निर्णय के उपरांत सरकार पर पड़ने वाले प्रभाव और प्रयास

  • पी.वी. नरसिंह राव की सरकार ने EWS को 10% दिया गया आरक्षण वापस ले लिया।
  • 76वें संविधान संशोधन (1994) के माध्यम से तमिलनाडु ने प्रचलित 69% आरक्षण को 9वीं अनुसूची में डाल दिया। (मूल संविधान में 8 अनुसूचियाँ थीं; प्रथम संशोधन 1951 के माध्यम से 9वीं अनुसूची शामिल की गई, जिसमें यह कहा गया कि इसमें जो भी कानून संसद द्वारा रखा जाएगा उसकी न्यायिक समीक्षा नहीं होगी। किंतु अब सर्वोच्च न्यायालय ने इसे भी न्यायिक सक्रियतावाद के प्रभाव में आई.आर. कोएल्हो (2007) से न्यायिक समीक्षा के दायरे में रख दिया है।)
  • 77वें संविधान संशोधन (1995) के माध्यम से अनुच्छेद 16(4क) एक नया अनुच्छेद शामिल करके यह तय किया गया कि SC और ST वर्ग को पदोन्नति में आरक्षण होगा।
  • 81वें संशोधन (2000) से 16(4ख) (बैकलॉग, नीचे देखें), 82वें (2000) से पदोन्नति में अर्हक अंकों में छूट (अनुच्छेद 335 का परंतुक) और 85वें (2001) से परिणामी ज्येष्ठता।
SC, ST, OBC और EWS आरक्षण तुलना चार्ट: आधार, प्रतिशत, क्रीमी लेयर, पदोन्नति में आरक्षण, संवैधानिक प्रावधान, अनुच्छेद 16 UPSC
किसे क्या मिलता है: हर वर्ग का आधार, हिस्सा, क्रीमी लेयर और पदोन्नति के नियम।

पदोन्नति में आरक्षणपदोन्नति में आरक्षण: कैच-अप नियम बनाम परिणामी ज्येष्ठता (अनुच्छेद 16(4क))

85वें संशोधन के माध्यम से यह तय किया गया कि SC और ST वर्ग को आरक्षण पदोन्नति के संदर्भ में "परिणामी ज्येष्ठता" (Consequential Seniority) का सिद्धांत दिया गया।

समान योग्यता वाले तीन अधिकारी लीजिए: x (सामान्य वर्ग, 5 वर्ष से सेवा, सबसे वरिष्ठ), y (OBC, 3 वर्ष) और z (SC/ST, 2 वर्ष, सबसे कम वरिष्ठ)।

  • कैच-अप सिद्धांत (वीरपाल सिंह चौहान 1995, अजीत सिंह 1996): z आरक्षित पदोन्नति से पहले ऊपर जा सकता है, लेकिन जब x बाद में पदोन्नत होता है तो x अपनी वरिष्ठता वापस पा लेता है। कैच-अप सिद्धांत के आधार पर सामान्यतः जब योग्यता समान होती है तो सबसे वरिष्ठतम व्यक्ति की पदोन्नति होती है।
  • परिणामी ज्येष्ठता (85वाँ संशोधन): परिणामी ज्येष्ठता का सिद्धांत यह मानता है कि जब किसी स्तर पर योग्यता समान हो तो यदि कोई SC/ST वर्ग से संबंधित कोई व्यक्ति है तो उसे जानबूझकर सबसे वरिष्ठ माना जाता है, ताकि उसकी पदोन्नति हो सके। इसके लिए उसमें सबसे अधिक वरिष्ठ व्यक्ति की वरिष्ठता का जो अंतर है, SC/ST वर्ग के व्यक्ति में जोड़ दिया जाता है: ऐसी परिस्थिति में परिणामी ज्येष्ठता के आधार पर 2 में 3 वर्ष और 1 दिन जोड़कर z की पदोन्नति की जाएगी।
85वाँ संशोधन 17 जून 1995 (77वें संशोधन की तारीख़) से प्रभावी किया गया, ताकि पहले दी गई पदोन्नतियाँ सुरक्षित रहें। (नोट्स में 2002 लिखा है: विधेयक को जनवरी 2002 में स्वीकृति मिली, लेकिन इसका नाम संविधान (पचासीवाँ संशोधन) अधिनियम, 2001 है।)

फिर चर्चा-परिचर्चा

सरकार के उपर्युक्त प्रयासों के बाद यह चर्चा-परिचर्चा का विषय बन गया कि क्या पदोन्नति में आरक्षण सही है? क्या SC और ST वर्ग के लिए क्रीमी लेयर नहीं होना चाहिए? ऐसे प्रश्नों को पुनः न्यायालय द्वारा इन याचिकाओं के माध्यम से स्पष्ट किया गया:

  • नागराज केस (2006): (i) SC/ST वर्गों को पदोन्नति में आरक्षण सही है; (ii) विभिन्न संगठनों में SC/ST का प्रतिनिधित्व पिछड़ेपन की वजह से नहीं हुआ; (iii) SC/ST वर्ग के लोग आज भी पिछड़ेपन का शिकार हैं; (iv) पदोन्नति पर आरक्षण योग्यता की क़ीमत पर नहीं होगा, अर्थात इससे सेवा की कार्यकुशलता बाधित नहीं होगी (अनुच्छेद 335); (v) कार्यपालिका को विभिन्न संगठनों में SC/ST वर्ग का प्रतिनिधित्व है या नहीं, इसके आँकड़े देने होंगे; (vi) SC/ST वर्ग में पदोन्नति के स्तर पर क्रीमी लेयर का सिद्धांत लागू होगा।
  • उपर्युक्त निर्णय के उपरांत भी विभिन्न संगठनों में उच्च स्तर पर SC/ST वर्ग का प्रतिनिधित्व नहीं हो पा रहा था, और कार्यपालिका कहाँ-कहाँ प्रतिनिधित्व का अभाव है, न तो इसका शोध कर रही थी और न ही इस आँकड़े को न्यायपालिका को दे रही थी।
  • अतः सर्वोच्च न्यायालय ने 2018 में जरनैल सिंह में यह निर्णय दिया: (i) पदोन्नति में SC/ST का आरक्षण वैध है; (ii) कार्यपालिका को पिछड़ेपन के आँकड़े नहीं देने होंगे, अर्थात इसकी शर्तें हटा दी गईं; (iii) अन्य नागराज केस की सभी शर्तें लागू रहेंगी।
  • बी.के. पवित्रा II (2019): परिणामी ज्येष्ठता पर कर्नाटक का कानून वैध।
  • मुकेश कुमार बनाम उत्तराखंड राज्य (2020): पदोन्नति में आरक्षण का कोई मौलिक अधिकार नहीं; राज्य इसे देने को बाध्य नहीं।
  • जरनैल सिंह II (28 जनवरी 2022): अपर्याप्त प्रतिनिधित्व के आँकड़े पूरी सेवा के नहीं, कैडर-वार जुटाने होंगे; कोर्ट ने कोई पैमाना तय करने से इनकार किया।
कैच-अप नियम बनाम परिणामी ज्येष्ठता चित्र: x (सामान्य, 5 वर्ष), y (OBC, 3 वर्ष), z (SC/ST, 2 वर्ष), पदोन्नति में आरक्षण, 77वाँ और 85वाँ संशोधन, अनुच्छेद 16(4क)
कैच-अप नियम बनाम परिणामी ज्येष्ठता, कक्षा नोट्स के पिरामिड पर आधारित।

81वाँ संशोधन, 2000बैकलॉग रिक्तियाँ और कैरी फ़ॉरवर्ड नियम: अनुच्छेद 16(4ख)

81वें संविधान संशोधन (2000) के माध्यम से अनुच्छेद 16(4ख) नामक एक नया अनुच्छेद शामिल करते हुए यह प्रावधान किया गया कि आरक्षण ख़ाली पड़ी रिक्तियों पर लागू होगा और इसमें 50% आरक्षण का सिद्धांत लागू नहीं होगा। इस संविधान संशोधन के माध्यम से बैकलॉग और कैरी फ़ॉरवर्ड के सिद्धांत को अपनाया गया, अर्थात यदि आरक्षित वर्ग में 50% रिक्तियों में कुछ रिक्तियाँ ख़ाली रह जाती हैं तो उसे अगले वर्ष के आरक्षित पदों में जोड़ दिया जाता है।

उदाहरण के लिए: 100 रिक्तियों में से 50 पद आरक्षित हैं। यदि इसमें 30 पद पर भर्ती होती है और 20 पद रिक्त रह जाते हैं, तो अगले वर्ष 100 में से 50 पद सामान्य वर्ग के लिए और 50 + बचे हुए 20 पद जो पिछले वर्ष के हैं, अर्थात 70 पद आरक्षित वर्ग के लिए होंगे। बैकलॉग के 20 पद अलग वर्ग माने जाते हैं, इसलिए उस वर्ष की 50% सीमा नहीं टूटती।

इसकी ज़रूरत क्यों पड़ी? टी. देवदासन (1964) और फिर इंद्रा साहनी में कोर्ट ने कहा था कि आगे ले जाए गए पद किसी वर्ष के आरक्षण को 50% से ऊपर नहीं ले जा सकते। खंड (4ख) ने बैकलॉग पदों के लिए इसे पलट दिया।
बैकलॉग रिक्तियाँ और कैरी फ़ॉरवर्ड नियम, अनुच्छेद 16(4ख), 81वाँ संशोधन 2000: 100 पद, 50 आरक्षित, 30 भरे, 20 अगले वर्ष, कुल 70 आरक्षित, 50% सीमा लागू नहीं
नोट्स का 100 पदों वाला उदाहरण: 20 ख़ाली पद अगले वर्ष 70 आरक्षित पद कैसे बनते हैं।

103वाँ संशोधन, 2019EWS आरक्षण: 103वाँ संशोधन, पात्रता मानदंड और जनहित अभियान फ़ैसला

2019 में 103वें संविधान संशोधन के माध्यम से आर्थिक आधार पर आरक्षण निम्नांकित तरीके से दिया गया:

  • अनुच्छेद 15(6) को शामिल करते हुए शिक्षा के संस्थानों में 10% आरक्षण EWS अर्थात आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग को दिया गया है, किंतु इसमें अल्पसंख्यक शिक्षा के संस्थान शामिल नहीं हैं।
  • अनुच्छेद 16(6) शामिल करते हुए राज्य के अधीन रोज़गार में भी EWS को 10% का आरक्षण दिया गया है।

EWS कौन होते हैं? (भारत सरकार के मानदंड, 2019)

  • यह SC, ST व OBC वर्ग पर लागू नहीं होता है; यह सामान्य वर्ग पर लागू होता है।
  • ऐसा व्यक्ति जिसके परिवार (स्वयं, माता-पिता, नाबालिग भाई-बहन, पति/पत्नी और नाबालिग बच्चे) की सभी स्रोतों से सालाना आमदनी 8 लाख से अधिक है, तो उसे इसका लाभ प्राप्त नहीं होता है।
  • 5 एकड़ या इससे अधिक कृषि भूमि का स्वामित्व रखने वाला व्यक्ति इसमें शामिल नहीं होता है।
  • 1000 वर्ग फ़ुट या इससे ज़्यादा बड़ा आवासीय फ़्लैट न हो, ऐसा व्यक्ति इसमें शामिल होगा।
  • अधिसूचित नगरपालिका क्षेत्र में आवास योग्य भूमि 100 वर्ग गज़ या इससे अधिक न हो, ऐसा व्यक्ति इसमें शामिल होता है।
  • ग़ैर-नगरपालिका (अन्य) क्षेत्र में 200 वर्ग गज़ या इससे अधिक आवासीय ज़मीन न होना, ऐसा व्यक्ति इसमें शामिल होता है।

सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय: जनहित अभियान बनाम भारत संघ (7 नवंबर 2022, 3:2)

(नोट्स में तारीख़ 26 मई 2023 लिखी है; फ़ैसले की सही तारीख़ 7 नवंबर 2022 है।) बहुमत (न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी, बेला एम. त्रिवेदी और जे.बी. पारदीवाला) ने इस विषय पर ये विचार प्रस्तुत किए:

  • EWS आधारित आरक्षण या आर्थिक आधार पर आरक्षण संवैधानिक रूप से वैध है, क्योंकि संविधान में आर्थिक न्याय को भी मान्यता दी गई है।
  • संविधान में वितरणमूलक न्याय की अवधारणा अंतर्निहित है।
  • 50% आरक्षण की सीमा सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग के लिए रखी गई है, और राज्य अन्य आधारों पर, अर्थात आर्थिक आधार पर, आरक्षण दे सकता है।
  • आर्थिक आरक्षण से SC, ST और OBC का आरक्षण कम नहीं होता है।
  • आरक्षण सक्षमकारी कारक (Enabling factor) है; यह संविधान की अनिवार्य विशेषता नहीं है। यह एक नियत अवधि में संचालित साधन होता है जिसमें किसी समुदाय को सशक्त बनाया जाता है। न्यायमूर्ति त्रिवेदी और पारदीवाला ने कहा कि आरक्षण अनंत काल तक नहीं चलना चाहिए।
  • EWS को 10% आरक्षण निजी शिक्षा के संस्थानों में भी लागू किया जा सकता है।
  • असहमति (CJI यू.यू. ललित और न्यायमूर्ति एस. रवींद्र भट): ग़रीब SC, ST और OBC परिवारों को EWS से बाहर रखना बहिष्करणकारी है और समता संहिता का उल्लंघन है।

आर्थिक आधार पर आरक्षण की आलोचनाएँ (नोट्स से)

  • ऐसी व्यवस्थाओं से लगातार आरक्षण की माँग बढ़ती जाएगी और लोग आरक्षण को मूल अधिकार समझ बैठेंगे।
  • भारत में भ्रष्टाचार की वजह से दुरुपयोग हो सकता है, अर्थात आर्थिक आधार पर पिछड़ेपन की पहचान संभव नहीं है।
  • भारत में आर्थिक रूप से पिछड़ेपन को परिभाषित करने के लिए आँकड़ों का भी अभाव पाया जाता है।
  • क्षेत्रीय विषमता: पश्चिम भारत में आर्थिक गतिविधियाँ अच्छी हैं, जबकि पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत में बेहतर न होने की वजह से विवाद हो सकता है।

पक्ष में: उपर्युक्त आलोचनाओं के बाद भी यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि आर्थिक आधार पर आरक्षण पहले से चले आ रहे जाति आधारित आरक्षण के सामान्य वर्गों में होने वाले विरोध को कम करता है, संविधान में आर्थिक न्याय के सिद्धांत से मेल खाता है, तथा वैश्वीकरण, उदारीकरण व निजीकरण की नीतियों की वजह से सामान्य वर्ग में बेरोज़गारी तथा उत्पन्न होने वाली असंतुष्टि को कम करता है।

विपक्षी मत: यह उल्लेखनीय है कि राज्य के नीति निदेशक तत्वों के प्रभाव में सरकार वैसे भी आर्थिक रूप से पिछड़ेपन को दूर करने के लिए कल्याण के कार्यक्रम चलाती है, अतः आर्थिक आधार पर आरक्षण अनुचित है।

EWS आरक्षण पात्रता मानदंड, 103वाँ संशोधन 2019: पारिवारिक आय 8 लाख से कम, 5 एकड़ कृषि भूमि, 1000 वर्ग फ़ुट फ़्लैट, 100 वर्ग गज़ (अधिसूचित नगरपालिका), 200 वर्ग गज़ (अन्य क्षेत्र), SC/ST/OBC शामिल नहीं
EWS पात्रता सूची: एक आय की शर्त और संपत्ति की चार शर्तें।

आरक्षण के दो तरीकेभारत में क्षैतिज बनाम लंबवत आरक्षण

आरक्षण सामान्यतः इन दो तरीके के आधारों पर वर्गीकृत किए जाते हैं:

क्षैतिज आरक्षण (Horizontal)लंबवत आरक्षण (Vertical)
आरक्षण की कोई अलग श्रेणी नहीं बनाई जाती, बल्कि आरक्षण के भीतर आरक्षण दिया जाता हैआरक्षण की नई श्रेणी या वर्ग बनाई जाती है
उदाहरण: पंचायती राज और नगरपालिका में 1/3 महिलाओं को आरक्षण (अनुच्छेद 243घ, 243न); इसमें SC, ST, OBC और सामान्य वर्ग की महिलाएँ भी शामिल हैंउदाहरण: सरकारी नौकरियों में SC, ST और OBC को 49.5% आरक्षण, और 103वें संशोधन में EWS के लिए नई श्रेणी बनाकर 10%
अन्य उदाहरण: दिव्यांग (नौकरियों में 4%), पूर्व सैनिक, पुलिस भर्ती में महिलाएँआधार: अनुच्छेद 15(4), 16(4), 15(6), 16(6)
सामान्य सूची में मेरिट से चुनी महिला वहीं गिनी जाती है; क्षैतिज कोटा हर वर्ग में समायोजित होता है (सौरव यादव, 2020)इंद्रा साहनी की 50% सीमा के अधीन (EWS इससे बाहर)

लंबवत आरक्षण को इमारत की मंज़िलें (SC, ST, OBC, EWS, खुली) समझिए और क्षैतिज आरक्षण को वह लिफ़्ट जो हर मंज़िल से होकर जाती है (महिलाएँ, दिव्यांग, पूर्व सैनिक)।

क्षैतिज बनाम लंबवत आरक्षण चित्र: लंबवत SC, ST, OBC, EWS; क्षैतिज महिलाएँ, दिव्यांग, पूर्व सैनिक हर वर्ग के भीतर, पंचायत में महिलाओं को एक-तिहाई
लंबवत वर्ग स्तंभ हैं, क्षैतिज कोटा सबके आर-पार एक पट्टी।

पक्ष और विपक्षक्या जाति आधारित आरक्षण संवैधानिक रूप से सही है? सिद्धांत, आलोचनाएँ और न्याय का तर्क

आरक्षण से संबंधित स्थापित सिद्धांत

  • सामाजिक न्याय के लिए जाति आधारित आरक्षण सबसे पहला और प्रमुख साधन है।
  • जाति आधारित आरक्षण संवैधानिक रूप से वैध है।
  • आर्थिक आधार पर भी आरक्षण हो सकता है, किंतु इसे दूसरी प्राथमिकता में देखना चाहिए (इंद्रा साहनी 1992; अब 103वें संशोधन से)।
  • भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में धर्म के आधार पर आरक्षण के प्रावधान अंतर्निहित नहीं हैं।
  • आरक्षण राज्य सरकार, केंद्र सरकार, राज्य विधान-मंडल, संसद इत्यादि किसी के द्वारा, अर्थात अनुच्छेद 12 वाले राज्य के द्वारा, दिया जा सकता है।
  • भारत के संविधान में आरक्षण का अधिकार वर्णित नहीं है; यह अप्रत्यक्ष रूप से सामाजिक-आर्थिक न्याय के लिए अंतर्निहित है।
  • SC व ST वर्ग के लिए भर्ती में क्रीमी लेयर का प्रावधान नहीं है; क्रीमी लेयर का प्रावधान भर्ती के संदर्भ में OBC के लिए और SC व ST के लिए पदोन्नति में दिया गया है।
  • आरक्षण की न्यायिक समीक्षा हो सकती है।
  • अनुच्छेद 15 एवं 16 मूल ढाँचे का भाग हैं, अतः इनमें नकारात्मक प्रकृति का संशोधन नहीं हो सकता है।

आरक्षण की आलोचनाएँ

  • जाति आधारित आरक्षण कहीं-न-कहीं जातिवाद को बढ़ावा देता है।
  • यदि ऐसे ही आरक्षण देने की होड़ लगी रही तो धीरे-धीरे सभी पद लगभग आरक्षित हो जाएँगे।
  • इससे कहीं-न-कहीं योग्यता को दूसरी प्राथमिकता दी जा रही है और योग्य व्यक्ति का मनोबल गिरता है।
  • इससे लोकप्रिय राजनीति या वोट बैंक की राजनीति को बढ़ावा मिलता है; धर्म के आधार पर आरक्षण के प्रयास राजनीतिक स्तर पर हो रहे हैं, जबकि संविधान में न इसके स्पष्ट प्रावधान हैं, न ही सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर कोई सकारात्मक निर्णय दिया है।
  • उच्च जातियों को भी आरक्षण देने की राजनीति की जा रही है (जाट, पाटीदार, मराठा); कुछ राज्यों ने तो इस पर क़ानून भी बनाए हैं। यदि ऐसा ही चलता रहा तो अंतिम रूप से सभी जातियों को आरक्षण देना पड़ेगा और सामाजिक-आर्थिक न्याय का सिद्धांत समाप्त हो जाएगा।
  • आज वैश्वीकरण, उदारीकरण, निजीकरण के युग में जब सरकार के आकार कम होते जा रहे हैं तो वैसे भी आरक्षण की नीति उतना लाभ प्राप्त नहीं कर पा रही है जितना होना चाहिए।

न्याय का तर्क

उपर्युक्त आलोचनाओं के बावजूद भी यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि सामाजिक न्याय, आर्थिक न्याय जैसी अवधारणाएँ संविधान में अंतर्निहित हैं, और सर्वोच्च न्यायालय ने इंद्रा साहनी केस की याचिका से लेकर जरनैल सिंह याचिका तक इसे माना है। "जॉन रॉल्स" जैसे विश्व विद्वान ने अपने न्याय की अवधारणा में सामाजिक-आर्थिक व्यवस्थाओं को इस प्रकार सुव्यवस्थित करने का सुझाव दिया है जिससे समाज के आख़िरी वर्ग को अधिकतम लाभ मिले, और सिर्फ़ योग्यता के आधार पर सरकार का संचालन नहीं हो सकता है। अतः योग्यता के ऊपर न्याय को प्राथमिकता देनी चाहिए। यही कारण है कि अमेरिका में सकारात्मक भेदभाव करने को मान्यता दी गई है और भारत में इन्हीं वजहों से आरक्षण की नीति है।

अक्टूबर 2026 तक अद्यतनभारत में आरक्षण: 2024, 2025 और 2026 के ताज़ा घटनाक्रम

  • SC/ST का उप-वर्गीकरण मान्य (1 अगस्त 2024): पंजाब राज्य बनाम दविंदर सिंह में सात न्यायाधीशों की पीठ (6:1) ने ई.वी. चिन्नैया (2004) को पलटा। राज्य आँकड़ों के आधार पर SC/ST को उप-समूहों में बाँट सकते हैं ताकि सबसे पिछड़ों को उचित हिस्सा मिले (लेकिन किसी एक उप-समूह को 100% नहीं)। चार न्यायाधीशों ने कहा कि SC और ST में भी क्रीमी लेयर की पहचान होनी चाहिए। 9 अगस्त 2024 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने कहा कि SC/ST आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू नहीं होगी।
  • SC/ST के लिए क्रीमी लेयर का प्रश्न अभी खुला (2026): 15 जनवरी 2026 को CJI सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और विजय बिश्नोई की पीठ ने SC/ST में क्रीमी लेयर बाहर करने की अश्विनी कुमार उपाध्याय की याचिका पर नोटिस जारी किया। अगस्त 2026 में केंद्र ने लिखित दलीलों में सुप्रीम कोर्ट से कहा कि SC और ST पर क्रीमी लेयर का विचार लागू नहीं हो सकता, क्योंकि धन जाति का कलंक नहीं मिटाता। मामला लंबित है।
  • OBC क्रीमी लेयर पर स्पष्टता (11 मार्च 2026): भारत संघ बनाम रोहित नाथन (न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और आर. महादेवन) में सुप्रीम कोर्ट ने क्रीमी लेयर को बाहर रखना संवैधानिक आवश्यकता बताया, कहा कि 2004 का पत्र 1993 के पद-आधारित कार्यालय ज्ञापन को नहीं पलट सकता, और सरकारी व PSU कर्मचारियों के बच्चों में अंतर करना अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। ₹8 लाख की आय सीमा (2017 से) बनी हुई है।
  • जनगणना 2027 में जाति गणना: 16 जून 2025 को अधिसूचित जनगणना 1931 के बाद पहली बार जाति दर्ज करेगी। जनसंख्या गणना फ़रवरी 2027 में होगी, संदर्भ तिथि 1 मार्च 2027 (हिमाच्छादित लद्दाख, J&K, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के लिए 1 अक्टूबर 2026)। SC/ST अधिसूचित सूचियों से कोड होंगे; बाकी लोग खुले कॉलम में अपनी जाति लिखेंगे। ये आँकड़े 50% सीमा और उप-वर्गीकरण की आगे की बहस तय करेंगे।
  • 50% से ऊपर जाते राज्य: पटना हाई कोर्ट ने 20 जून 2024 को बिहार का 50% से 65% तक का विस्तार रद्द किया; सुप्रीम कोर्ट ने रोक से इनकार किया (29 जुलाई 2024) और अपीलें लंबित हैं। महाराष्ट्र का 10% मराठा कोटा (SEBC अधिनियम, 2024) बॉम्बे हाई कोर्ट की विशेष पीठ के सामने है, और तब तक परिणाम के अधीन लागू है।
  • OBC उप-वर्गीकरण: न्यायमूर्ति जी. रोहिणी आयोग ने 31 जुलाई 2023 को रिपोर्ट सौंपी; यह अब तक लागू नहीं हुई है।
  • अन्य कदम: 45 पदों का UPSC लेटरल एंट्री विज्ञापन 20 अगस्त 2024 को इस आपत्ति के बाद वापस लिया गया कि उसमें आरक्षण नहीं था; जून 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने कर्मचारियों की सीधी भर्ती और पदोन्नति में SC/ST आरक्षण लागू किया।

त्वरित दोहराईयाद रखने योग्य मुख्य बातें

  • अनुच्छेद 16 = नागरिकों के लिए लोक नियोजन में समान अवसर; 16(2) में उद्भव और निवास अतिरिक्त।
  • निवास की शर्त केवल संसद लगा सकती है (16(3))।
  • केंद्र में हिस्सा: SC 15%, ST 7.5%, OBC 27% (49.5%) + EWS 10% = 59.5%।
  • इंद्रा साहनी (1992): जाति वैध आधार, OBC क्रीमी लेयर, 50% सीमा, पदोन्नति में आरक्षण नहीं।
  • 16(4क) पदोन्नति (77वाँ, 1995) + परिणामी ज्येष्ठता (85वाँ, 2001); 16(4ख) बैकलॉग (81वाँ, 2000)।
  • नागराज (2006) की शर्तें; जरनैल सिंह (2018) ने पिछड़ेपन के आँकड़े की शर्त हटाई।
  • दविंदर सिंह (2024): SC/ST का उप-वर्गीकरण मान्य।
  • EWS: 103वाँ संशोधन (2019), जनहित अभियान (7 नवंबर 2022) में वैध।

आरक्षण की समयरेखाभारत में आरक्षण: UPSC के लिए मुख्य तिथियाँ

वर्षघटना
1951चंपकम दोराइराजन के बाद पहला संशोधन: 15(4) और नौवीं अनुसूची।
1953अनुच्छेद 340 के तहत काका कालेलकर आयोग (पहला पिछड़ा वर्ग आयोग)।
1979बी.पी. मंडल आयोग गठित; 1980 की रिपोर्ट में OBC को 27% की सिफ़ारिश।
1990वी.पी. सिंह सरकार ने केंद्रीय नौकरियों में 27% OBC आरक्षण लागू किया।
1992इंद्रा साहनी (16 नवंबर): 27% वैध, क्रीमी लेयर, 50% सीमा, पदोन्नति में आरक्षण नहीं, 10% आर्थिक कोटा रद्द।
1994-200176वाँ (तमिलनाडु 69% नौवीं अनुसूची में), 77वाँ (16(4क)), 81वाँ (16(4ख)), 82वाँ (अनुच्छेद 335 परंतुक), 85वाँ (परिणामी ज्येष्ठता)।
2006एम. नागराज: संशोधन वैध, आँकड़े, कार्यकुशलता, क्रीमी लेयर और 50% शर्तों के साथ।
2018जरनैल सिंह: SC/ST पिछड़ेपन के आँकड़े ज़रूरी नहीं; पदोन्नति में क्रीमी लेयर बनी रहेगी।
2019103वाँ संशोधन: EWS को अधिकतम 10% आरक्षण (15(6), 16(6))।
2022जनहित अभियान (7 नवंबर): EWS 3:2 से वैध; 50% सीमा केवल पिछड़े वर्गों के लिए।
2024दविंदर सिंह (1 अगस्त): SC/ST उप-वर्गीकरण मान्य; पटना HC ने बिहार का 65% रद्द किया।
2026OBC क्रीमी लेयर पर रोहित नाथन (11 मार्च); SC/ST क्रीमी लेयर याचिका लंबित; जनगणना 2027 में जाति आँकड़े।

UPSC · राज्य PSC · न्यायपालिकाअनुच्छेद 16 और आरक्षण: UPSC परीक्षा कॉर्नर

  • प्रीलिम्स जाल: "अनुच्छेद 16(3) के तहत राज्य विधान-मंडल राज्य की नौकरियों में निवास की शर्त लगा सकते हैं।" ग़लत। केवल संसद लगा सकती है।
  • प्रीलिम्स जाल: "सीधी भर्ती में SC/ST पर क्रीमी लेयर लागू है।" अक्टूबर 2026 तक ग़लत। यह OBC पर लागू है, और SC/ST पर केवल पदोन्नति के स्तर पर (जरनैल सिंह)।
  • मेन्स (250 शब्द): क्या आपके विचार में जाति आधारित आरक्षण संवैधानिक रूप से सही है? सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को ध्यान में रखते हुए अपने विचार व्यक्त करें।
  • मेन्स (250 शब्द): आर्थिक आधार पर आरक्षण के प्रावधान स्पष्ट करें और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इसके पक्ष में दिए गए तर्कों को ध्यान में रखते हुए अथवा विपक्ष में दिए गए विचारों का उल्लेख करें।
  • मेन्स: 103वें संविधान संशोधन की आलोचनात्मक व्याख्या करें।
  • जुड़े विषय: अनुच्छेद 335 (कार्यकुशलता), अनुच्छेद 338 / 338क / 338ख (आयोग), अनुच्छेद 340, अनुच्छेद 341 / 342 / 342क (सूचियाँ), नौवीं अनुसूची।

अभ्यास प्रश्नख़ुद को परखें: अनुच्छेद 16 और आरक्षण

निम्नलिखित पर विचार कीजिए: 1. अनुच्छेद 16(4ख) न भरे आरक्षित पदों को 50% सीमा से बाहर आगे ले जाने की अनुमति देता है। 2. 1991 का 10% आर्थिक कोटा इंद्रा साहनी में वैध ठहराया गया। 3. EWS कोटा नवंबर 2022 में जनहित अभियान में वैध ठहराया गया। कौन-से सही हैं?

शंका समाधानअक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 16 क्या है?

अनुच्छेद 16 सरकारी नौकरियों में सभी नागरिकों को अवसर की समता देता है, धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, उद्भव, जन्मस्थान या निवास के आधार पर भेदभाव रोकता है, और पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण, SC/ST की पदोन्नति और EWS की अनुमति देता है।

इंद्रा साहनी केस में क्या तय हुआ?

1992 में नौ न्यायाधीशों की पीठ ने 27% OBC आरक्षण को वैध ठहराया, जाति को पिछड़ेपन का आधार माना, OBC की क्रीमी लेयर बाहर की, 50% सीमा तय की, पदोन्नति में आरक्षण रोका और 10% आर्थिक कोटा रद्द किया।

2026 में OBC के लिए क्रीमी लेयर सीमा क्या है?

₹8 लाख सालाना, 2017 से अपरिवर्तित। वेतन और कृषि आय नहीं जोड़ी जाती; उच्च संवैधानिक पदों या ग्रुप A पदों पर बैठे माता-पिता के बच्चे पद के आधार पर बाहर हैं।

कैच-अप नियम और परिणामी ज्येष्ठता में क्या अंतर है?

कैच-अप नियम में वरिष्ठ सामान्य उम्मीदवार बाद में पदोन्नत होने पर अपनी वरिष्ठता वापस पा लेता है। परिणामी ज्येष्ठता (85वाँ संशोधन) में SC/ST कर्मचारी आरक्षित पदोन्नति से मिली वरिष्ठता बनाए रखता है।

EWS आरक्षण के लिए कौन पात्र है?

जो व्यक्ति SC, ST या OBC आरक्षण में नहीं आता, जिसके परिवार की आय ₹8 लाख सालाना से कम है, और जिसके परिवार के पास 5 एकड़ कृषि भूमि, 1000 वर्ग फ़ुट का फ़्लैट, या 100 वर्ग गज़ (अधिसूचित नगरपालिका) या 200 वर्ग गज़ (अन्य क्षेत्र) का आवासीय प्लॉट नहीं है।

क्या आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक हो सकता है?

पिछड़े वर्गों के लिए इंद्रा साहनी की 50% सीमा असाधारण परिस्थितियों को छोड़कर लागू है। EWS इससे बाहर है (जनहित अभियान, 2022), इसलिए केंद्र में कुल 59.5% है। तमिलनाडु का 69% नौवीं अनुसूची से संरक्षित है, पर मूल ढाँचे की समीक्षा के लिए खुला है।